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नवम अध्याय २०२ सदैव मुझसे संयुक्त होकर अनन्य भक्ति से मुझे उपासते हैं| अविरल लगे रहते हैं॰ कौन-सी उपासना करते हैं? कैसा है यह कीर्तिगान? कोई दूसरी उपासना नहों वरन् वहीं यज्ञ , जिसे विस्तार से बता आये हैं| उसीं आराधना को यहाँ संक्षेप में योगेश्वर श्रीकृष्ण दुहरा रहे हैं- ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते| एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ११५/| उनमें से कोई तो मुझ सर्वव्याप्त विराट् परमात्मा को ज्ञानयज्ञ द्वारा यजन करते हैं अर्थात् अपनी हानि, लाभ और शक्ति को समझकर इसी नियत कर्म यज्ञ में प्रवृत्त होते हैं , कुछ एकत्व भाव से मेरी उपासना करते हैं कि मुझे इसी में एक होना है और दूसरे सब कुछ मुझे अलग रखकर, मुझे समर्पण करके निष्काम सेवा-भाव से मुझे उपासते हैं तथा बहुत प्रकार से उपासते हैं; क्योंकि एक ही यज्ञ के ये सभी ऊँचे-नीचे स्तर हैं॰ यज्ञ का आरम्भ सेवा से ही होता है; किन्तु उसका अनुष्ठान होता कैसे है? योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं - यज्ञ मैं करता हूँ॰ यदि महापुरुष रथी न हो तो यज्ञ पार नहीं लगेगा| उन्हीं के निर्देशन में साधक समझ पाता है कि अब वह किस स्तर पर है, कहाँ तक पहुँच सका है| वस्तुतः यज्ञकर्त्ता कौन है?- इस पर योगेश्वर कहते हैं- अहं ऋतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्| मन्त्रोउहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ११६१| कर्त्ता मैं हूँ वस्तुतः कर्त्ता के पीछे प्रेरक के रूप में सदैव संचालित करनेवाला इष्ट हीं है| कर्त्ता द्वारा जो पार लगता है मेरी देन है| यज्ञ मैं हूँ॰ यज्ञ आराधना की विधि-विशेष है| पूर्तिकाल में यज्ञ जिसका सृजन करता है, उस अमृत को पान करनेवाला पुरुष सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है| स्वधा मैं हूँ अर्थात् अतीत के अनन्त संस्कारों को विलय करना , उन्हें तृप्त कर देना मेरी देन है| भवरोग को मिटानेवाली औषधि मैं हूँ॰ मुझे पाकर लोग इस रोग से निवृत्त हो जाते हैं| मन्त्र मैं हूँ॰ मन को श्वास के अन्तराल में निरोध करना मेरी देन है| इस निरोध-क्रिया में तीव्रता लानेवाली वस्तु आज्य' ( हवि ) भी मैं हूँ| मेरे ही प्रकाश में मन की सभी प्रवृत्तियाँ विलीन होती हैं| हवन अर्थात् समर्पण भी मैं ही हूँ|
२ ० श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता यहॉँ योगेश्वर श्रीकृष्ण बार-बार मैं हूँ॰ कह रहे हैं| इसका आशय मात्र इतना ही है कि मैं ही प्रेरक के रूप में आत्मा से अभिन्न होकर खड़ा हो जाता हूँ तथा निरन्तर निर्णय योगक्रिया को पूर्ण कराता हूँ॰ इसो का नाम है॰ ` पूज्य महाराज जो' कहा करते थे कि ' जब तक इष्टदेव रथी होकर श्वास ्प्रश्वास पर रोकथाम न करने लगें, तब तक भजन आरम्भ ही नहों होता१ कोई लाख आँख मूँदे, भजन करे, शरीर को तपा डाले; लेकिन जब तक जिस परमात्मा की हमें चाह है वह , जिस सतह पर हम खड़े हैं उस स्तर पर उतरकर आत्मा से अभिन्न होकर जागृत नहीं हो जाता , तब तक सहीं मात्रा में भजन का स्वरूप समझ में नहों आता| इसलिये महाराज जो कहते थे- ' मेरे स्वरूप को पकड़ो़ , मैं सब दूँगाा ' श्रीकृष्ण कहते हैं- सब मुझसे होता है| पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव चढ११७१| अर्जुन ! मैं ही सम्पूर्ण जगत् का धाता अर्थात् धारण करनेवाला पिता ' अर्थात् पालन करनेवाला , माता ' अर्थात् उत्पन्न करनेवाला , पितामहः अर्थात् मूल उद्गम हूँ, जिसमें सभी प्रवेश पाते हैं और जानने योग्य पवित्र ओंकार अर्थात् अहं आकार इति ओंकारः वह परमात्मा मेरे स्वरूप में है॰ सोउहं, तत्त्वमसि' इत्यादि एक दूसरे के पर्याय हैं, ऐसा जानने योग्य स्वरूप मैं ही हूँ॰ ऋक् अर्थात् सम्पूर्ण प्रार्थना , साम ' अर्थात् समत्व दिलानेवाली प्रक्रिया यजुः अर्थात् यजन की विधि-विशेष भी मैं ही हूँ॰ योग-अनुष्ठान के उक्त तीनों आवश्यक अंग मुझसे होते हैं| गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्| प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्| ११८| | हे अर्जुन ! ' गतिः ' अर्थात् प्राप्त होने योग्य परमगति , भर्ता ' - भरण - पोषण करनेवाला सबका स्वामी , साक्षी ' अर्थात् द्रष्टा- रूप में स्थित सबको जाननेवाला , सबका वासस्थान , शरण लेने योग्य , अकारण प्रेमी मित्र , उत्पत्ति और प्रलय अर्थात् शुभाशुभ संस्कारों का विलय तथा अविनाशी कारण मैं ही हूँ| अर्थात् अन्त में जिनमें प्रवेश मिलता है, वे सारी विभूतियाँ मैं हीं हूँ| देते हुए विज्ञान
नवम अध्याय २०३ तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्लाम्युत्सृजामि च| अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुनत११९१| मैं सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा को आकर्षित करता हूँ और उसे बरसाता हूँ| मृत्यु से परे अमृत-्तत्त्व तथा मृत्यु, सत् और असत् सब कुछ मैं ही हूँढ़ अर्थात् जो परम प्रकाश प्रदान करता है, वह सूर्य मैं हो हूँ| कभो - कभो भजनेवाले मुझे असत् भी मान बैठते हैं, को प्राप्त होते हैं| आगे कहते हैं- त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते| पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक- मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् १२०१| आराधना विद्या के तीनों अंग- ऋक्, साम और यजुः अर्थात् प्रार्थना , समत्व को प्रक्रिया और यजन का आचरण करनेवाले , सोम अर्थात् चन्द्रमा के क्षीण प्रकाश को पानेवाले पाप से मुक्त होकर पवित्र हुए पुरुष उसी यज्ञ को निर्धारित प्रक्रिया द्वारा मुझे इष्टरूप में पूजकर स्वर्ग के लिये प्रार्थना करते हैं| यही असत् की कामना है, इससे वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं , उनका होता हैः जैसा पिछले श्लोक में योगेश्वर ने बताया| वे पूजते मुझे ही हैं , उसी निर्धारित विधि से पूजते हैं; किन्तु बदले में स्वर्ग को याचना करते हैं| वे पुरुष अपने पुण्य के फलस्वरूप इन्द्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं, अर्थात् वह भोग भी मैं ही देता हूँ॰ ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति| ए्वं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते११२१| | वे उस विशाल को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक अर्थात् जन्म-्मृत्यु को प्राप्त होते हैं| इस प्रकार ' त्रयीधर्मम् - प्रार्थना, समत्व एवं यजन को तीनों विधियों से एक हीं यज्ञ का अनुष्ठान करनेवाले मेरी शरण हुए वे मृत्यु पुनर्जन्म स्वर्ग
२०४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता भी कामनावाले पुरुष बारम्बार जाने आने को अर्थात् को प्राप्त होते हैं किन्तु उनका मूल नाश कभी नहों होताः क्योंकि इस पथ में बीज का नाश नहीं है॰ जो किसीं प्रकार की कामना नहों करते , उन्हें क्या मिलता है?- अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते| तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् २२१| अनन्य भाव से मुझमें स्थित भक्तजन मुझ परमात्मस्वरूप का निरन्तर चिन्तन करते हैं , पर्युपासते - लेशमात्र भी त्रुटि न रखकर मुझे उपासते हैं उन नित्य एकीभाव से संयुक्त हुए पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ अर्थात् उनके योग की सुरक्षा की सारी जिम्मेदारी मैं अपने हाथ में लेता हूँ| इतना होने पर भी लोग अन्य देवताओं को भजते हैं- येउप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः तेउपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् २३१ | कौन्तेय ! श्रद्धा से युक्त हुए जो भक्त दूसरे - दूसरे देवताओं को पूजते हैं वे भी मुझे ही पूजते हैं; क्योंकि वहाँ देवता नाम को कोई वस्तु तो होती नहीं , किन्तु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक है, मेरी प्राप्ति को विधि से रहित है| यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दूसरी बार देवताओं के प्रकरण को लिया है| सर्वप्रथम अध्याय सात के बीसवें से तेईसवें श्लोक तक उन्होंने कहा- अर्जुन ! कामनाओं द्वारा जिनके ज्ञान का अपहरण कर लिया गया है, ऐसे मूढ़बुद्धि पुरुष अन्य देवताओं की पूजा करते हैं और जहाँ पूजा करते हैं, वहाँ देवता नाम को सक्षम सत्ता तो है ही नहों | पोपल , पत्थर , भूत, भवानी अथवा अन्यत्र जहाँ उनकी श्रद्धा झुक जाती है , वहाँ कोई देवता नहों है| मैं ही सर्वत्र हूँ॰ उस स्थान पर मैं हो खडा होकर उनको देवश्रद्धा को उन स्थानों पर स्थिर करता हूँ मैं ही फल का विधान करता हूँ , फल देता हूँ| फल निश्चित मिलता है; उनका फल आज है तो कल भोगने में आ जायेगा , नष्ट हो जायेगा , जबकि मेरा भक्त नष्ट नहों होता| अतः वे मूढ़बुद्धि जिनके ज्ञान का अपहरण हो गया है, वहीं अन्य देवताओं करते हैं| पुनर्जन्म किन्तु किन्तु नाशवान् है| की पूजा
नवम अध्याय प्रस्तुत अध्याय नौ के तेईस से पचीसवें श्लोक तक योगेश्वर श्रीकृष्ण पुनः हैं कि॰ अर्जुन! जो श्रद्धा से अन्य-्अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे मुझे ही पूजते हैं; किन्तु वह पूजन अविधिपूर्वक है| वहाँ देवता नाम की सक्षम वस्तु नहों है| उनकी प्राप्ति को विधि गलत है| अब प्रश्न उठता है कि जब वे भी प्रकारान्तर से आपको ही पूजते हैं और फल भी मिलता ही है, तो दोष क्या है? अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च| न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते११२४१| सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता अर्थात् यज्ञ जिसमें विलय होते हैं, यज्ञ के परिणाम में जो मिलता है वह मैं हूँ और स्वामी भो मैं ही हूँ परन्तु वे मुझे तत्त्व से भली प्रकार नहों जानते , इसलिये च्यवन्ति - गिरते हैं॰ अर्थात् वे कभी अन्य देवताओं में गिरते हैं और तत्त्व से जब तक नहों जानते तब तक कामनाओं से भी गिरते हैं॰ उनको गति क्या है?- यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोउपि माम्र |२५/ | अर्जुन ! देवताओं को पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं| देवता हैं तो परिवर्तित सत्ता, वे अपने सद्कर्मानुसार जीवन व्यतीत करते हैं| पितरों को पितरों को प्राप्त होते हैं अर्थात् अतीत में उलझे रहते हैं, भूतों को भूत होते हैं- शरीर धारण करते हैं और मेरा भक्त मुझे प्राप्त होता है| वह मेरा साक्षात् स्वरूप होता है| उसका पतन नहों होता| इतना ही नहों , मेरी पूजा का विधान भी सरल है- पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति| तदहं भक्त्युपहृतमश्रामि प्रयतात्मनः| १२६| | भक्ति का आरम्भ यहों से है कि पत्र , पुष्प , फल , जल इत्यादि जो कोई मुझे भक्तिपूर्वक अर्पित करता है, मन से अर्पण करनेवाले उस भक्त का वह सब मैं खाता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ॰ इसलिये- दुहराते पितृत्रताः भूतानि पूजनेवाले पूजनेवाले
२०६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता यत्करोषि यदश्रासि ददासि यत्| यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् २७१| अर्जुन ! तूजो कर्म ( यथार्थ कर्म) करता है, जो खाता है, जो हवन करता है , समर्पण करता है , दान देता है , मनसहित इन्द्रियों को जो मेरे अनुरूप तपाता है वह सब मुझे अर्पण कर अर्थात् मेरे प्रति समर्पित होकर यह सब करा समर्पण करने से योग के क्षेम की जिम्मेदारी मैं ले लूँगा शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः| सन्न्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि| २८१| इस प्रकार सर्वस्व के न्यास संन्यास योग से युक्त हुआ तू शुभाशुभ फलदाता कर्मों के बन्धन से मुक्त होकर मुझे प्राप्त होगा| उपर्युक्त तीन श्लोकों में योगेश्वर ने क्रमबद्ध साधन और उसके परिणाम का चित्रण किया है- पहले पत्र-पुष्प, फल-्जल का पूर्ण श्रद्धा से अर्पण , समर्पित होकर कर्म का आचरण और तीोसरे पूर्ण समर्पण के साथ सर्वस्व का त्याग| इनके द्वारा कर्मबन्धन से विमुक्त ( विशेष रूप से मुक्त ) हो जायेगा| मुक्ति से मिलेगा क्याः तो बताया, मुझे प्राप्त होगा| यहाँ मुक्ति और प्राप्ति एक दूसरे के पूरक हैं| आपकी प्राप्ति ही मुक्ति है, तो उससे लाभः इस पर कहते हैं- समोउहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योउस्ति न प्रियः| ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् २९१| मैं सब भूतों में सम हूँ॰ सृष्टि में न मेरा कोई प्रिय है और न अप्रिय है; जो अनन्य भक्त है, वह मुझमें है और मैं उसमें हूँ॰ यही मेरा एकमात्र रिश्ता है| मैं उसमें परिपूर्ण हो जाता हूँ॰ मुझमें और उसमें कोई अन्तर नहों रह जाता| तब तो बहुत भाग्यशाली लोग ही भजन करते होंगे? भजन करने का अधिकार किसे है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सःख |३०१ | यज्जुहोषि श्रीकृष्ण दूसरे किन्तु
नवम अध्याय २०७७ यदि अत्यन्त भी अनन्य भाव से अर्थात् (अन्य न) मेरे सिवाय किसी अन्य वस्तु या देवता को न भजकर केवल मुझे ही निरन्तर भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है| अभी वह साधु हुआ नहों है उसके हो जाने में सन्देह भी नहीं है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चय से लग गया है॰ अतः भजन आप भी कर सकते हैं बशर्ते कि आप मनुष्य हों; क्योंकि मनुष्य ही यथार्थ निश्चयवाला है| गीता पापियों का उद्धार करती है और वह पथिक क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति| कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति| १३१| | इस भजन के प्रभाव से वह भी शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है परमधर्म परमात्मा से संयुक्त हो जाता है तथा सदैव रहनेवाली परमशान्ति को प्राप्त होता है| कौन्तेय! निश्चयपूर्वक सत्य कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता| यदि एक जन्म में पार नहीं लगा तो अगले जन्मों में भी वही साधन करके शीघ्र ही परमशान्ति को प्राप्त होता है| अतः सदाचारी , सभी को भजन करने का अधिकार है इतना ही नहों , अपितु- मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येउपि स्युः पापयोनयः स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेउपि यान्ति परां गतिम्१३२१ | पार्थ ! स्त्रो , वैश्य , तथा जो कोई पापयोनिवाले भी हों, वे सभी मेरे आश्रित होकर परमगति को प्राप्त होते हैं| अतः यह गीता मनुष्यमात्र के लिये है , चाहे वह कुछ भी करता हो, कहों भी पैदा हुआ हो| सबके लिये यह एक समान कल्याण का उपदेश करती है| गीता सार्वभौम है| पापयोनि - अध्याय १६७७-२१ में आसुरी वृत्ति के लक्षणों के अन्तर्गत भगवान ने बताया कि जो शास्त्रविधि को त्यागकर नाममात्र के यज्ञों द्वारा दम्भ से यजन करते हैं, वे नरों में अधम हैं| यज्ञ है नहों किन्तु नाम दे रखा है और दम्भ से यजन करता है वह और पापाचारी ( पापयोनि ) है|जो मुझ परमात्मा से द्वेष करनेवाले हैं वही पापी हैं॰ वैश्य भगवत्पथ को दुराचारी किन्तु दुराचारी जान दुराचारी शूद्रादि क्रूरकर्मी और शूद्र
२०८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता सीढ़ियाँ हैं॰ स्त्रियों के प्रति कभी सम्मान, कभी हीनता भावना समाज में रही है, इसोलिये श्रीकृष्ण ने इनका नाम लिया| योग- प्रक्रिया में स्त्री दोनों का समान हीं प्रवेश है| किं पुनर्बाह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा| अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्|१३३१| फिर तो ब्राह्मण तथा राजर्षि क्षत्रिय श्रेणीप्राप्त भक्तों के लिये कहना ही क्या है? ब्राह्मण एक अवस्था विशेष है , जिसमें ब्रह्म में प्रवेश दिला देनेवाली सारी योग्यताएँ विद्यमान हैं| शान्ति, आर्जव, अनुभवी उपलब्धि, ध्यान और इष्ट के निर्देशन पर जिसमें चलने की क्षमता है, वहीं ब्राह्मण की अवस्था है| राजर्षि क्षत्रिय में ऋद्धियों सिद्धियों का संचार, शौर्य, स्वामीभाव, पीछे न हटने का स्वभाव रहता है| इस योगस्तर पर पहुँचे हुए योगी तो पार होते ही हैं उनके लिये क्या कहना है? अतः अर्जुन ! तू सुखरहित , क्षणभंगुर इस मनुष्य- शरीर को प्राप्त होकर मेरा ही भजन करढ इस नश्वर शरीर के ममत्व , पोषण में समय नष्ट न करा योगेश्वर श्रीकृष्ण ने यहाँ चौथी बार ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र की चर्चा को| अध्याय दो में उन्होंने कहा कि क्षत्रिय के लिये युद्ध से बढ़कर कल्याण का कोई रास्ता नहों है॰ अध्याय तीन में उन्होंने कहा कि स्वधर्म में निधन भी श्रेयतर है| अध्याय चार में उन्होंने संक्षेप में बताया कि चार वर्णों को रचना मैँने को| तो क्या मनुष्यों को चार जातियों में बाँटाः बोले , नहों ' गुणकर्म विभागशः गुण के पैमाने से कर्म को चार श्रेणियों में रखा| श्रीकृष्ण के अनुसार , कर्म एकमात्र यज्ञ कोी प्रक्रिया है| अतः इस यज्ञ को करनेवाले चार प्रकार के हैं प्रवेशकाल में वह यज्ञकर्त्ता अल्पज्ञ है| कुछ करने की क्षमता आयी, आत्मिक सम्पत्ति का संग्रह हुआ तो वहीं यज्ञकर्त्ता वैश्य बन गया इससे उन्नत होने पर प्रकृति के तीनों गुणों को काटने की क्षमता आ जाने पर वहीं साधक क्षत्रिय श्रेणी का है और जब इसीं साधक के स्वभाव में ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवालो योग्यताएँ ढल जाती हैं तो वही ब्राह्मण है| वैश्य एवं शूद्र की अपेक्षा क्षत्रिय और ब्राह्मण श्रेणी के साधक प्राप्ति के अधिक समीप हैं| और पुरुष शूद्र है,
नवम अध्याय शूद्र और वैश्य भी उसी ब्रह्म में प्रवेश पाकर शान्त होंँगे , फिर इसके आगे की अवस्थावालों के लिये तो कहना हीं क्या है| उनके लिये तो निश्चित ही है| जिसका विस्तार वेद और अन्य उपनिषद् जिनमें ब्रह्मविदुषी महिलाओं के आख्यान भरे पड़े हैं , तथाकथित धर्मभीरु , रूढ़िवादी वेदाध्ययन के अधिकार अनधिकार को व्यवस्था देने में माथापच्ची करते रहें लेकिन योगेश्वर श्रीकृष्ण का स्पष्ट उद्घोष है कि यज्ञार्थ कर्म को निर्धारित क्रिया में सभी प्रवेश ले सकते हैं| अबवे भजन की धारणा पर प्रोत्साहन देते हैं- मन्मना भव मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ३४| | अर्जुन ! मेरे में ही मनवाला हो| सिवाय मेरे दूसरे भाव मन में न आने पायें| मेरा अनन्य भक्त हो, अनवरत चिन्तन में लगड श्रद्धासहित मेरा ही निरन्तर पूजन कर और मेरे को ही नमस्कार करढ इस प्रकार मेरी शरण हुआ , आत्मा को मुझमें एकीभाव से स्थित कर तू मुझे ही प्राप्त होगा अर्थात् मेरे साथ एकता प्राप्त करेगा| निष्कर्ष - इस अध्याय के आरम्भ में श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! तुझ दोषरहित भक्त के लिए मैं इस ज्ञान को विज्ञानसहित कहूँगा , जिसे जानकर कुछ भी जानना शेष नहों रहेगा| इसे जानकर तू संसार - बन्धन से छूट जायेगा| यह ज्ञान सम्पूर्ण विद्याओं का राजा है| विद्या वह है जो परमब्रह्म में प्रवेश दिलाये| यह ज्ञान उसका भी राजा है अर्थात् निश्चित कल्याण करनेवाला है॰ यह सम्पूर्ण गोपनीयों का भी राजा है, गोपनोय वस्तु को भी प्रत्यक्ष करनेवाला है| यह प्रत्यक्ष फलवाला , साधन करने में सुगम और अविनाशी है| इसका थोड़ा भी साधन आप से पार लग जाय तो इसका कभी नाश नहों होता वरन् इसके प्रभाव से वह परमश्रेय तक पहुँच जाता है; किन्तु इसमें एक शर्त है| श्रद्धाविहीन पुरुष परमगति को प्राप्त न होकर संसार चक्र में भटकता है| गीता , स्त्रो- पुरुष मद्भक्तो
२ < श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता योगेश्वर श्रीकृष्ण ने योग के ऐश्वर्य पर भी प्रकाश डाला दुःख के संयोग का वियोग हीं योग है अर्थात् जो संसार के संयोग-वियोग से सर्वथा रहित है, उसका नाम योग है| परमतत्त्व परमात्मा के मिलन का नाम योग है| परमात्मा को प्राप्ति ही योग को पराकाष्ठा है|जो इसमें प्रवेश पा गया, उस योगी के प्रभाव को देख कि सम्पूर्ण भूतों का स्वामी और जीवधारियों का पोषण करनेवाला होने पर भी मेरा आत्मा उन भूतों में स्थित नहों है॰ मैं आत्मस्वरूप में स्थित हूँ॰ वही हूँ॰ जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरनेवाला वायु आकाश में ही स्थित है किन्तु उसे मलिन नहों कर पाता, उसी प्रकार सम्पूर्ण भूत स्थित हैं लेकिन मैं उनमें लिप्त नहों हूँ॰ अर्जुन ! कल्प के आदि में मैं भूतों को विशेष प्रकार से रचता हूँ, सजाता हूँ और कल्प के पूर्तिकाल में सम्पूर्ण भूत मेरी प्रकृति को अर्थात् योगारूढ़ महापुरुष की रहनी को , उनके अव्यक्त भाव को प्राप्त होते हैं| यद्यपि महापुरुष प्रकृति से परे है; प्राप्ति के पश्चात् स्वभाव अर्थात् स्वयं में स्थित रहते हुए लोकसंग्रह के लिएजो कार्य करता है, वह उसकी एक रहनी है॰ इसी रहनी के कार्य-्कलाप को उस महापुरुष को प्रकृति कहकर सम्बोधित किया गया है| एक रचयिता ा तो मैं हूँ॰ जो भूतों को कल्प के लिये प्रेरित करता हूँ और रचयिता त्रिगुणमयो प्रकृति है, जो मेरे अध्यास से चराचरसहित भूतों को रचती है| यह भी एक कल्प है, जिसमें शरीर- परिवर्तन, स्वभाव- परिवर्तन और काल- परिवर्तन निहित है| गोस्वामी तुलसीदास जी भी यही कहते हैं- एक दुष्ट अतिसय दुखरूपात| जा बस जीव परा भवकूपाा | ( रामचरितमानस , ३/१४/५ ) प्रकृति के दो भेद विद्या और अविद्या हैं | इनमें अविद्या दुष्ट है , दुःखरूप है जिससे विवश जीव भवकूप में पडा है, जिससे प्रेरित होकर जीव काल कर्म , स्वभाव और गुण के घेरे में आ जाता है| है विद्यामाया , जिसे श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं रचता हूँ॰ गोस्वामी जी के अनुसार प्रभु रचते हैं- मुझमें किन्तु दूसरी दूसरी
नवम अध्याय २१२ एक रचइ जग गुन बस जाकें॰ प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें॰| ( रामचरितमानस , ३/१४/६ ) यह जगत् को रचना करती है, जिसके आश्रित गुण हैं| कल्याणकारीं गुण एकमात्र ईश्वर में है| प्रकृति में गुण हैं ही नहों , वह तो नश्वर है; लेकिन विद्या में प्रभु हीं प्रेरक बनकर करते हैं| इस प्रकार कल्प दो प्रकार के हैं| एक तो वस्तु का, शरीर और काल का परिवर्तन कल्प है| यह परिवर्तन प्रकृति ही मेरे आभास से करती है| इससे महान् कल्प जो आत्मा को निर्मल स्वरूप प्रदान करता है , उसका शृंगार महापुरुष करते हैं| वे अचेत भूतों को सचेत करते हैं| भजन का आदि ही इस कल्प का आरम्भ है और भजन को पराकाष्ठा कल्प का अन्त है॰ जब यह कल्प भवरोग से पूर्ण नोरोग बनाकर शाश्वत ब्रह्म में प्रवेश (स्थिति) दिला देता है उस प्रवेशकाल में योगी मेरी रहनी और मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है| प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष को रहनी ही उसकी प्रकृति है| धर्मग्रन्थों में कथानक मिलते हैं कि चारों युग बीतने पर ही कल्प पूर्ण होता है , महाप्रलय होता है| प्रायः लोग इसे यथार्थ नहों समझते| युग का अर्थ है दो| आप अलग हैं आराध्य अलग है तब तक रहेंगे| गोस्वामी जी ने रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में इसकी चर्चा की है| जब तामसीं गुण कार्य करते हैं, रजोगुण अल्प मात्रा में है, चारों ओर वैर-्विरोध है, ऐसा व्यक्ति कलियुगीन है| वह भजन नहों कर पाताः किन्तु साधन प्रारम्भ होने पर युग- परिवर्तन हो जाता है| रजोगुण बढ़ने लगता है, क्षीण हो चलता है कुछ सत्त्वगुण भी स्वभाव में आ जाते हैं , हर्ष और भय की दुविधा लगी रहती है तो वही साधक द्वापर की अवस्था में आ जाता है| क्रमशः सत्त्वगुण का बाहुल्य होने पर रजोगुण स्वल्प रह जाता है, आराधना - कर्म में रति हो जाती है, ऐसे में त्याग की स्थितिवाला साधक अनेकों यज्ञ करता है| यज्ञानां जपयज्ञोउस्मि ' - यज्ञ- श्रेणीवाला जप , जिसका उतार - चढ़ाव श्वास- प्रश्वास पर है, उसे करने की क्षमता रहती है| जब मात्र सत्त्वगुण शेष रहा , विषमता खो गयो, समता आ गयो, यह कृतयुग अर्थात् युग अथवा किन्तु युगधर्म तमोगुण त्रेतायुग कृतार्थ
२१ २ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता सत्ययुग का प्रभाव है| उस समय सब योगी विज्ञानी होते हैं , ईश्वर से मिलनेवाले होते हैं , स्वाभाविक ध्यान पकड़ने को उनमें क्षमता रहतीं है| विवेकीजन का उतार - चढ़ाव मन में समझते हैं| मन के निरोध के लिये अधर्म का परित्याग कर धर्म में प्रवृत्त हो जाते हैं| निरुद्ध मन का भी विलय हो जाने पर युगों के साथ- साथ कल्प का भी अन्त हो जाता है| पूर्णता में प्रवेश दिलाकर कल्प भी शान्त हो जाता है| यही प्रलय है, जब प्रकृति पुरुष में विलीन हो जाती है| पश्चात् महापुरुष की जो रहनीं है वहीं उसकी प्रकृति है उसका स्वभाव है| योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन ! मुझे नहों जानते| मुझ ईश्वरों के ईश्वर को भी तुच्छ समझते हैं, साधारण मनुष्य मानते हैं| प्रत्येक महापुरुष के साथ यह विडम्बना रही है कि तत्कालीन समाज ने उनकी उपेक्षा की , उनका डटकर विरोध हुआ| श्रीकृष्ण भो इसके अपवाद नहों थे| वे कहते हैं - मैं परमभाव में स्थित हूँ; किन्तु शरीर मेरा भी मनुष्य का ही है, अतः मूढ़ पुरुष मुझे तुच्छ कहकर , मनुष्य कहकर सम्बोधित करते हैं| ऐसे लोग व्यर्थ आशावाले हैं, व्यर्थ कर्मवाले हैं, व्यर्थ ज्ञानवाले हैं कि कुछ भी करें और कह दें कि हम तो कामना नहों करते, हो गये निष्काम कर्मयोगी| वे आसुरी स्वभाववाले मुझे नहीं परख पाते; किन्तु दैवी सम्पद् को प्राप्त जन अनन्य भाव से मेरा ध्यान करते हैं, मेरे गुणों का निरन्तर चिन्तन करते हैं| अनन्य उपासना अर्थात् यज्ञार्थ कर्म के दो ही मार्ग हैं| पहला है ज्ञानमार्ग अर्थात् अपने भरोसे, अपनी शक्ति को समझकर उसी नियत कर्म में प्रवृत्त होना और विधि स्वामी- सेवक भावना को है, जिसमें सद्गुरु के प्रति समर्पित होकर वहीं कर्म किया जाता है| इन्हों दो दृष्टियों से लोग मुझे उपासते हैं; किन्तु उनके द्वारा जो पार लगता है वह यज्ञ , वह हवन, वह कर्त्ता , श्रद्धा और औषधि- जिससे भवरोग को चिकित्सा होती है, मैं ही हूँ॰ अन्त में जो प्राप्त होतीं है, वह गति भी मैं ही हूँढ़ इसीं यज्ञ को लोग ' त्रैविद्याः प्रार्थना , यजन और समत्व दिलानेवाली विधियों से सम्पादित करते हैं; किन्तु बदले में स्वर्ग की कामना करते हैं तो मैं युगधर्मों इसके मूढ़लोग दूसरी
नवम अध्याय २२३ स्वर्ग भी देता हूँ| उसके प्रभाव से वे इन्द्रपद प्राप्त कर लेते हैं, दीर्घकाल तक उसे भोगते हैं; किन्तु पुण्य क्षीण होने पर वे पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं| उनको क्रिया सहीं थी; किन्तु भोगों की कामना रहने पर पुनर्जन्म पाते हैं| अतः भोगों की कामना नहों करनीं चाहिये| जो अनन्य भाव से अर्थात् ' मेरे सिवाय दूसरा है ही नहीं॰ - ऐसे भाव सेजो निरन्तर मेरा चिन्तन करते हैं , लेशमात्र भी त्रुटि न रह जाय- ऐसे जो भजते हैं, उनके योग की सुरक्षा का भार मैं अपने हाथ में ले लेता हूँढ़ इतना होने पर भी कुछ लोग अन्य देवताओं की पूजा करते हैं| वे भी करते हैं; किन्तु वह मेरी प्राप्ति की विधि नहीं है| वे सम्पूर्ण यज्ञों के भोक्ता के रूप में मुझे नहीं जानते अर्थात् उनकी पूजा के परिणाम में मैं नहीं मिलता , इसीलिये उनका पतन हो जाता है|वे देवता, भूत अथवा पितरों के कल्पित रूप में निवास करते हैं , जबकि मेरा भक्त साक्षात् निवास करता है , मेरा ही स्वरूप हो जाता है| योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस यज्ञार्थ कर्म को अत्यन्त सुगम बताया कि कोई फल- फूल या जो भी श्रद्धा से देता है , उसे मैं स्वीकार करता हूँ| अतः अर्जुन ! कुछ आराधना करता है , मुझे समर्पित करा जब सर्वस्व का न्यास हो जायेगा . तब योग से युक्त हुआ तू कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जायेगा और वह मुक्ति मेरा हीं स्वरूप है| दुनिया में सब प्राणी मेरे ही हैं| किसी भी प्राणी से न मुझे प्रेम है न द्वेष , मैं तटस्थ हूँ किन्तु जो मेरा अनन्य भक्त है, मैं उसमें हूँ और वह मुझमें है| अत्यन्त दुराचारी , जघन्यतम पापी ही कोई क्यों न हो, फिर भी अनन्य श्रद्धा - भक्ति से मुझे भजता है तो वह साधु मानने योग्य है| उसका निश्चय स्थिर है तो वह शीघ्र ही परम से संयुक्त हो जाता है और सदा रहनेवाली परमशान्ति को प्राप्त होता है| यहाँ श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि धार्मिक कौन है| सृष्टि में जन्म लेनेवाला कोई भी प्राणी अनन्य भाव से एक परमात्मा को भजता है उसका चिन्तन करता है तो वह शीघ्र ही धार्मिक हो जाता है| अतः धार्मिक वह है , जो एक परमात्मा का सुमिरन करता है| अन्त में आश्वासन देते हैं - अर्जुन! मेरा मेरी ही पूजा मुझमें तू जो
२१४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता भक्त कभी नष्ट नहों होता| कोई शूद्र हो , नीच हो , आदिवासीं हो या अनादिवासी या कुछ भी नामधारी हो, पुरुष अथवा स्त्री हो अथवा पापयोनि, तिर्यक् योनिवाला भी जो हो, मेरी शरण होकर परमश्रेय को प्राप्त होता है| इसलिये अर्जुन ! सुखरहित , क्षणभंगुर किन्तु दुर्लभ मनुष्य- शरीर को पाकर मेरा भजन कर| फिर तो जो ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाली अर्हताओं से युक्त है , उस ब्राह्मण तथा जो राजर्षित्व के स्तर से भजनेवाला है , ऐसे योगी के लिये कहना ही क्या है? वह तो पार ही है| अतः अर्जुन! निरन्तर मनवाला हो, निरन्तर नमस्कार करढ इस प्रकार मेरी शरण हुआ तू मुझे हो प्राप्त होगा, जहाँ से पोछे लौटकर नहीं आना पड़ता| प्रस्तुत अध्याय में उस विद्या पर प्रकाश डाला गया, जिसे स्वयं जागृत करते हैं| यह राजविद्या है, जो एक बार जागृत होने पर निश्चित कल्याण करतीं है| अतः- ३४ँ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्नीतासूपनिषत्सु बह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे ' राजविद्याजागृति ' नाम नवमो उध्याय :११९| | इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में राजविद्या - जागृति' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण होता है| इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः यथार्थगीता भाष्ये ' राजविद्याजागृति नाम नवमोडध्यायः १९| | इस प्रकार श्रोमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामो अड़गड़ानन्दकृत श्रीमद्भगवद्गीता के भाष्य यथार्थ गीता' में ` राजविद्या- जागृति' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण होता है| हरिः ३ँ तत्सत्| मुझमें श्रीकृष्ण
३ँ० श्री परमात्मने | || अथ दशमोडध्यायः ठ गत अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गुप्त राजविद्या का चित्रण किया जो निश्चित ही कल्याण करती है॰ इस अध्याय में उनका कथन है- महाबाहु अर्जुन ! मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को फिर यहाँ उसी को दूसरी बार कहने की आवश्यकता क्या है? वस्तुतः साधक को पूर्तिपर्यन्त खतरा है| ज्यों-ज्यों वह स्वरूप में ढलता जाता है , प्रकृति के आवरण सूक्ष्म होते जाते हैं , नये-्नये दृश्य आते हैं| उसको जानकारी महापुरुष ही देते रहते हैं| वह नहीं जानता | यदि वे मार्गदर्शन करना बन्द कर दें तो साधक स्वरूप को उपलब्धि से वंचित रहेगा| जब तक वह स्वरूप से दूर है , तब तक सिद्ध है कि प्रकृति का कोई-्न-कोई आवरण बना है| फिसलने- लड़खड़ाने को सम्भावना बनी रहती है| अर्जुन शरणागत शिष्य है| उसने कहा - शिष्यस्तेउहं शाधि मां त्वां प्रपन्रम्| भगवन् ! मैं आपका शिष्य आपको शरण हूँ॰ मुझे सँभालिये| अतः उसके हित कोी कामना से योगेश्वर श्रीकृष्ण पुनः बोले- श्रीभगवानुवाच भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः | यत्तेउ्हं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया| १११ | महाबाहु अर्जुन ! मेरे परम प्रभावयुक्त वचन को पुनः सुन, = अतिशय प्रेम रखनेवाले के हित की इच्छा से कहूँगा| न मे सुरगणाः न महर्षयः अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः १२१| अर्जुन ! मेरी उत्पत्ति को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिगण ही जानते हैं| श्रीकृष्ण ने कहा था, जन्म कर्म च मे दिव्यम् - मेरा वह जन्म और कर्म अलौकिक है , इन चर्मचक्षुओं से देखा नहों जा सकता| इसलिये मेरे नमः भी सुनः जो मैं तुझ विदुः प्रभवं
२२६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता उस प्रकट होने को देव और महर्षि स्तर तक पहुँचे हुए लोग भी नहों जानते| मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का आदि कारण हूँढ़ मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्| असम्मूढः स सर्वपापैः प्रमुच्यते११३१| जो मुझ जन्म-्मृत्यु से रहित, आदि-अन्त से रहित सब लोकों के महान् ईश्वर को साक्षात्कारसहित विदित कर लेता है, वह पुरुष मरणधर्मा मनुष्यों में ज्ञानवान् है अर्थात् अज , अनादि और सर्वलोक महेश्वर को भली प्रकार जानना ही ज्ञान है और ऐसा जाननेवाला सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है, पुनर्जन्म को प्राप्त नहों होता| श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह उपलब्धि भी मेरी हीं देन है| बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः| सुखं दुःखं भवोउभावो भयं चाभयमेव चढ१४१ | अर्जुन! निश्चयात्मिका बुद्धि, साक्षात्कारसहित जानकारी , लक्ष्य में विवेकपूर्वक प्रवृत्ति , क्षमा , शाश्वत सत्य, इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, अन्तःकरण को प्रसत्रता , चिन्तन पथ के कष्ट परमात्मा की जागृति , स्वरूप के प्राप्तिकाल में सर्वस्व का विलय, इष्ट के प्रति अनुशासनात्मक भय और निर्भयता तथा- अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोउ्यशः| भवन्ति भावा भूतानां एव पृथग्विधाः| १५/ | अहिंसा अर्थात् अपने आत्मा को अधोगति में न पहुँचाने का आचरण समता - जिसमें विषमता न हो, सन्तोष , तप- मनसहित इन्द्रियों को लक्ष्य के अनुरूप तपाना , दान अर्थात् सर्वस्व का समर्पण , भगवत्पथ में मान-्अपमान का सहन - इस प्रकार प्राणियों के उपर्युक्त भाव हीं होते हैं॰ ये सभी भाव दैवीं चिन्तन- पद्धति के लक्षण हैं| इनका अभाव ही आसुरी सम्पद् है| महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा| मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः| १६१ | मर्त्येषु प्रकृति से मत्त मुझसे
दशम अध्याय २१७ सप्तर्षि अर्थात् योग की सात क्रमिक भूमिकाएँ ( शुभेच्छा , सुविचारणा, तनुमानसी , सत्त्वापत्ति , असंसक्ति , पदार्थभावना और तुर्यगा ) तथा इनके अनुरूप अन्तःकरण चतुष्टय ( मन, बुद्धि , चित्त और अहंकार ) , इसके अनुरूप मन जो मेरे में भाववाला है- यह सब मेरे ही संकल्प से ( मेरी प्राप्ति के संकल्प से तथा जो मेरी ही प्रेरणा से होते हैं| दोनों एक दूसरे के पूरक हैं ) उत्पन्न होते हैं| इस संसार में ये (सम्पूर्ण दैवीं सम्पद्) इन्हों की प्रजा है| क्योंकि सप्त भूमिकाओं के संचार में दैवी सम्पद् हीं है, अन्य नहों| एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः सोउविकम्पेन योगेन नात्र संशयः १७| | जो पुरुष योग की और मेरी उपर्युक्त विभूतियों को साक्षात्कार के साथ जानता है , वह स्थिर ध्यानयोग द्वारा एकीभाव से स्थित होता है| इसमें कुछ भी संशय नहों है| जिस प्रकार स्थान में रखे दीपक की लौ सीधी जाती है, कम्पन नहों होता , योगी के जोते हुए चित्त की यहीं परिभाषा है| प्रस्तुत श्लोक में अविकम्पेन' शब्द इसी आशय को ओर संकेत करता है| अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते| इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्चिताः११८१1 मैं सम्पूर्ण जगत् को उत्पत्ति का कारण हूँ , मुझसे हीं सम्पूर्ण जगत् चेष्टा करता है- इस प्रकार मानकर श्रद्धा और भक्ति से युक्त विवेकीजन मेरा निरन्तर भजन करते हैं| तात्पर्य यह है कि योगी द्वारा मेरे अनुरूप जो प्रवृत्ति होती है, उसे मैं ही किया करता हूँ| वह मेरा ही प्रसाद है॰ ( कैसे है? इसे पोछे स्थान-स्थान पर बताया जा चुका है॰ ) वे निरन्तर भजन किस प्रकार हैं? इस पर कहते हैं- मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम| कथयन्तश्च मां नित्यं च रमन्ति चढ़१९|| अन्य किसी को स्थान न देकर ही निरन्तर चित्त को लगानेवाले, ही प्राणों को लगानेवाले सदैव परस्पर मेरी प्रक्रियाओं का बोध करते हैं| मेरा गुणगान करते हुए ही सन्तुष्ट होते हैं तथा निरन्तर ही रमण करते हैं| युज्यते मुझमें वायुरहित करते तुष्यन्ति मुझमें मुझमें मुझमें
२१८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्| ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते१११०१| निरन्तर मेरे ध्यान में लगे हुए तथा प्रेमपूर्वक भजनेवाले उन भक्तों को मैं वह बुद्धियोग अर्थात् योग में प्रवेशवाली बुद्धि देता हूँ॰ जिससे वे मुझे प्राप्त होते हैं अर्थात् योग को जागृति ईश्वर को देन है| वह अव्यक्त पुरुष महापुरुष योग में प्रवेश दिलानेवाली बुद्धि कैसे देता है? - तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता| १११| | उनके ऊपर पूर्ण अनुग्रह करने के लिये मैं उनकी आत्मा से अभिन्न खडा होकर , रथी होकर अज्ञान से उत्पन्न हुए अन्धकार को ज्ञानरूपी दोपक के द्वारा प्रकाशित कर नष्ट करता हूँ वस्तुतः किसी स्थितप्रज्ञ योगी द्वारा जब तक वह परमात्मा आपके आत्मा सेहो जाग्रत होकर पल-्पल पर संचालन नहों करता , रोकथाम नहों करता , इस प्रकृति के द्वन्द्व से निकालते हुए स्वयं आगे नहों ले चलता, तब तक वास्तव में यथार्थ भजन आरम्भ हीं नहों होता| वैसे तो भगवान सर्वत्र से बोलने लगते हैं , लेकिन प्रारम्भ में वे स्वरूपस्थ महापुरुष द्वारा ही बोलते हैं॰ यदि ऐसा महापुरुष आपको प्राप्त नहों है तोवे स्पष्ट नहीं बोलेंगे| इष्ट , सद्गुरु अथवा परमात्मा का रथी होना एक ही बात है| साधक को आत्मा से जागृत हो जाने पर उनके निर्देश चार प्रकार से मिलते हैं॰ पहले स्थूलसुरा - सम्बन्धी अनुभव होता है| आप चिन्तन में बैठे हैं| कब आपका मन लगनेवाला है? कितनी सीमा तक लग गया है? कब मन भागना चाहता है और कब भाग गया? इसको हर मिनट- सेकेण्ड पर इष्ट अंग- स्पंदन से संकेत करते हैं| अंगों का फड़कना स्थूलसुरा- सम्बन्धी अनुभव है, जो एक पल में दो-चार स्थानों पर एक साथ आता है और विचारों के हो जाने पर मिनट- मिनट पर आने लगेगा| यह संकेत तभी आता है, जब इष्ट के स्वरूप को आप अनन्य भाव से पकड़ें अन्यथा साधारण जीवों में संस्कार के टकराव से अंग-स्पन्दन होते रहते हैं , जिनका इष्टवालों से कोई सम्पर्क नहों है| विकृत
दशम अध्याय २१९ दूसरा अनुभव स्वप्नसुरा-्सम्बन्धी होता है साधारण मनुष्य अपनी वासनाओं से सम्बन्धित स्वप्न देखता है; किन्तु जब आप इष्ट को पकड़ लेेंगे तो यह सपना भी निर्देश में बदल जाता है॰ योगी सपना नहीं देखता, होनी देखता है| उपर्युक्त दोनों अनुभव प्रारम्भिक हैं, किसी तत्त्वस्थित महापुरुष के सान्निध्य से, मन में उनके प्रति श्रद्धा रखने मात्र से, उनको टूटी-्फूटीं सेवा से भी जागृत हो जाते हैं; किन्तु इन दोनों से भी सूक्ष्म शेष दो अनुभव क्रियात्मक हैं, जिन्हें चलकर ही देखा जा सकता है| तोसरा अनुभव सुषुप्ति सुरा- सम्बन्धी होता है| संसार में सब सोते ही तो हैं| मोहनिशा में सभी अचेत पडे़े हैं| रात-दिन जो कुछ करते हैं , स्वप्न ही तो है| यहाँ सुषुप्ति का शुद्ध अर्थ है , जब परमात्मा के चिन्तन की ऐसी डोरी लग जाय कि सुरत ( ख्याल) एकदम स्थिर हो जाय, शरीर जागता रहे और मन सुप्त हो जाय| ऐसी अवस्था में वह इष्टदेव फिर अपना एक संकेत देंगे| योग की अवस्था के अनुरूप एक रूपक ( दृश्य ) आता है जो सही दिशा प्रदान करता है, भूत- भविष्य से अवगत कराता है॰ ' पूज्य महाराज जी' कहा करते थे कि डाक्टर जैसे बेहोशी की दवा देकर, उचित उपचार देकर होश में लाता है ऐसे ही भगवान बता देते हैं| चौथा और अन्तिम अनुभव समसुरा -सम्बन्धी है| जिसमें सुरत लगायी थी॰, उस परमात्मा से समत्व प्राप्त हो गया| उसके बाद उठते बैठते , चलते- फिरते सर्वत्र से उसे अनुभूति होने लगती है| ऐसा योगी त्रिकालज्ञ होता है| यह अनुभव तोनों कालों से परे अव्यक्त स्थितिवाले महापुरुष आत्मा से जागृत होकर अज्ञानजनित अन्धकार को ज्ञानदीप से नष्ट करके करते हैं| इस पर अर्जुन ने प्रश्न किया - अर्जुन उवाच परं बह्मा परं धाम पवित्रं परमं भवान्| शाश्वतं दिव्यामादिदेवमजं ११२| | आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्वीषि मे१११३१| विभुम् ' पुरुषं
२२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता भगवन् ! आप परमब्रह्म परमधाम तथा परमपवित्र हैं; क्योंकि आपको सभी ऋषिगण सनातन दिव्यपुरुष , देवों का भी आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं| परमपुरुष, परमधाम का ही पर्याय दिव्यपुरुष, अजन्मा आदि शब्द हैं| देवर्षि नारद , असित, देवल, व्यास तथा स्वयं आप भी मुझसे वही कहते हैं| अर्थात् पहले भूतकालीन महर्षि कहते हैं, अब वर्तमान में जिनकी संगत उपलब्ध है- नारद, देवल, असित और व्यास का नाम लिया , जो अर्जुन के समकालीन थे ( सत्पुरुषों को संगति अर्जुन को प्राप्त थी ) , आप भी वही कहते हैं| अतः- सर्वमेतदृतं मन्यो यन्मां वदसि केशव| न हि ते भगवन्च्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः१११४१| हे केशव ! भी आप मेरे लिये कह रहे हैं, वह सब मैं सत्य मानता हू आपके व्यक्तित्व को न देवता और न दानव हीं जानते हैं| स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम| भूतभावन भूतेश देवदेव जिगत्पते१११५१| हे भूतों को उत्पन्रन करनेवाले ! हे भूतों के ईश्वर ! हे देवदेव ! हे जगत् के स्वामी हे में उत्तम स्वयं आप हीं अपने को जानते हैं अथवा जिसको आत्मा में जागृत होकर आप जना देते हैं , वही जानता है| यह भी आपके द्वारा आपका जानना हुआ| इसलिये - वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि| ११६/ | आप ही अपनी उन दिव्य विभूतियों को सम्पूर्ण रूप से, लेशमात्र भी शेष न रखकर कहने में सक्षम हैं , जिन विभूतियों द्वारा आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं| कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् केषु केषु च भावेषु चिन्त्योउसि भगवन्मयात११७१ | हे योगिन्! ( श्रीकृष्ण एक योगी थे) मैं किस प्रकार निरन्तर चिन्तन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन्! मैं किन-किन भावों द्वारा आपका स्मरण करूँ? जो कुछ पुरुषों
दशम अध्याय २२२ विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन| भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेउमृतम्ा१८१| हे जनार्दन ! अपनी योगशक्ति को और योग की विभूति को फिर भी विस्तारपूर्वक कहिये| संक्षेप में तो इसी अध्याय के आरम्भ में कहा ही है पुनः कहिये; क्योंकि अमृत -्तत्त्व को दिलानेवाले इन वचनों को सुनने से मेरी तृप्ति नहों होती| रामचरित सुनत अघाहीं| रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं| | रामचरितमानस , ७/५२/१ ) जब तक प्रवेश नहों मिल जाता तब तक उस अमृत ्तत्त्व को जानने को पिपासा बनी रहती है| प्रवेश से पूर्व रास्ते में हीं यह सोचकर कोई बैठ गया कि बहुत जान लिया तो उसने नहों जाना| सिद्ध है कि उसका मार्ग अवरुद्ध होना चाहता है| इसलिये साधक को पूर्तिपर्यन्त इष्ट के निर्देशन को पकड़ते रहना चाहिये और उसे आचरण में ढालना चाहिये| अर्जुन की उक्त जिज्ञासा पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहा- श्रीभगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे१११९१| अर्जुन ! अब मैं अपनी दिव्य विभूतियों को, उनमें से प्रमुख विभूतियों को कहूँगा; क्योंकि मेरी विभूतियों के विस्तार का अन्त नहों है॰ अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव चढ़१२०|| अर्जुन ! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों का आदि , मध्य और अन्त भी मैं ही हूँ अर्थात् जन्म , मृत्यु और जीवन भी मैं ही हूँ कुरुश्रेष्ठ तुझसे
२२२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्| मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी| १२१| | मैं अदिति के बारह पुत्रों में और ज्योतियों में प्रकाशमान सूर्य हूँ| भेदों में मैं मरीचि नामक वायु और नक्षत्रों में चन्द्रमा हूँ वेदानां सामवेदोडस्मि देवानामस्मि वासवः| इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतनात१२२१| वेदों में मैं सामवेद अर्थात् पूर्ण समत्व दिलानेवाला गायन हूँ | देवों में मैं उनका अधिपति इन्द्र हूँ और इन्द्रियों में मन हूँ क्योंकि मन के निग्रह से ही मैं जाना जाता हूँ तथा प्राणियों में मैं उनकी चेतना हूँ॰ शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्| पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् २३१ | एकादश रुद्रों में मैं शंकर हूँ| शङ्क अरः स शंकरः अर्थात् शंकाओं से उपराम अवस्था में हूँ| तथा राक्षसों में मैं धन का स्वामी कुबेर हूँ॰ आठ वसुओं में मैं अग्नि और शिखरवालों में सुमेरु अर्थात् शुभों का मेल मैं हूँ॰ वही सर्वोपरि शिखर है, न कि कोई पहाडी| वस्तुतः यह सब योग ्साधना के प्रतीक हैं, यौगिक शब्द हैं| पुरोधसां च मां पार्थ बृहस्पतिम्| सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः १२४ | पुर की रक्षा करनेवाले पुरोहितों में बृहस्पति मुझे ही जान, जिससे दैवी सम्पद् का संचार होता है और हे पार्थ ! सेनापतियों में मैं स्वामी कार्तिकेय हूँ| कर्म का त्याग ही कार्तिक है, जिससे चराचर का संहार , प्रलय और इष्ट की प्राप्ति होती है| जलाशयों में मैं समुद्र हूँ॰ महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्टेकमक्षरम्| यज्ञानां जपयज्ञोउस्मि स्थावराणां हिमालयः १२५| | महर्षियों में मैं भृगु हूँ और वाणी में एक अक्षर ३४ँ कार हूँ, जो उस ब्रह्म का परिचायक है सब प्रकार के यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ| यज्ञ परम में प्रवेश विष्णु = वायु के रुद्राणां वसूनां यक्ष मुख्यं विद्धि
दशम अध्याय २२३ दिला देनेवाली आराधना की विधि-विशेष का चित्रण है| उसका सारांश है स्वरूप का स्मरण और नाम का जप| दो वाणियों से पार हो जाने पर नाम जब यज्ञ की श्रेणी में आता है तो वाणी से नहों जपा जाता, न चिन्तन से, न कण्ठ सेः बल्कि वह श्वास में जागृत हो जाता है| केवल सुरत को श्वास के पास लगाकर मन से अविरल चलना भर पड़ता है॰ यज्ञ को श्रेणीवाले नाम का उतार चढ़ाव श्वास पर निर्भर है| यह क्रियात्मक है| स्थिर रहनेवालों में मैं हिमालय हूँ॰ शीतल , सम और अचल एकमात्र परमात्मा है| जब प्रलय हुआ , तब मनु उसी शिखर में बँध गया| अचल , सम और शान्त ब्रह्म का प्रलय नहों होता| उस ब्रह्म को पकड़ मैं हूँ| अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः| गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्द्धानां कपिलो मुनिः| १२६/ | सब वृक्षों में मैं अश्वत्थ हूँ| अश्वः -कल तक भी जिसके रहने को गारण्टी नहों दी जा सकती , ऐसा ' ऊर्ध्वमूलमधःशाखम् अश्वत्थम् ( १५/१ )- ऊपर परमात्मा जिसका मूल है, नीचे प्रकृति जिसकी शाखाएँ हैं, ऐसा संसार ही एक वृक्ष है , जिसे पोपल को संज्ञा दी गयो है| सामान्य पीपल का वृक्ष नहों करने लगें| इसी पर कहते हैं कि वह मैं हूँ और देवर्षियों में मैं नारद हूँ॰ नादस्य रंध्रः स नारदः दैवीं सम्पद् सूक्ष्म हो गयी कि स्वर में उठनेवाली ध्वनि ( नाद) पकड़ में आ जाय, ऐसी जागृति मैं हूँ| गन्धर्वों में मैं चित्ररथ हूँ अर्थात् गायन ( चिन्तन ) करनेवाली प्रवृत्तियों में जब स्वरूप चित्रित होने लगे , वह अवस्था-विशेष मैं हूँ॰ सिद्धों में मैं कपिल मुनि हूँ॰ काया ही कपिल है| जब लव लग जाय , ऐसी ईश्वरीय संचार को अवस्था मैं हूँ| उच्चै:श्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्| ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् २७१ | घोड़ों में मैं अमृत से उत्पन्न होनेवाला उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा हूँ दुनिया में हर वस्तु नाशवान् है| आत्मा ही अजर-अमर , अमृतस्वरूप है| इस अमृतस्वरूप से जिसका संचार है, वह घोडा मैं हूँ॰ घोडा गति का प्रतीक है| आत्मतत्त्व को ग्रहण करने में मन जब उधर गति पकड़ता है, घोड़ा है| ऐसीं कि पूजा इतनी इसमें
२२४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता गति मैं हूँ| हाथियों में ऐरावत नामक हाथी मैं हूँ॰ मनुष्यों में राजा मुझको जान| वस्तुतः महापुरुष ही राजा है, जिसके पास अभाव नहों है| आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः| | २८१| शस्त्रों में मैं वज्र हूँ| गायों में कामधेनु हूँ॰ कामधेनु कोई ऐसी गाय नहीं है, जो दूध के स्थान पर मनचाहा व्यंजन परसती हो| ऋषियों में वशिष्ठ के पास कामधेनु थी| वस्तुतः गो' इन्द्रियों को कहते हैं| इन्द्रियों का संयत होना इष्ट को वश में रखनेवाले में पाया जाता है| जिसको इन्द्रियाँ ईश्वर के अनुरूप स्थिर हो जाती हैं , उसके लिये उसी की इन्द्रियाँ ' कामधेनु' बन जाती हैं| फिर तो'जो इच्छा मन माहीं| हरि प्रसाद कछु नाहीं|| ' रामचरितमानस , ७/११३/४ ) उसके लिये कुछ भी नहों रहता प्रजनन करनेवालों में नवीन स्थितियों को प्रकट करनेवाला मैं हूँ॰ प्रजनन - एक तो लड़का बाहर पैदा किया जाता है , चराचर में रात-दिन पैदा ही होते हैं , चूहे - चींटी रात-दिन करते हैं - ऐसा नहीं , बल्कि एक स्थिति से स्थिति , इस प्रकार वृत्तियों का परिवर्तन होता है| वह परिवर्तित स्वरूप मैं हूँ| सर्पों में मैं वासुकि हूँढ़ अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्| पितृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् २९१| नागों में मैं अनन्त अर्थात् शेषनाग हूँ| वैसे यह कोई सर्प नहों है| गीता की समकालीन पुस्तक श्रीमद्भागवत में इसके रूप की चर्चा है कि इस पृथ्वी से तीस हजार योजन की दूरी पर परमात्मा की वैष्णवी शक्ति है, जिसके सिर पर यह पृथ्वी सरसों के दाने की तरह भाररहित टिकी है| उस युग में योजन का पैमाना चाहे जो रहा हो, फिर भी यह पर्याप्त वस्तुतः यह आकर्षण शक्ति का चित्रण है| वैज्ञानिकों ने जिसे ईथर माना है| ग्रह उपग्रह सभी उसी शक्ति के आधार पर टिके हैं| उस शून्य में ग्रहों का कोई भार भी नहों है| वह शक्ति सर्प को को तरह सभी ग्रहों को लपेटे है॰ यहीं है वह अनन्त जिससे पृथ्वी धारण की जाती है॰ श्रीकृष्ण कहते हैं- ऐसीं ईश्वरीय शक्ति मैं दुर्लभ करिहहु दुर्लभ दूसरी दूर है॰ कुण्डलो
दशम अध्याय २२५ हूँ| जलचरों में उनका अधिपति वरुण हूँ तथा पितरों में अर्यमा' हूँ| अहिंसा , सत्य , अस्तेय , ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह पाँच यम हैं| इनके पालन में आनेवाले विकारों को काटना ' अरः' है| विकारों के शमन से पितृ अर्थात् भूत-संस्कार तृप्त होते हैं, निवृत्ति प्रदान कर देते हैं| शासन करनेवालों में मैं यमराज अर्थात् उपर्युक्त यमों का नियामक हूँ प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्| मृगाणां च मृगेन्द्रोउहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्३ ३०१| मैं दैत्यों में प्रह्लाद हूँ॰ (पर + आह्लाद-पर के लिये आह्लाद ) प्रेम ही प्रह्लाद है| आसुरी सम्पद् में रहते हुए ईश्वर के लिए आकर्षण- विकलता आरम्भ होती है , जिससे परमप्रभु का दिग्दर्शन होता है , ऐसा प्रेमोल्लास मैं हूँढ़ गिनती करनेवालों में मैं समय हूँ॰ एक, दो, तीन, चार ऐसी गिनती या क्षण, घडीं , दिन, पक्ष मास इत्यादि नहीं , बल्कि ईश्वर के चिन्तन में लगा हुआ समय मैं हूँ॰ यहाँ तक कि ' जागत में सुमिरन करे , सोवत में लव लाय| अनवरत चिन्तन में समय मैं हूँ| में मृगराज [ योगी ( जंगल ) ग ( गमन करना ) अर्थात् योगरूपी जंगल में गमन करनेवाला है] तथा पक्षियों में गरुड़ मैं हूँ॰ ज्ञान हीं जब ईश्वरीय अनुभूति आने लगती है, तब यहीं मन अपने आराध्य को सवारीं बन जाता है और जब यही मन संशय से तब सर्प होता है , डसता रहता है , योनियों में फेँकता है| गरुड़ को सवारी है|जो सत्ता विश्व में अणुरूप से संचारित है, ज्ञानसंयुक्त मन उसे अपने में धारण करता है, उसका वाहक बनता है| श्रीकृष्ण कहते हैं, इष्ट को धारण करनेवाला मन मैं हूँ| पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्| झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि १३२| | पवित्र करनेवालों में मैं वायु हूँ, शस्त्रधारियों में राम हूँ॰ ' रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः योगी किसमें रमण करते हैं? अनुभव में| ईश्वर इष्टरूप में जो निर्देशन देता है, योगी उसमें रमण करते हैं॰ उस जागृति का नाम राम है और वह जागृति मैं हूँ॰ मछलियों में मगर तथा नदियों में गंगा मैं हूँढ़ पशुओं भी मृ गरुड़ है| युक्त है विष्णु = जाह्नवी|
२२६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन| अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् १३२१ | हे अर्जुन! सृष्टियों का आदि, अन्त और मध्य मैं ही हूँ॰ विद्याओं में अध्यात्मविद्या मैं हूँ॰ जो आत्मा का आधिपत्य दिला दे , वह विद्या मैं हूँ॰ संसार में अधिकांश प्राणी माया के आधिपत्य में हैं॰ राग , द्वेष , काल, कर्म , स्वभाव और गुणों से प्रेरित हैं| इनके आधिपत्य से निकालकर आत्मा के आधिपत्य में ले जानेवाली विद्या मैं हूँ॰ जिसे अध्यात्मविद्या कहते हैं॰ परस्पर होनेवाले विवादों में, ब्रह्मचर्चा में जो निर्णायक है, ऐसी वार्त्ता मैं हूँ॰ शेष निर्णय तो अनिर्णीत होते हैं| अक्षराणामकारो उस्मि द्वद्द्वः सामासिकस्य च| अहमेवाक्षयः कालो धाताहं ११३३| | मैं अक्षरों में अकार ओंकार तथा समासों में द्वन्द्व नामक समास हूँ ( साधना को उन्नत अवस्था में मन सिमटते सिमटते केवल साधक और इष्ट आमने - सामने रह जाते हैं, शेष कोई संकल्प नहों रह जाता , स्वामी सेवक में संघर्ष है; किन्तु द्वन्द्व की यह अवस्था भगवान को देन है ) अक्षयकाल मैं हूँ| काल सदैव परिवर्तनशील है; वह समय जो अक्षय, अजर, अमर परमात्मा में प्रवेश दिलाता है वह अवस्था मैं हूँ| विराट् स्वरूप अर्थात् सर्वत्र व्याप्त, सबको धारण - पोषण करनेवाला भी मैं ही हूँढ़ मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्| कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमात १३४१ | मैं सबका नाश करनेवाला मृत्यु और आगे होनेवालों की उत्पत्ति का कारण हूँ॰ स्त्रियों में मैं यश, शक्ति , वाक्पटुता , स्मृति , मेधा अर्थात् बुद्धि, धैर्य और क्षमा हूँढ़ योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार ,' द्वाविमौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च| ( अध्याय १५/१६ )- पुरुष दो ही प्रकार के होते हैं , क्षर और अक्षर| सम्पूर्ण को उत्पत्ति और विनाशवाले ये शरीर क्षर पुरुष हैं॰ ये नर, विश्वतोमुखः किन्तु पुरुषौ - भूतादिकों
दशम अध्याय २ २७ मादा, पुरुष अथवा भो कहलाएँ, श्रीकृष्ण के शब्दों में पुरुष ही हैं| दूसरा है अक्षर पुरुष, जो कूटस्थ चित्त के स्थिर काल में देखने में आता है| यही कारण है कि इस योगपथ में सभी समान स्थिति के महापुरुष होते आये हैं| किन्तु यहाँ स्मृति , शक्ति , बुद्धि इत्यादि स्त्रियों के बताये गये| क्या इन सद्गुणों की आवश्यकता के लिये नहों है? कौन ऐसा पुरुष है जो श्रीमान्, कोर्तिमान्, स्मरणशक्तिसम्पन्न , मेधावी , धैर्यवान् और क्षमावान् नहों बनना चाहताः बौद्धिक स्तर पर कमजोर लड़कों में इन्हों गुणों का विकास करने के लिये माता-पिता पढ़़ाई की अतिरिक्त व्यवस्था करते हैं॰ यहाँ कहते हैं कि॰ये लक्षण केवल स्त्रियों में पाये जाते हैं॰ ये गुण अर्जुन में भी थे, जबकि अर्जुन नर है| युद्ध के आरम्भ में ही वह पीछे हट गया - भले हीो शस्त्रधारी कौरव मुझे मार डालें , गोविन्द! मैं युद्ध नहों करूँगा| भगवान ने कहा- अर्जुन! यदि तुम इस धर्ममय युद्ध को नहों करोगे तो स्वधर्म , कीर्ति और यश खोकर पाप को प्राप्त होगे| वैरी लोग तुम्हारी अपकीर्ति का दीर्घकाल तक गायन करेंगे| माननीय पुरुष के लिये अपकोर्ति मृत्यु से भी बढकर होती है| यहाँ पुरुष के लिये भो कीर्ति आवश्यक बताया गयाम गोता के समापन पर संजय ने निर्णय दिया कि जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं , धनुर्धर पार्थ है वहीं श्रीः है, विजय है , विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है| कीर्ति, श्रीः, विभूति- ये गुण तो नारियों के हैं, अर्जुन के साथ कैसे? अध्याय १५/१५ में भगवान् कहते हैं, सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृति्ज्ञानमपोहनं च१ - अर्जुन! मैं सबके हृदय में समाविष्ट होकर सदा निवास करता हूँ| बुद्धि , स्मृति , ज्ञान ( वास्तविक जानकारी ) और विकारों से अलग रहने की क्षमता मेरी देन है| वस्तुतः मानव को चित्तवृत्ति ही नारी' है| शरीर तो वस्त्र मात्र है| स्त्री , पुरुष, नपुंसक इत्यादि शरीर की आकृतियाँ हैं, स्वरूप की नहीं| शरीर के अन्तराल में चित्तवृत्ति प्रकृति की ओर स्वयमेव प्रवाहमान है| इन वृत्तियों में ईश्वरीय भाव, स्मृति , क्षमा इत्यादि गुण भगवान से ही प्रसारित स्त्रो कुछ स्त्रो- पुरुष ही गुण पुरुषों वक्ता, धैर्य, मेधा ,
२२८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता होते हैं| इन गुणों द्वारा मानव लोक में समृद्धि और परमश्रेय के पथ को प्रशस्त करता है| इन गुणों को धारण करना स्त्रीलिंग- पुलिंग सबके लिये उपयोगी है| जो मुझसे होते हैं॰ बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्| मासानां मार्गशीर्षोउहमृतूनां कुसुमाकरः| १३५/ | गायन करने योग्य में मैं बृहत्साम अर्थात् बृहत् से संयुक्त समत्व दिलानेवाला गायन हूँ अर्थात् ऐसी जागृति मैं हूँ| छन्दों में गायत्री छन्द मैं हूँ| गायत्री कोई ऐसा मन्त्र नहीं है जिसे पढ़ने से मुक्ति मिलती हो वरन् एक समर्पणात्मक छन्द है| तीन बार विचलित होने के पश्चात् ऋषि विश्वामित्र ने अपने को इष्ट के प्रति समर्पित करते हुए कहा- ' ३४ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि| धियो यो नः प्रचोदयात् अर्थात् भूः, भुवः और स्वः तीनों लोकों में तत्त्वरूप से व्याप्त देव ! आप ही वरेण्य हैं| हमें ऐसी बुद्धि दें, ऐसीं प्रेरणा करें कि हम लक्ष्य को प्राप्त कर लें| यह मात्र एक प्रार्थना है| साधक अपनी बुद्धि से यथार्थ निर्णय नहों ले पाता कि वह कब सही है और कब गलतः उसकी यह समर्पित प्रार्थना मैं हूँ, जिससे निश्चित कल्याण है; क्योंकि वह मेरे आश्रित हुआ है| मासों में शोर्षस्थ मार्ग मैं हूँ और जिसमें सदैव बहार हो ऐसी ऋतु, हृदय को ऐसी अवस्था भी मैं ही हूँ| द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्| जयोडस्मि व्यवसायोउस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्| १३६१ | तेजस्वी पुरुषों का तेज मैं हूँ | जुए में छल करनेवालों का छल मैं हूँ| तब तो अच्छा है कि जुआ खेलें , उसमें कलबल- छल करें , वहों भगवान हैं| नहों , ऐसा कुछ नहों है| यह प्रकृति ही एक जुआ है| यहीं ठगिनी है| इस प्रकृति के निकलने के लिये दिखावा छोड़कर छिपाव के साथ गुप्त रूप से भजन करना हीं छल है॰ छल है तो नहों , बचाव के लिये आवश्यक है| जड़भरत की तरह उन्मत्त, अन्धे-बहरे और गूँगे की तरह हृदय से जानकार होते हुए भो बाहर से ऐसे रहें कि अनजान हों, सुनते हुए भो न सुनें , देखते हुए भी न देखें| छिपकर ही भजन का विधान है , तभी साधक प्रकृति - पुरुष के जुए श्रुतियों द्वन्द्व से किन्तु
दशम अध्याय २२९ में पार पाता है| जीतनेवालों को विजय मैं हूँ और व्यवसायियों का निश्चय (जिसे अध्याय दो , श्लोक इकतालोस में कह आये हैं - इस योग में निश्चयात्मक क्रिया एक है , बुद्धि एक ही है , दिशा एक ही है ऐसो ) , क्रियात्मिका बुद्धि मैं हूँढ़ सात्त्विक का तेज और ओज मैं हूँ| वृष्णीनां वासुदेवोउस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः १३७१| वृष्णिवंश में मैं वासुदेव अर्थात् सर्वत्र वास करनेवाला देव हूँ॰ पाण्डवों में मैं धनंजय हूँ॰ पुण्य ही पाण्डु है और आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है| पुण्य से प्रेरित होकर आत्मिक सम्पत्ति को अर्जित करनेवाला धनंजय मैं हूँ॰ मुनियों में मैं व्यास हूँ॰ परमतत्त्व को व्यक्त करने को जिसमें क्षमता है वह मुनि मैं हूँ॰ कवियों में उशना अर्थात् उसमें प्रवेश दिलानेवाला काव्यकार मैं हूँढ़ दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्| मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्| |३८१| दमन करनेवालों में दमन को शक्ति मैं हूँ| जोतने को इच्छावालों को मैं नीति हूँ| गुप्त रखने योग्य भावों में मैं मौन हूँ और ज्ञानवानों में साक्षात् के साथ मिलनेवाली जानकारी, पूर्ण ज्ञान मैं हूँढ़ यच्चापि सर्वभूतानां गीजं तदहमार्जुन| न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ३९१ | अर्जुन ! सब भूतों की उत्पत्ति का कारण भी मैं हीं हूँड़ क्योंकि चर और अचर ऐसा कोई भी भूत नहों है जो मुझसे रहित हो| मैं सर्वत्र व्याप्त हूँ॰ सब मेरे हीं सकाश से हैं| नान्तोउस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप| एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मयात१४०१| परंतप अर्जुन ! मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है| अपनी विभूतियों का विस्तार तो मैंने संक्षेप में कहा है , वस्तुतः वे अनन्त हैं| पुरुषों
२३ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता इस अध्याय ही विभूतियों का स्पष्टीकरण किया गया है; क्योंकि अगले ही अध्याय में अर्जुन इन सबको देखना चाहता है| प्रत्यक्ष दर्शन से ही विभूतियाँ समझ में आती हैं| विचारधारा समझने के लिये इसी से अर्थ दिया गया| यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा| तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंउशसम्भवम् |४११ | जो-जो भी ऐश्वर्ययुक्त , कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तुएँ हैं, उन-उन को तू मेरे तेज के एक अंशमात्र से उत्पन्न हुआ जान| अथवा किं तवार्जुन| विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् |४२१ | अथवा अर्जुन ! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रयोजन है? मैं इस सम्पूर्ण जगत् को एक अंशमात्र से धारण करके स्थित हूँ| उपर्युक्त विभूतियों के वर्णन का तात्पर्य यह नहीं है कि आप या अर्जुन इन सभी को पूजने लगें , बल्कि श्रीकृष्ण का आशय केवल इतना ही है कि इन सब ओर से श्रद्धा समेटकर केवल उन अविनाशी परमात्मा में लगावें| इतने से ही उनका कर्त्तव्य जाता है॰ निष्कर्ष - इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा कि, अर्जुन ! मैं तुझे पुनः उपदेश करूँगा; क्योंकि तू मेरा अतिशय प्रिय है| पहले चुके हैं , फिर भी कहने जा रहे हैं; क्योंकि पूर्तिपर्यन्त सद्गुरु से सुनने की आवश्यकता रहती है॰ मेरी उत्पत्ति को न देवता और न महर्षिगण ही जानते हैं; क्योंकि मैं उनका भी आदि कारण हूँ| अव्यक्त स्थिति के पश्चात् की सार्वभौम अवस्था को वही जानता है, जो है| अजन्मा , अनादि और सम्पूर्ण लोकों के महान् ईश्वर को साक्षात्कारसहित जानता है वही ज्ञानी है| बुद्धि , ज्ञान , असंमूढ़ता , इन्द्रियों का दमन , मन का शमन, सन्तोष, तप, दान और कोर्ति के भाव अर्थात् दैवीं सम्पद् के उक्त लक्षण मेरी देन हैं| सात में कुछ थोड़ा बहुनैतेन ज्ञातेन वस्तुओं पूर्ण हो कह हो चुका जो मुझ
दशम अध्याय २३२ महर्षिजन अर्थात् योग की सात भूमिकाएँ, उससे भी पहले होनेवाले तदनुरूप अन्तःकरण चतुष्टय और इनके अनुकूल मन जो स्वयंभू है, स्वयं रचयिता है- ये सब भाववाले , लगाव और श्रद्धावाले हैं, जिनकी संसार में सम्पूर्ण प्रजा है,ये सब मुझसे ही उत्पन्न हैं अर्थात् साधनामयो प्रवृत्तियाँ मेरी हीं प्रजा हैं| इनकी उत्पत्ति अपने से नहीं , गुरु से होती है| जो उपर्युक्त मेरी विभूतियों को साक्षात् जान लेता है , वह निःसन्देह एकीभाव से प्रवेश करने योग्य है| अर्जुन ! मैं ही सबको उत्पत्ति का कारण हूँ - ऐसा जो श्रद्धा से जान लेते हैं वे अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हैं , निरन्तर मुझमें मन , बुद्धि और प्राणों से लगनेवाले होते हैं , आपस में मेरा गुण-चिन्तन और मुझमें रमण करते हैं| उन निरन्तर संयुक्त हुए पुरुषों को मैं योग में प्रवेश करानेवाली बुद्धि प्रदान करता हूँ॰ यह भी मेरी ही देन है| किस प्रकार बुद्धियोग देते हैं? तो अर्जुन ! ' आत्मभावस्थ उनको आत्मा में जागृत होकर खड़ा हो जाता हूँ और उनके हृदय में अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को ज्ञानरूपी दीपक से नष्ट करता हूँ अर्जुन ने प्रश्न किया कि भगवन्! आप परम पवित्र , सनातन, दिव्य, अनादि और सर्वत्र व्याप्त हैं- ऐसा महर्षिगण कहते हैं तथा वर्तमान में देवर्षि नारद , देवल, व्यास और आप भी वहीं कहते हैं| यह सत्य भी है कि आपको न देवता जानते हैं और न दानव , स्वयं आप जिसे जना दें वही जान पाता है आप ही अपनी विभूतियों को कहने में समर्थ हैं| अतः जनार्दन ! आप अपनी विभूतियों को विस्तार से कहिये| पूर्तिपर्यन्त इष्ट से सुनते रहने को उत्कण्ठा बनी रहनी चाहिये| आगे इष्ट के अन्तराल में क्या है, उसे साधक क्या जाने| इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने एक॰एक करके अपनी प्रमुख विभूतियों का लक्षण संक्षेप में बताया - जिनमें से कुछ तो योग-साधन में प्रवेश करने के साथ मिलनेवाली अन्तरंग विभूतियों का चित्रण है और शेष कुछ समाज में ऋद्धियों सिद्धियों के साथ पायी जानेवाली विभूतियों पर प्रकाश डाला और अन्त में उन्होंने बल कहा- अर्जुन! बहुत कुछ जानने से तेरा क्या प्रयोजन है? इस संसार में जो कुछ भी तेज और ऐश्वर्ययुक्त वस्तुएँ हैं , वह सब मुझमें मुझमें मुझसे देकर
२३२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता मेरे तेज के अंशमात्र में स्थित हैं| वस्तुतः मेरी विभूतियाँ अपार हैं| ऐसा कहते हुए योगेश्वर अध्याय का पटाक्षेप किया| इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने अपनो विभूतियों को मात्र बौद्धिक जानकारीं दी, जिससे अर्जुन को श्रद्धा सब ओर से सिमटकर एक लग जाय| किन्तु बन्धुओ सब कुछ सुन लेने और बाल की खाल निकालकर समझ लेने के बाद भी चलकर उसे जानना शेष ही रहता है| यह क्रियात्मक पथ है| सम्पूर्ण अध्याय में योगेश्वर को विभूतियों का हो वर्णन है| अतः ३४ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्नीतासूपनिषत्सु बह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे ' विभूतिवर्णनम् ' नाम दशमोडध्यायः ११०|| इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में विभूति वर्णन' नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण होता है| इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः यथार्थगीता ' भाष्ये ' विभूतिवर्णनम् ' नाम दशमो उध्यायः ११०| | इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य यथार्थ गीता' में विभूति वर्णन' नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण होता है| हरिः ३> तत्सत् | ने इस इष्ट में
३ँँ श्री परमात्मने नमः || अथैकादशोडध्यायः | गत अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपनी प्रधान- प्रधान विभूतियों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कियाः किन्तु अर्जुन को लगा कि उसने विस्तार से सुन लिया है| उसने कहा कि आपकी वाणी सुनने से मेरा सारा मोह नष्ट हा गया; आपने जो कहा, उसे प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ॰ सुनने और देखने में पश्चिम और पूर्व का अन्तर है| चलकर देखने पर वस्तुस्थिति कुछ और हीं होती है| अर्जुन ने उस रूप को देखा तो काँपने लगा, क्षमायाचना करने लगा| क्या ज्ञानी भयभीत होता है? क्या उसे कोई जिज्ञासा रह जाती है? नहीं, स्तर की जानकारी सदैव धूमिल रहती है| हाँ, वह यथार्थ जानकारी के लिये प्रेरणा अवश्य देती है| इसलिये अर्जुन ने निवेदन किया- अर्जुन उवाच मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम् यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोउ्यं विगतो मम|१११ | भगवन्! मुझ पर अनुग्रह करने के लिये जो आपके द्वारा गोपनीय अध्यात्म में प्रवेश दिलानेवाला उपदेश कहा गया, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया| मैं ज्ञानी हो गया| भवाप्ययौ हि श्रुतौ विस्तरशो मया| त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् |२१ | क्योंकि हे कमलनेत्र ! मैंने भूतों की उत्पत्ति और प्रलय को आपसे विस्तारपूर्वक सुना है तथा आपका अविनाशी प्रभाव भी सुना है| किन्तु बौद्धिक भूतानां
२३४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर| द्रष्टमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तमा १३१| हे परमेश्वर ! आप अपने को जैसा कहते हैं , यह ठीक वैसा ही है , कोई सन्देह नहों है, किन्तु मैँने उसे केवल सुना है| अतः हे पुरुषोत्तम ! उस ऐश्वर्ययुक्त स्वरूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टमिति प्रभो| योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् १४१ | हे प्रभो ! मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना सम्भव है, यदि आप ऐसा मानते हों , तो हे योगेश्वर ! आप अपने अविनाशी स्वरूप का मुझे दर्शन कराइये| इस पर योगेश्वर ने कोई प्रतिवाद नहों कियाः क्योंकि पहले भी वे स्थान-्स्थान पर कह आये हैं कि तू मेरा अनन्य भक्त और प्रिय सखा है| अतः बड प्रसन्नता के साथ उन्होंने अपना स्वरूप दरसाया- श्रीभगवानुवाच पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोध्थ सहस्रशः नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि चढ१५| | पार्थ! मेरे सैकड़ों तथा हजारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा आकृतिवाले दिव्य स्वरूप को देख| पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्चिनौ मरुतस्तथा| बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत| १६१ | हे भारत अदिति के बारह पुत्रों, आठ वसुओं , एकादश रुद्रों , दोनों अश्विनीकुमारों और उनचास मरुद्गणों को देख तथा अन्य बहुत से पहले द्वारा कभी न देखे हुए आश्चर्यमय रूपों को देख इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्| मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टमिच्छसि| १७१ | अर्जुन ! अब मेरे इस शरीर में एक ही स्थान पर स्थित हुए चराचरसहित सम्पूर्ण जगत् को देख तथा और भी जो कुछ देखना चाहता है, वह देख| इसमें तुम्हारे
एकादश अध्याय २३५ इस प्रकार तीनों श्लोकों तक भगवान लगातार दिखाते चले गये; अर्जुन को कुछ दिखायो नहों पड़ा ( वह आँखें मलता रह गया) | अतः ऐसा दिखाते हुए भगवान सहसा रुक जाते हैं और कहते हैं- न तु॰मां शक्यसे द्रष्टमनेनैव स्वचक्षुषा दिव्यं ददामि ते चक्षुः योगमैश्वरम्॰१८१ | अर्जुन! तू मुझे अपने नेत्रों द्वारा अर्थात् बौद्धिक दृष्टि द्वारा देखने में समर्थ नहों है इसलिये मैं तुझे दिव्य अर्थात् अलौकिक दृष्टि देता हूँ , जिससे तू मेरे प्रभाव और योगशक्ति को देख| इधर योगेश्वर श्रीकृष्ण के कृपा-प्रसाद से अर्जुन को वही दृष्टि प्राप्त हुई , उसने देखा और उधर योगेश्वर व्यास के कृपा-प्रसाद से वहीं दृष्टि संजय को मिली थी| अर्जुन ने देखा , अक्षरशः वही संजय ने भो देखा और उसके प्रभाव से अपने को कल्याण का भागी बनाया| स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण एक योगी के समकक्ष हैं| सञ्चय उवाच एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः| दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्ढ़१९१| संजय बोला - हे राजन् ! महायोगेश्वर हरि ने इस प्रकार कहकर उसके उपरान्त पार्थ को अपना परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्यस्वरूप दिखाया| जो स्वयं योगी हो और दूसरों को भो योग प्रदान करने को जिसमें क्षमता हो, जो योग का स्वामीं हो , उसे योगेश्वर कहते हैं| इसीं प्रकार सर्वस्व का हरण करनेवाला हरि है| यदि केवल दुःखों का हरण किया और सुख छोड़ दिया तो दुःख आयेगा| अतः सब पापों के नाश के साथ सर्वस्व का हरण करके अपना स्वरूप देने में जो सक्षम है , वह हरि है| उन्होंने पार्थ को अपना दिव्य स्वरूप दिखाया| सामने तो खड़े हीं थे| अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्धुतदर्शनम् अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ११०१| अनेक मुख और नेत्रों अनेक अद्भुत दर्शनोंवाले , अनेक दिव्य और अनेक दिव्य शस्त्रों को हाथों में उठाये हुए तथा- किन्तु पश्य मे जो कुछ से युक्त, भूषणों से युक्त
२३६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्| सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्११११| दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किये हुए, दिव्य गन्ध का अनुलेपन सब प्रकार आश्चर्यों से युक्त सीमारहित विराट्स्वरूप परमदेव को दृष्टि मिलने पर अर्जुन ने देखा| दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता| यदि भाः सदृशी सा स्याद्रासस्तस्य महात्मनः|११२१ | ( अज्ञानरूपी धृतराष्ट्र , संयमरूपीं संजय - जैसा पीछे आया है॰ ) संजय बोला- हे राजन ! आकाश में एक साथ हजार सूर्यों के उदय होने से जितना प्रकाश होता है वह भी विश्वरूप उन महात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित् ही हो| यहाँ श्रीकृष्ण महात्मा ही हैं, योगेश्वर थे| तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा| अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ११३ | पाण्डुपुत्र अर्जुन ने ( पुण्य ही पाण्डु है| पुण्य ही अनुराग को जन्म देता उस समय अनेक प्रकार से विभक्त हुए सम्पूर्ण जगत् को उन परमदेव के शरीर में एक जगह स्थित देखा| ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत| ११४१| इसके पश्चात् आश्चर्य से युक्त , हर्षित रोमोंवाला वह अर्जुन परमात्मदेव को शिर से प्रणाम करके ( पहले भी प्रणाम करता थाः किन्तु प्रभाव देखने पर सादर प्रणाम कर) हाथ जोड़कर बोला| यहाँ अर्जुन ने अन्तःकरण से नमन और कहा- अर्जुन उवाच पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् बह्याणमीशं कमलासनस्थ- मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्११५ | किये हुए, किया
एकादश अध्याय २३७ हे देव! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के को, कमल के आसन पर बैठे हुए ब्रह्मा को, महादेव को, सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ| यह प्रत्यक्ष दर्शन था, कोरी कल्पना नहों; किन्तु ऐसा तभी सम्भव है जब योगेश्वर , पूर्णत्व प्राप्त महापुरुष हृदय से दृष्टि प्रदान करें| यह साधनगम्य है| अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोउनन्तरूपम्| नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूपत११६१| विश्व के स्वामी ! मैं आपको अनेक हाथ , पेट , मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपोंवाला देखता हूँ| हे विश्वरूप ! न मैं आपके आदि को , न मध्य को और न अन्त को ही देखता हूँ अर्थात् आपके आदि , मध्य और अन्त का निर्णय नहों कर पा रहा हूँढ़ किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्| पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता- द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् १११७| | मैं आपको मुकुटयुक्त, गदायुक्त, चक्रयुक्त, सब ओर से प्रकाशमान तेजपुंज स्वरूप , प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश देखने अर्थात् कठिनाई से देखा जानेवाला और सब ओर से बुद्धि आदि से ग्रहण न हो सकनेवाला अप्रमेय देखता हूँ| इस प्रकार सम्पूर्ण इन्द्रियों से पूर्णतया समर्पित होकर योगेश्वर श्रीकृष्ण को इस रूप में देखकर अर्जुन उनको स्तुति करने लगा त्वमक्षरं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्| त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं मतो मे१४१८१| समुदायों में दुष्कर परमं पुरुषो
२३८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता भगवन् ! आप जानने योग्य परम अक्षर अर्थात् अक्षय परमात्मा हैं आप इस जगत् के परम आश्रय हैं आप शाश्वत- धर्म के रक्षक हैं तथा आप अविनाशी सनातन पुरुष हैं- ऐसा मेरा मत है| आत्मा का स्वरूप क्या है? शाश्वत है , सनातन है, अव्यक्त रूप है, अविनाशी है| यहाँ श्रीकृष्ण का क्या स्वरूप है? वहीं शाश्वत , सनातन , अव्यय , अविनाशी अर्थात् प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष भी उसी आत्मभाव में स्थित होता है| तभी तो भगवान और आत्मा एक ही लक्षणवाले हैं| अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य - मनन्तगाहुं शशिसूर्यानेत्रम्| पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्|११९१ | हे परमात्मन्! मैं आपको आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त , अनन्त हाथोंवाला ( पहले हजारों थे, अब अनन्त हो गये) , चन्द्रमा और सूर्यरूपी नेत्रोंवाला (तब तो भगवान काने हो गये| एक आँख चन्द्रमा की तरह क्षीण प्रकाशवाली और दूसरी सूर्य कोी तरह सतेज| ऐसा कुछ नहीं है| सूर्य के समान प्रकाश प्रदान करनेवाला और चन्द्रमा को तरह शीतलता प्रदान करनेवाला गुण भगवान में है| शशि-्सूर्य मात्र प्रतीक हैं| अर्थात् चन्द्रमा और सूर्य को दृष्टिवाले ) तथा प्रज्वलित अग्निरूपी मुखवाला तथा अपने तेज से इस जगत् को तपाते हुए देखता हूँ| द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन सर्वाः| दृष्ट्वाद्धुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् २०|| हे महात्मन् ! अन्तरिक्ष और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एकमात्र आपसे हीं परिपूर्ण हैं॰ आपके इस अलौकिक , भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अत्यन्त व्यथित हो रहे हैं| दिशश्च
एकादश अध्याय २३९ अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति कचिद्ीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति| स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः| १२११| देवताओं के समूह आपमें ही प्रवेश कर रहे हैं और कई एक भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपके गुणों का गान कर रहे हैं| महर्षि और सिद्धों के समुदाय स्वस्तिवाचन अर्थात् कल्याण हो , ऐसा कहते हुए सम्पूर्ण स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं| रुद्रादित्या वसवो येच साध्या विश्वेउश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे११२२१ | रुद्र , आदित्य , वसु, साध्य , विश्वेदेव , अश्विनीकुमार , वायुदेव और उष्मपाः ईश्वरीय ऊष्मा ग्रहण करनेवाले तथा गन्धर्व, यक्ष राक्षस और सिद्धों के समुदाय सभी आश्चर्य से आपको देख रहे हैं अर्थात् देखते हुए भी समझ नहों पा रहे हैं; क्योंकि उनके पास वह दृष्टि हीं नहों है| श्रीकृष्ण ने पीछे बताया कि आसुरी स्वभाववाले मुझे तुच्छ कहकर सम्बोधित करते हैं , सामान्य मनुष्य-्जैसा मानते हैं जबकि मैं परमभाव में, परमेश्वर में स्थित हूँ॰ यद्यपि हूँ मनुष्य-शरीर के आधारवाला| उसी का विस्तार यहाँ है किवे आश्चर्य से देख रहे हैं, यथार्थतः समझ नहों पा रहे हैं- नहीं देखते हैं| रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम्| बहूदर बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्| १२३१| महाबाहु श्रीकृष्ण महाबाहु हैं और अर्जुन भी॰ प्रकृति से परे महान् सत्ता में जिसका कार्यक्षेत्र हो, वह महाबाहु है| श्रीकृष्ण महानता के क्षेत्र में रूप
२४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता पूर्ण हैं, अधिकतम सीमा में हैं| अर्जुन उसी को प्रवेशिका में है, मार्ग में है| मंजिल मार्ग का हीं तो है॰) योगेश्वर! आपके बहुत मुख और नेत्रोंवाले; बहुत हाथ, जंघा और पैरोंवाले; बहुत उदरोंवाले , अनेक विकराल दाढ़ोंवाले महान् रूप को देखकर सब लोक व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ| अब अर्जुन भय हो रहा है कि श्रीकृष्ण इतने महान् हैं| नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्| दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो| १२४१ | विश्व में सर्वत्र अणुरूप से व्याप्त हे विष्णो ! आकाश को स्पर्श किये हुए, प्रकाशमान , अनेक रूपों से युक्त, फैलाये हुए मुख और प्रकाशमान विशाल आपको देखकर विशेष रूप से भयभीत अन्तःकरणवाला मैं धैर्य और मन के समाधानरूपी शान्ति को नहों पा रहा हूँढ़ दंष्ट्राकरालानि च ते दृष्ट्वैव कालानलसन्रिभानि| दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्रिवास १२५ | आपके विकराल दाढ़ोंवाले और कालाग्नि ( काल के लिये भी अग्नि है परमात्मा ) के समान प्रज्वलित मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जान पा रहा हूँ॰ चारों ओर प्रकाश देखकर दिशाभ्रम हो रहा है| आपका यह रूप देखते हुए मुझे सुख भी नहों मिल रहा है| हे देवेश ! हे जगन्रिवास ! आप प्रसन्न हों| अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घै : भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः११२६१| दूसरा छोर को कुछ नेत्रों से युक्त मुखानि
एकादश अध्याय २४२ वे सब ही धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदायसहित आपमें प्रवेश कर रहे हैं और भोष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण (जिससे अर्जुन बहुत भयभीत था, वह कर्ण ) एवं हमारी ओर के भी प्रधान योद्धाओं सहित सब- के-्सब- वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि| केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः१ १२७१| बड़े वेग से आपके विकराल दाढ़ोंवाले भयानक मुखों में प्रवेश कर रहे हैं तथा उनमें से कितने ही चूर्ण हुए सिरोंसहित आपके दाँतों के बीच में लगे हुए दिखायी पड़ रहे हैं| वे किस वेग से प्रवेश कर रहे हैं? अब उनका वेग देखें - यथा नदींनां बहवोउम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति| तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति| | २८१ | जैसे नदियों के बहुत-से जल- प्रवाह ( अपने में विकराल होते हुए भी ) समुद्र की ओर दौड़ते हैं , समुद्र में प्रवेश करते हैं , ठीक उसी प्रकार वे शूरवीर मनुष्यों के समुदाय आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं| अर्थात् वे अपने में शूरवीर तो हैं; किन्तु आप समुद्रवत् हैं| आपके समक्ष उनका बल अत्यल्प है॰वे किसलिये और किस प्रकार प्रवेश कर रहे हैं? इसके लिये उदाहरण प्रस्तुत है यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः तथैव नाशाय विशन्ति लोका- स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः १२९||
२४२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता जैसे पतंगा नष्ट होने के लिये ही प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से प्रवेश करते हैं , वैसे हो ये सब प्राणी भी अपने नाश के लिये आपके मुखों में अत्यन्त बढ़े हुए वेग से प्रवेश कर रहे हैं॰ लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता- ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो| १३०| | आप उन समस्त लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा सब ओर से निगलते हुए चाट रहे हैं, उनका आस्वादन कर रहे हैं॰ हे व्यापनशील परमात्मन् ! आपको उग्र प्रभा सम्पूर्ण जगत् को अपने तेज से व्याप्त करके तपा रही है| तात्पर्य यह है कि पहले आसुरी सम्पद् परमतत्त्व में विलीन हो जाती है , उसके पश्चात् दैवीं सम्पद् का कोई प्रयोजन नहों रह जाता इसलिये वह भी उसी स्वरूप में विलीन हो जाती है| अर्जुन ने देखा कि कौरव- पक्ष , तदनन्तर उसके अपने पक्ष के योद्धा श्रीकृष्ण के में विलीन होते जा रहे हैं॰ उसने पूछा आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो त देववर प्रसीद| विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ३१| मुझे बताइये कि भयंकर आकारवाले आप कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ ! आपको नमस्कार है आप प्रसन्न हों| आदिस्वरूप ! मैं आपको भली प्रकार जानना चाहता हूँ (जैसे, आप कौन हैं? क्या करना चाहते हैं? ); क्योंकि आपको प्रवृत्ति अर्थात् चेष्टाओं को नहीं समझ पा रहा हूँ॰ इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले- श्रीभगवानुवाच कालोडस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ऋतेउपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येउवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः1१३२१ | मुखों नमोउस्तु
एकादश अध्याय २४३ अर्जुन ! मैं लोकों का नाश करनेवाला हुआ काल हूँ और इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिये प्रवृत्त हुआ हूँ| प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित जितने योद्धा हैं वे सब तेरे बिना भी नहों रहेंगे , वे जोवित नहों बचेंगे इसीलिये प्रवृत्त हुआ हूँ| तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् मयैवैते निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् १३३१ | इसलिये अर्जुन ! तू युद्ध के लिये खडा हो, यश प्राप्त करढ शत्रुओं को जीत , समृद्धि - सम्पन्न राज्य को भोगा ये सब शूरवीर मेरे द्वारा पहले से ही मारे हुए हैं| सव्यसाचिन् ! निमित्तमात्र बन| प्रायः सर्वत्र श्रीकृष्ण ने कहा है कि वह परमात्मा न कुछ स्वयं करता है न कराता है, न संयोग ही है; बुद्धि के कारण ही लोग कहते हैं कि परमात्मा कराता है; किन्तु यहाँ वे स्वयं ताल ठोंककर खड़े हो जाते हैं कि, अर्जुन ! कर्त्ता - धर्त्ता तो मैं हूँ॰ मेरे द्वारा ये पहले से ही मारे हुए हैं| तू खडा भर हो, यश ले ले| ऐसा इसलिये है कि'सो केवल भगतन हित लागी| रामचरितमानस , १/१२/५ ) अर्जुन उसीं अवस्था को प्राप्त कर चुका था कि भगवान स्वयं ताल ठोंककर खड़े हो गये| अनुराग ही अर्जुन है| अनुरागी के लिये भगवान सदैव खड़े हैं , उन्हों के कर्त्ता हैं , रथी बन जाते हैं| यहाँ गीता में तीसरी बार साम्राज्य का प्रकरण आया| पहले अर्जुन लड़ना नहों चाहता था| उसने कहा कि पृथ्वी के धन- धान्यसम्पन्न अकण्टक साम्राज्य तथा देवताओं के स्वामोपन अथवा त्रैलोक्य के राज्य में भी मैं उस उपाय को नहों देखता, जो इन्द्रियों को सुखानेवाले मेरे इस शोक को दूर कर सके॰ जब तड़पन बनी हीं रहेगी तो हमें नहीं चाहिये| योगेश्वर ने कहा- इस युद्ध में हारोगे तो देवत्व और जीतने पर महामहिम को स्थिति मिलेगी और यहाँ ग्यारहवें अध्याय में कहते हैं कि ये शत्रु मेरे द्वारा मारे गये हैं, तू निमित्तमात्र भर बन जा, यश को प्राप्त कर और समृद्ध राज्य को भोग॰ फिर वही बात, जिस बात से अर्जुन चौँकता है, जिससे वह शोक मिटता हुआ नहों देखता, बढा निहताः पूर्वमेव तू केवल मोहावृत्त जोड़ता
२४४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता क्या श्रीकृष्ण फिर भी वहीं राज्य देंगे? नहों , वस्तुतः विकारों के अन्त के साथ परमात्मस्वरूप की स्थिति ही वास्तविक समृद्धि है, जो स्थिर सम्पत्ति है| जिसका कभी विनाश नहों होता , राजयोग का परिणाम है| द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ३४१ | इन द्रोण , भोष्म , जयद्रथ और कर्ण तथा अन्यान्य बहुत से मेरे द्वारा मारे हुए योद्धाओं को तू मारा भय मत कर| संग्राम में बैरियों को तू निश्चित जीतेगा , इसलिये युद्ध कर| यहाँ भी योगेश्वर ने कहा कि ये मेरे द्वारा मारे हुए हैं , इन मरे हुए को तू मार| स्पष्ट किया कि मैं कर्त्ता हूँ, जबकि पाँचवें अध्याय १४ एवं १५वें श्लोक में उन्होंने कहा- भगवान अकर्त्ता हैं| अठारहवें अध्याय में वे कहते हैं कि शुभ अथवा अशुभ प्रत्येक कार्य के होने में पाँच माध्यम हैं - अधिष्ठान , कर्त्ता , करण , चेष्टा और दैव| जो कहते हैं कि कैवल्यस्वरूप परमात्मा करते हैं वे अविवेको हैं, नहों जानते अर्थात् भगवान नहों करते| ऐसा विरोधाभास क्यों? वस्तुतः और उस परमात्मपुरुष के बोच एक सीमा - रेखा है| जब तक के परमाणुओं का दबाव अधिक रहता है तब तक माया प्रेरणा देती है और जब साधक उससे ऊपर उठ जाता है- ईश्वर , इष्ट अथवा सद्गुरु के कार्यक्षेत्र में प्रवेश प्राप्त कर लेता है, उसके बाद सद्गुरु इष्ट ( याद रहे प्रेरक के स्थान पर सदगुरु , परमात्मा इष्ट , भगवान पर्यायवाची हैं| कुछ भी कहें, कहता भगवान ही है॰ ) हृदय से रथी हो जाता है आत्मा से जाग्रत होकर उस अनुरागी साधक का स्वयं पथ- संचालन करने लग जाता है| पूज्य महाराज जो' कहते थे- " हो , जिस परमात्मा की हमें चाह है , जिस सतह पर हम खड़े हैं उस सतह पर स्वयं उतरकर जब तक आत्मा से जागृत नहों हो जाता , तब तक सही मात्रा में साधन का आरम्भ नहों होता| उसके बाद जो कुछ साधक से पार लगता है वह उसकी देन है| साधक तो निमित्तमात्र शूरवीर के १३ यथार्थ प्रकृति प्रकृति
एकादश अध्याय २४५ होकर उसके संकेत और आदेश पर चलता भर रहता है॰ साधक को विजय उसकी देन है| ऐसे अनुरागी के लिये ईश्वर अपनी दृष्टि से देखता है, दिखाता है और अपने स्वरूप तक पहुँचाता है॰" यही श्रीकृष्ण कहते हैं कि मेरे द्वारा मारे हुए इन बैरियों को मार| निश्चय ही तुम्हारी विजय होगी , मैं जो खडा हूँढ़ सञ्जचय उवाच एतच्छुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी| नमस्कृत्वा भूय एवाह सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्या १३५|| संजय बोला- (जो कुछ अर्जुन ने देखा, ठीक वैसा ही संजय ने देखा है| अज्ञान से आच्छादित मन हो अन्धा धृतराष्ट्र हैः लेकिन ऐसा मन भी संयम के माध्यम से भली प्रकार देखता, सुनता और समझता है) केशव ( उपर्युक्त ) वचनों को सुनकर किरीटधारी अर्जुन भयभीत होकर काँपता हुआ हाथ नमस्कार करके , फिर श्रीकृष्ण से इस प्रकार गद्गद वाणी में बोला- अर्जुन उवाच स्थान हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घा:| १३६/ | हे हृषीकेश यह उचित हो है कि आपको कोीर्ति से संसार हर्षित होता है और अनुराग को प्राप्त होता है| आपकी ही महिमा से भयभीत हुए राक्षस दिशाओं में भागते हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय आपकी महिमा को देखकर नमस्कार करते हैं| कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे बह्मणोउप्यादिकर्त्रे| अनन्त देवेश जगन्रिवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यात्| ३७| | कृष्णं के इन जोड़कर
२४६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता हे महात्मन्! ब्रह्मा के भी आदिकर्त्ता और सबसे बड़े आपके लिये ये सब कैसे नमस्कार न करें; क्योंकि हे अनन्त! हे देवेश ! हे जगन्निवास ! सत् , असत् और उनसे भी परे अक्षर अर्थात् अक्षय स्वरूप आप ही हैं| अर्जुन ने अक्षय स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन किया था| केवल बौद्धिक स्तर पर कल्पना करने या मान लेने मात्र से कोई ऐसी स्थिति नहों मिलती , जो अक्षय हो| अर्जुन का प्रत्यक्ष दर्शन उसकी आन्तरिक अनुभूति है॰ उसने सविनय कहा- त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण - स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्| वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूपत १३८|| आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं| आप इस जगत् के परम आश्रय और जाननेवाले हैं , जानने योग्य हैं तथा परमधाम हैं| हे अनन्तस्वरूप आपसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है| आप सर्वत्र हैं| वायुर्यमोउग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च| नमो नमस्तेउस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोउपि नमो नमस्ते११३९१| आप ही वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा तथा प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं॰ आपको हजारों बार नमस्कार है| फिर भी बार-बार नमस्कार है| अतिशय श्रद्धा और भक्ति के कारण नमन करते हुए अर्जुन को तृप्ति नहों हो रहीं है| वह कहता है नमः पुरस्तादथ ते सर्वत एव सर्व| अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोउसि सर्वः१|४०१ | हे अत्यन्त सामर्थ्यवाले ! आपको आगे से और पोछे से भी नमस्कार होे| हे सर्वात्मन्! आपको सब ओर से हीं नमस्कार हो; क्योंकि हे अत्यन्त पृष्ठतस्ते नमोउस्तु
एकादश अध्याय २४७ पराक्रमशाली आप सब ओर से संसार को व्याप्त किये इसलिये आप ही सर्वरूप और सर्वत्र हैं| इस प्रकार बारम्बार नमस्कार करके भयभीत अर्जुन अपनी भूलों के लिये क्षमायाचना करता है सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति| अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि||४११| आपके इस प्रभाव को न जानते हुए आपको सखा, मित्र मानकर मेरे द्वारा प्रेम अथवा प्रमाद से भी हे कृष्ण ! , हे यादव !, हे सखे!- इस प्रकार जो कुछ भी हठपूर्वक कहा गया है तथा- यच्चावहासार्थमसत्कृतोउसि विहारशय्यासनभोजनेषु| एकोउ्थवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्| |४२१ | हे अच्युत ! जो आप हँसी के लिये शय्या , आसन और भोजनादिकों में अकेले अथवा उन लोगों के सामने भी अपमानित किये गये हैं, वह सब अपराध अचिन्त्य प्रभाववाले आपसे मैं क्षमा कराता हू किस प्रकार क्षमा करें? - पितासि लोकस्य चराचरम्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् न त्वत्समोउस्त्यभ्यधिकः कुतोउन्यो लोकत्रये उप्यप्रतिमप्रभाव ११४३| | आप इस चराचर जगत् के पिता , गुरु से भी बड़े गुरु और अति पूजनीय हैं॰ जिसकीं कोई प्रतिमा नहों , ऐसे अप्रतिम प्रभाववाले ! आपके समान तीनों लोकों कोई नहों है, फिर अधिक कैसे होगा? आप सखा भी नहों , सखा तो समकक्ष होता है| हुए हैं , विहार, में दूसरा
२४८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय प्रसादयो त्वामहमीशमीड्यम् पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव १४४ | आप चराचर के पिता हैं इसलिये मैं अपने शरीर को भली प्रकार आपके चरणों में रखकर, प्रणाम करके , स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिये प्रार्थना करता हूँ| हे देव ! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रिय स्त्री के अपराधों को क्षमा करता है , वैसे ही आप भी मेरे अपराधों को सहन करने योग्य हैं| अपराध क्या थाः हमने कभी हे यादव ! , हे सखे ! , हे कृष्ण ! कहा था| समाज के बीच अथवा एकान्त में कहा था, भोजन के समय अथवा सोने के समय कहा था| क्या कृष्ण कहना अपराध थाः काले थे ही , गोरे कैसे कहे जाते? यादव कहना भी अपराध नहों थाः क्योंकि यदुकुल में तो जन्म ही हुआ था| सखा कहना भी अपराध नहों थाः क्योंकि स्वयं श्रीकृष्ण भी अपने को अर्जुन का सखा मानते थे| जब कहना अपराध हीं है, एक बार कृष्ण कहने के लिये अर्जुन अनन्त बार गिड़गिड़ाकर क्षमायाचना कर रहा है, तो जप किसका करें? नाम कौन- सा लें? वस्तुतः चिन्तन का जैसा विधान स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया है वैसा ही आप करें| पीछे बताया , ओमित्येकाक्षरं ठह् व्याहरन्मामनुस्मरन् - अर्जुन ! ' ३ँ४ ' बस इतना ही अक्षय ब्रह्म का परिचायक है , इसका तू जप कर और ध्यान मेरा धरः क्योंकि उस परमभाव में प्रवेश मिल जाने के पश्चात् उन महापुरुष का भी वही नाम है, जो उस अव्यक्त का परिचायक है| प्रभाव देखने पर अर्जुन ने पाया कि ये न तो काले हैं न गोरे, न सखा हैं न यादव , यह तो अक्षय ब्रह्म को स्थितिवाले महात्मा हैं| सम्पूर्ण गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने पाँच बार ओम् के उच्चारण पर बल दिया| अब यदि आपको जप करना है तो कृष्ण- कृष्ण न कहकर ओम् का ही जप करें| प्रायः भाविक लोग कोई्नकोई रास्ता निकाल लेते कायं सोढुम्| कृष्ण उन्होंने
एकादश अध्याय हैं॰ कोई ओम्' जपने के अधिकार और अनधिकार की चर्चा से भयभीत है तो कोई महात्माओं की दुहाई देता है अथवा कोई श्रीकृष्ण ही नहों , उनसे पहले राधा और गोपियों का नाम भी उनको शीघ्र प्रसन्नता के लोभ में जपता है| पुरुष श्रद्धामय है इसलिये उसका ऐसा जपना मात्र भावुकता है॰ यदि आप सचमुच भाविक हैं तो उनके आदेश का पालन करें| वे अव्यक्त में स्थित होते हुए भी आज आपके सामने नहीों हैं लेकिन उनकी वाणी आपके समक्ष है| उनकी आज्ञा का पालन करें अन्यथा आप ही बताइये कि गीता में आपका क्या स्थान हैं? हाँ, इतना अवश्य है कि अध्येष्याते च या इमं..... श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः१ ' - जो अध्ययन करता है , सुनता है वह ज्ञान तथा यज्ञ को जान लेता है, शुभ लोकों को पा जाता है| अतः अध्ययन अवश्य करें| प्राण-्अपान के चिन्तन में कृष्ण नाम का क्रम पकड़ में नहों आता| लोग कोरी भावुकतावश केवल राधे- राधे' कहने लगे हैं| आजकल अधिकारियों से काम न होने पर उनके सगे-सम्बन्धियों से, प्रेमी या पत्नो से सोर्स' लगाकर काम चला लेने की परम्परा है| लोग सोचते हैं कि कदाचित् भगवान के घर में भी ऐसा चलता होगा, अतः उन्होंने कृष्ण कहना बन्द करके राधे- राधे' कहना आरम्भ कर दिया| वे कहते हैं- राधे- राधे श्याम मिला दे॰ राधा एक बार बिछुड़ी तो स्वयं श्याम से नहों मिल पायो, वह आपको कैसे मिला दे? अतः अन्य किसी का कहना न मानकर श्रीकृष्ण के आदेश को आप अक्षरशः मानें , ओम् का जप करें| हाँ, यहाँ तक उचित है कि राधा हमारा आदर्श हैं , उतनी ही लगन से हमें भी लगना चाहिये| यदि पाना है तो राधा की तरह विरही बनना है| आगे भी अर्जुन ने कृष्ण कहा| कृष्ण उनका प्रचलित नाम था| ऐसे कई नाम थे, जैसे- गोपाल| बहुत से साधक गुरु-गुरु या गुरु का प्रचलित नाम भावुकतावश जपना चाहते हैं; प्राप्ति के पश्चात् प्रत्येक महापुरुष का वही नाम है, जिस अव्यक्त में वह स्थित है| बहुत से शिष्य प्रश्न करते हैं- ' गुरुदेव! जब ध्यान आपका करते हैं तो पुराना नाम ओम् बहुत से किन्तु
२५ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता इत्यादि क्यों जपें , गुरु-गुरु' अथवा कृष्ण - क्यों न कहें॰ ' यहाँ योगेश्वर ने स्पष्ट किया कि अव्यक्त स्वरूप में विलय के साथ महापुरुष का भी वहीं नाम है, जिसमें वह स्थित है| सम्बोधन था, जपने का नाम नहों| योगेश्वर श्रीकृष्ण से अर्जुन ने अपने अपराधों के लिये क्षमायाचना को , उन्हें स्वाभाविक रूप में आने की प्रार्थना को| श्रीकृष्ण मान गये, सहज हो गये अर्थात् उसे क्षमा भी कर दिया| उसने निवेदन किया- अदृष्टपूर्वं हृषितोउस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे| तदेव मे दर्शय देवरूपं प्रसीद देवेश जगन्रिवास १४५ १ | अभी तक अर्जुन के समक्ष योगेश्वर विश्वरूप में हैं| अतः वह कहता है कि मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ तथा मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है| पहले तो सखा समझता था धनुर्विद्या में कदाचित् अपने को कुछ आगे ही पाता थाः अब प्रभाव देखकर भयभीत हो रहा है| पिछले अध्याय में प्रभाव सुनकर वह अपने को ज्ञानी मानता था| क्या ज्ञानी को कहों भय होता है? वस्तुतः प्रत्यक्ष दर्शन का प्रभाव ही विलक्षण होता है| सब कुछ सुन और मान लेने के बाद भी सब कुछ चलकर जानना शेष ही रहता है| वह कहता है- पहले न देखे हुए आपके इस रूप को देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ॰ मेरा मन भय से व्याकुल भी हो रहा है| अतः हे देव ! आप प्रसन्न हों| हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप अपने उस रूप को ही मुझे दिखाइये| कौन-सा रूप? - किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त- मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव| तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते| | ४६ | | कृष्ण किन्तु कृष्ण किन्तु
एकादश अध्याय २५२ मैं आपको वैसे ही अर्थात् पहले की ही तरह शिर पर मुकुट धारण किये हुए, हाथ में गदा और चक्र लिये हुए देखना चाहता हूँ॰ इसलिये हे विश्वरूपे ! हे सहस्रबाहो ! आप अपने उसी चतुर्भुज स्वरूप में होइए॰ कौन-्सा रूप देखना चाहाः चतुर्भुज रूप ! अब देखना है कि चतुर्भुज रूप है क्या? - श्रीभगवानुवाच मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्| तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् १४७| | इस प्रकार अर्जुन की प्रार्थना सुनकर श्रीकृष्ण बोले अर्जुन! मैँने अनुग्रहपूर्वक अपनी योगशक्ति के प्रभाव से अपना परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विश्वरूप तुझे दिखाया है , जिसे तेरे सिवाय दूसरे किसी ने पहले कभी नहों देखा| वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै- र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः| एवंरूपः शक्य अहं द्रष्टं त्वदन्येन १४८१ | अर्जुन ! इस मनुष्यलोक में इस प्रकार विश्वरूपवाला मैं न वेद से, न यज्ञ से, न अध्ययन से, न दान से, न क्रिया से, न उग्र तप से और न तेरे सिवाय किसी अन्य से देखा जाने को सम्भव हूँ अर्थात् तेरे सिवाय यह रूप अन्य कोई देख नहों सकता| तब तो गीता आपके लिये बेकार है| भगवद्दर्शन को भी योग्यताएँ अर्जुन तक सीमित रह गयों , जबकि पीछे बता आये हैं कि॰ अर्जुन ! राग, भय और क्रोध से रहित अनन्य मन से मेरीं शरण हुए बहुत से लोग ज्ञानरूपी तप से पवित्र होकर साक्षात् मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं| यहाँ कहते हैं - तेरे सिवाय न कोई देख सका है और न भविष्य में कोई देख सकेगा| अतः अर्जुन कौन है? क्या कोई पिण्डधारी है? क्या कोई शरीरधारी है? नहों , नृलोके कुरुप्रवीर|
२५ २ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता वस्तुतः अनुराग हीो अर्जुन है| अनुरागविहीन पुरुष न कभी देख सका है और न भविष्य में कभी देख सकेगा| सब ओर से चित्त समेटकर एकमात्र इष्ट के अनुरूप राग ही अनुराग है| अनुरागी के लिये ही प्राप्ति का विधान है| मा ते व्यथा माच विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्| व्यपेतभीः प्रीतमनाः तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य १४९| | इस प्रकार के मेरे इस विकराल रूप को देखकर तुझे व्याकुलता न हो और मूढ़भाव भी न हो कि घबड़ाकर अलग हो जाओ| अब तू भयरहित और प्रीतियुक्त मन से उसी रूप को अर्थात् चतुर्भुज रूप को फिर देख| सञ्जचय उवाच इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा| १५०१| संजय बोला- सर्वत्र वास करनेवाले देव उन वासुदेव ने अर्जुन से इस प्रकार कहकर फिर वैसे हीं अपने रूप को दिखाया| फिर महात्मा श्रीकृष्ण ने सौम्यवपुः अर्थात् प्रसन्न होकर भयभीत अर्जुन को धैर्य दिया| अर्जुन बोला- अर्जुन उवाच दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन| इदानीमस्मि सचेताः १५१| | जनार्दन ! आपके इस अत्यन्त शान्त मनुष्य रूप को देखकर अब मैं प्रसन्नचित्त हुआ अपने स्वभाव को प्राप्त हो गया हूँ| अर्जुन ने कहा था, भगवन् ! अब आप मुझे उसी चतुर्भुज स्वरूप का दर्शन कराइये| योगेश्वर ने पुनस्त्वं मेरे इस प्रकृतिं संवृत्तः गतः
एकादश अध्याय २५३ कराया भी; अर्जुन ने जब देखा तो क्या पाया? मानुषं रूपं - मनुष्य के रूप को देखा| वस्तुतः प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष ही चतुर्भुज और अनन्तभुज कहलाते हैं॰ दो भुजावाला महापुरुष तो के समक्ष बैठा ही है; किन्तु अन्यत्र कहों से कोई स्मरण करता है तो वही महापुरुष उस स्मरणकर्त्ता से जागृत ( रथी) होकर उसका भी मार्गदर्शन करता है॰ भुजा' कार्य का प्रतीक है| वे भीतर भी कार्य करते हैं और बाहर भी, यही चतुर्भुज स्वरूप है| उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म क्रमशः वास्तविक लक्ष्यघोष साधन- चक्र का प्रवर्तन , इन्द्रियों का दमन और निर्मल-निर्लेप कार्यक्षमता का प्रतीक मात्र है| यही कारण है कि चतुर्भुज रूप में उन्हें देखने पर भी अर्जुन ने उन्हें मनुष्य रूप में ही पाया| चतुर्भुज महापुरुषों के शरीर और स्वरूप से कार्य करने को विधि-विशेष का नाम है , न कि चार हाथवाले कोई श्रीकृष्ण थे| श्रीभगवानुवाच सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षणः| १५ २१ | महात्मा श्रीकृष्ण ने कहा - अर्जुन! मेरा यह रूप देखने को अतिदुर्लभ है, जैसा कि तूने देखा है; क्योंकि देवता भी सदा इस रूप के दर्शन को इच्छा रखते हैं| वस्तुतः सभी लोग सन्त को पहचान ही नहों पाते| पूज्य सत्संगी महाराज' अन्तःप्रेरणावाले पूर्ण महापुरुष थे; लेकिन लोग उन्हें पागल समझते रहे| किसी-किसी पुण्यात्मा को आकाशवाणी हुई कि॰ये सद्गुरु हैं; केवल उन्होंने उन्हें हृदय से पकड़ा , उनके स्वरूप को पाया और अपनी गति पा ली| यहीं श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिनके हृदय में दैवी सम्पद् जागृत है, वे देवता भी सदा इस रूप के दर्शन को आकांक्षा रखते हैं॰ तो क्या यज्ञ, दान अथवा वेदाध्ययन से आप देखे जा सकते हैं? वह महात्मा कहते हैं- नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया| शक्य एवंविधो द्रष्टं दृष्टवानसि मां यथा| १५३१| किन्तु अनुरागी
२५४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से मैं इस प्रकार देखा जाने को सुलभ हूँ, जिस प्रकार तूने देखा है| तब क्या आपको देख पाने का कोई उपाय नहीं है? वे महात्मा कहते हैं, एक उपाय है- भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधो उर्जुन| ज्ञातुं द्रष्टं च तत्वेन प्रवेष्टं च परन्तप| १५४ | हे श्रेष्ठ तपवाले अर्जुन ! अनन्य भक्ति के द्वारा अर्थात् सिवाय मेरे अन्य किसी देवता का स्मरण न करते हुए, अनन्य श्रद्धा से तो मैं इस प्रकार प्रत्यक्ष देखने के लिये , तत्त्व से साक्षात् जानने के लिये तथा प्रवेश करने के लिये भी सुलभ हूँ अर्थात् उनकी प्राप्ति का एकमात्र सुगम माध्यम अनन्य भक्ति है| अन्त में ज्ञान भी अनन्य भक्ति में परिणत हो जाता है , जैसा कि पीछे अध्याय सात में द्रष्टव्य है| पीछे उन्होंने कहा कि तेरे सिवाय न कोई देख सका है और न कोई देख सकेगा , जबकि यहाँ कहते हैं कि अनन्य भक्ति से न केवल मुझे देखा जा सकता है अपितु साक्षात् जाना और मुझमें प्रवेश भी पाया जा सकता है, अर्थात् अर्जुन अनन्य भक्त का नाम है एक अवस्था का नाम है| अनुराग ही अर्जुन है| अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः| निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव| १५५| | हे अर्जुन ! जो पुरुष मेरे द्वारा निर्दिष्ट कर्म अर्थात् नियत कर्म यज्ञार्थ कर्म करता है मत्परमः मेरे परायण होकर करता है,जो मेरा अनन्य भक्त है; सङ्गवर्जितः ' संगदोष में रहते हुए वह कर्म नहों हो सकता, अतः संगदोष से रहित होकर ' निर्वैरः सर्वभूतेषु - सम्पूर्ण भूतप्राणियों में बैरभाव से रहित है, वह मुझे प्राप्त होता है॰ तो क्या अर्जुन ने युद्ध कियाः प्रण करके क्या उसने जयद्रथादि को मारा? यदि उन्हें मारता है तो भगवान को न देख पाता , जबकि अर्जुन ने देखा है| इससे सिद्ध है कि गीता में एक भी श्लोक ऐसा नहीं है, जो बाह्य मारकाट का समर्थन करता हो|जो निर्दिष्ट कर्म यज्ञ को प्रक्रिया का आचरण करेगा , जो अनन्य भाव से उनके सिवाय किसीं का स्मरण किन्तु
एकादश अध्याय २५५ तक नहीं करेगा , जो संगदोष से अलग रहेगा कैसा? जब आपके साथ कोई है ही नहीं तो आप युद्ध किससे करेंगे? सम्पूर्ण भूतप्राणियों में जो बैरभाव से रहित है, मन से भी किसी को सताने को कल्पना न करे, वही मुझे प्राप्त होता है-तो क्या अर्जुन ने लड़ाई ली? कभी नहीं| वस्तुतः संगदोष से अलग रहकर जब आप अनन्य चिन्तन में लगते हैं, निर्धारित यज्ञ कोी क्रिया होते हैं, उस समय परिपंथी राग-द्वेष , काम- क्रोध इत्यादि दुर्जय शत्रु बाधा के रूप में प्रत्यक्ष ही हैं| उनका पार पाना ही युद्ध है| निष्कर्ष - इस अध्याय के आरम्भ में अर्जुन ने कहा- भगवन् ! आपकी विभूतियों को मैँने विस्तार से सुना, जिससे मेरा मोह नष्ट हो गया , अज्ञान का शमन हो गयाः किन्तु जैसा आपने बताया कि मैं सर्वत्र हूँ॰ इसे मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ॰ यदि मेरे द्वारा देखना सम्भव हो, तो उसी स्वरूप को दिखाइये अर्जुन प्रिय सखा था, अनन्य सेवक था| अतएव योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कोई प्रतिवाद न कर तुरन्त दिखाना प्रारम्भ किया कि अब मेरे ही अन्दर खड़े सप्तर्षि और उनसे भी पूर्व होनेवाले ऋषियों को देख, ब्रह्मा और विष्णु को देख, सर्वत्र फैले मेरे तेज को देख, मेरे ही शरीर में एक स्थान पर खड़े तू चराचर जगत् को देखः अर्जुन आँखें मलता ही रह गया| इसी प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण तीन श्लोकों तक अनवरत दिखाते गये; किन्तु अर्जुन को कुछ भी दिखायी नहीं पडा| सभी विभूतियाँ योगेश्वर में उस समय थीं; अर्जुन को वे सामान्य मनुष्य- जैसे ही दिखायी पड़ रहे थे| तब इस प्रकार दिखाते दिखाते योगेश्वर श्रीकृष्ण सहसा रुक जाते हैं और कहते हैं - अर्जुन ! इन आँखों से तू मुझे नहों देख सकता| अपनी बुद्धि से तू मुझे परख नहों सकता| लो, अब मैं तुझे वह दृष्टि देता हूँ, जिससे तू मुझे देख सकेगा| भगवान तो सामने खड़े ही थे| अर्जुन ने देखा , वास्तव में देखा| देखने के पश्चात् क्षुद्र त्रुटियों के लिए क्षमायाचना करने लगा, जो वास्तव में नहों थों| तो युद्ध में प्रवृत्त कृपया किन्तु किन्तु त्रुटियाँ
२५६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता उदाहरण के लिये; भगवन् कभी मैंने आपको कृष्ण , यादव और कभी सखा दिया था, लिये आप मुझे क्षमा करें| श्रीकृष्ण ने क्षमा भी किया; क्योंकि अर्जुन की प्रार्थना स्वीकार कर वे सौम्य स्वरूप में आ गये, धीरज बँधाया वस्तुतः कहना अपराध नहों था| वे साँवले थे ही, गोरे कैसे कहलाते| यदुवंश में जन्म हुआ ही था| श्रीकृष्ण स्वयं भी अपने को सखा मानते ही थे| वास्तव में प्रत्येक साधक महापुरुष को पहले ऐसा ही समझते हैं| कुछ उन्हें रूप और आकार से सम्बोधित करते हैं , कुछ उनको वृत्ति से उन्हें हैं और कुछ उन्हें अपने हो समकक्ष मानते हैं , उनके यथार्थ स्वरूप को नहों समझते| उनके अचिन्त्य स्वरूप को अर्जुन ने समझा तो पाया कि ये न तो काले हैं और न गोरे, न किसी कुल के हैं और न किसी के साथी ही हैं| इनके समान कोई है हीं नहों , तो सखा कैसाः बराबर कैसा? यह तो अचिन्त्य स्वरूप हैं॰ जिसे यह स्वयं दिखा दें, वही इन्हें देख पाता है| अतः अर्जुन ने अपनी प्रारम्भिक भूलों के लिये क्षमायाचना को| प्रश्न उठता है कि जब कृष्ण कहना अपराध है उनका नाम जपा कैसे जायः तो जिसे योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जपने के लिये स्वयं बल दिया , जपने की जो विधि बतायी उसी विधि से आप चिन्तन स्मरण करें॰ वह है- ओमित्येकाक्षरं बह्यम व्याहरन्मामनुस्मरन् अक्षय ब्रह्म का पर्याय है॰ 'ओ अहम् स ओम् ' जो व्याप्त है वह सत्ता मुझमें छिपी है , यहीं है ओम् का आशय| आप इसका जप करें और ध्यान मेरा करें| रूप अपना , नाम ओम् का बताया अर्जुन ने प्रार्थना की कि चतुर्भुज रूप में दर्शन दीजिये| श्रीकृष्ण ने उसी सौम्य स्वरूप को धारण किया| अर्जुन ने कहा - भगवन्! आपके इस सौम्य मानव स्वरूप को देखकर अब मैं प्रकृतिस्थ हुआ| माँगा था चतुर्भुज रूप दिखाया मानुषं रूपं वास्तव में शाश्वत में प्रवेशवाला योगी शरीर से यहाँ बैठा है, बाहर दो हाथों से कार्य करता है और साथ हीं अन्तरात्मा से जागृत होकर जहाँ से भी जो भाविक स्मरण करते हैं, एक साथ सर्वत्र उनके हृदय से इसके कह कृष्ण पुकारते ओम्
एकादश अध्याय २५७ जागृत होकर प्रेरक के रूप में कार्य करता है| हाथ उसके कार्य का प्रतीक है, यही चतुर्भुज है| श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! तेरे सिवाय रूप को न कोई देख सका है और न भविष्य में कोई देख सकेगा| तब गीता तो हमारे लिये व्यर्थ है| किन्तु नहीं , योगेश्वर कहते हैं- एक उपाय है|जो मेरा अनन्य भक्त है, मेरे सिवाय जो दूसरे किसी का स्मरण न करके निरन्तर मेरा हो चिन्तन करनेवाला है, उसकी अनन्य भक्ति के द्वारा मैं प्रत्यक्ष देखने को ( जैसा तूने देखा है) , तत्त्व से जानने को और प्रवेश करने को भी सुलभ हूँ॰ अर्थात् अर्जुन अनन्य भक्त था भक्ति का परिमार्जित रूप है अनुराग, इष्ट के अनुरूप लगाव मिलहिं न अनुरागा| ( रामचरितमानस , ७/६१/१ ) अनुरागविहीन पुरुष न कभी पाया है और न पा सकेगा| अनुराग नहीं है तो कोई लाख योग करे , जप करे , तप करे या दान करे, वह' नहों मिलता| अतः इष्ट के अनुरूप राग अथवा अनन्य भक्ति नितान्त आवश्यक है| अन्त में श्रीकृष्ण ने कहा - अर्जुन ! मेरे द्वारा निर्दिष्ट कर्म को कर, मेरा अनन्य भक्त होकर कर॰ मेरी शरण होकर करः संगदोष से अलग रहकर संगदोष में यह कर्म हो हीं नहों सकता| अतः संगदोष इस कर्म के सम्पादित होने में बाधक है| जो बैरभाव से रहित है , वही मुझे प्राप्त करता है| जब संगदोष नहीं है, जहाँ हमें छोड़कर दूसरा कोई है ही नहों, बैर का मानसिक संकल्प भी नहों है तो युद्ध कैसा? बाहर दुनिया में लड़ाई- झगड़े होते रहते हैं; विजय जीतनेवालों को भी नहों मिलती| दुर्जय संसाररूपी शत्रु को असंगतारूपी शस्त्र से काटकर परम में प्रवेश पा जाना ही वास्तविक विजय है, जिसके पीछे हार नहों है| इस अध्याय में पहले तो योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दृष्टि प्रदान को , फिर अपने विश्वरूप का दर्शन कराया| अतः- ३४० तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु बह्यविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे ' विश्वरूपदर्शनयोगो ' नामैकादशो 5ध्यायः १११| | मेरे इस रघुपति बिनु किन्तु किन्तु
२५८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में विश्वरूपदर्शन योग' नामक अध्याय पूर्ण होता है| इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः यथार्थगीता ' भाष्ये ' विश्वरूपदर्शनयोगो ' नामैकादशोषध्यायः १११| | इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य यथार्थ गीता में विश्वरूपदर्शन योग नामक अध्याय पूर्ण होता है| हरिः ३ँ तत्सत् 1१ ग्यारहवाँ ग्यारहवाँ
३ँँ श्री परमात्मने नमः / | ४| अथ द्वादशोडध्यायः |१ एकादश अध्याय के अन्त में श्रीकृष्ण ने बार-बार बल दिया कि- अर्जुन ! मेरा यह स्वरूप जिसे तूने देखा, तेरे सिवाय न पहले कभी देखा गया है और न भविष्य में कोई देख सकेगा| मैं न तप से, न यज्ञ से और न दान से ही देखे जाने को सुलभ हूँ; किन्तु अनन्य भक्ति के द्वारा अर्थात् मेरे अतिरिक्त अन्यत्र कहों श्रद्धा बिखरने न पाये, निरन्तर तैलधारावत् मेरे चिन्तन के द्वारा ठीक इसी प्रकार जैसा तूने देखा, मैं प्रत्यक्ष देखने के लिये, तत्त्व से साक्षात् जानने के लिये और प्रवेश करने के लिये हूँ| अतः अर्जुन निरन्तर मेरा ही चिन्तन कर, भक्त बन| अर्जुन ! तू मेरे ही द्वारा निर्धारित किये गये कर्म को कर| मत्परमः - अपितु मेरे परायण होकर कर| अनन्य भक्ति ही उनकी प्राप्ति का माध्यम है| इस पर अर्जुन का प्रश्न स्वाभाविक है कि जो अव्यक्त अक्षर की उपासना करते हैं और जो सगुण आपकी उपासना करते हैं , इन दोनों में श्रेष्ठ कौन है? यहाँ इस प्रश्न को अर्जुन ने तीसरी बार उठाया है| अध्याय तीन में उसने कहा- भगवन् ! यदि निष्काम कर्मयोग की अपेक्षा सांख्ययोग आपको श्रेष्ठ मान्य है, तो आप मुझे भयंकर कर्मों में क्यों लगाते हैं? इस पर श्रीकृष्ण ने कहा - अर्जुन ! निष्काम कर्ममार्ग अच्छा लगे चाहे ज्ञानमार्ग , दोनों ही दृष्टियों से तो करना ही पड़ेगा| इतने पर भीजो इन्द्रियों को हठ से रोककर मन से विषयों का स्मरण करता है वह दम्भाचारी है, ज्ञानी नहों| अतः अर्जुन ! तू कर्म करा कौन-सा कर्म करे? , तो ' नियतं कुरु कर्म त्वम् - निर्धारित किये हुए को कर| निर्धारित कर्म क्या है? तो बताया- यज्ञ की प्रक्रिया ही एकमात्र कर्म है॰ यज्ञ की विधि को बताया , जो आराधना - चिन्तन की विधि- विशेष है , परम में प्रवेश दिलानेवाली प्रक्रिया है| जब निष्काम कर्ममार्ग और ज्ञानमार्ग दोनों में ही कर्म करना है, यज्ञार्थ कर्म करना है, क्रिया एक ही है तो अन्तर भी सुलभ कर्म कर्म
२६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता कैसा? भक्त कर्मों का समर्पण करके इष्ट के आश्रित होकर कर्म में प्रवृत्त होता है, सांख्ययोगी अपनी शक्ति को समझकर ( अपने भरोसे ) उसी कर्म में प्रवृत्त होता है, पूरा श्रम करता है| अध्याय पाँच में अर्जुन ने पुनः प्रश्न किया- भगवन् आप कभी सांख्य-माध्यम से कर्म करने की प्रशंसा करते हैं, तो कभी समर्पण-्माध्यम से निष्काम कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं- इन दोनों में श्रेष्ठ कौन है? यहाँ तक अर्जुन समझ चुका है कि कर्म दोनों दृष्टियों से करना होगा, फिर भो दोनों में श्रेष्ठ मार्ग वह चुनना चाहता है| श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन ! दोनों ही दृष्टियों से कर्म होनेवाले हीं प्राप्त होते हैं; सांख्यमार्ग की अपेक्षा निष्काम कर्ममार्ग श्रेष्ठ है| निष्काम कर्मयोग का अनुष्ठान किये बिना न कोई योगी होता है और न ज्ञानो| सांख्ययोग दुष्कर है , उसमें कठिनाइयाँ अधिक हैं| यहाँ तीसरी बार अर्जुन ने यही प्रश्न रखा कि- भगवन् ! आपमें अनन्य भक्ति से लगनेवाले और अव्यक्त अक्षर की उपासना से ( सांख्यमार्ग से) लगनेवाले , इन दोनों में श्रेष्ठ कौन है? अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते| ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः११११| एवं अर्थात् इस प्रकार जो अभी-अभी आपने विधि बतायी है, ठीक इसी विधि के अनुसार अनन्य भक्ति सेजो आपकी शरण लेकर, आपसे निरन्तर संयुक्त होकर आपको भली प्रकार उपासते हैं और दूसरे जो आपको शरण न लेकर स्वतन्त्र रूप से अपने भरोसे उसी अक्षय और अव्यक्त स्वरूप की उपासना करते हैं , जिसमें आप भी स्थित हैं- इन दोनों प्रकार के भक्तों में अधिक उत्तम योगवेत्ता कौन है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- श्रीभगवानुवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते| श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः११२१| यज्ञार्थ ,तो दूसरा में प्रवृत्त मुझको किन्तु
द्वादश अध्याय २६२ अर्जुन ! मुझमें मन को एकाग्र करके निरन्तर मुझसे संयुक्त हुए जो भक्तजन परम से सम्बन्ध रखनेवाली श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझे भजते हैं, वे मुझे योगियों में भी अति उत्तम योगी मान्य हैं| ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते| सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्| १३१| सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः त प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ११४] | जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार संयत करके मन- बुद्धि के चिन्तन से अत्यन्त परे , सर्वव्यापी , अकथनीय स्वरूप , सदा एकरस रहनेवाले , नित्य , अचल , अव्यक्त , आकाररहित और अविनाशी ब्रह्म को उपासना करते हैं, सम्पूर्ण भूतों के हित में लगे हुए और सबमें समान भाववाले वे योगी भी मुझे ही प्राप्त होते हैं| ब्रह्म के उपर्युक्त विशेषण भिन्न नहों हैं| किन्तु- क्लेशोउधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम | अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते|१५|| उन अव्यक्त परमात्मा में आसक्त हुए चित्तवाले के साधन में क्लेश विशेष है; क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्त विषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जातीं है| जब तक देह का भान है , तब तक अव्यक्त को प्राप्ति दुष्कर है| योगेश्वर श्रीकृष्ण सद्गुरु थे| अव्यक्त परमात्मा उनमें व्यक्त था| वे कहते हैं कि महापुरुष की शरण न लेकर जो साधक अपनी शक्ति समझते हुए आगे बढ़ता है कि- अवस्था में हूँ॰ आगे इस अवस्था में जाऊँगा, मैं अपने ही अव्यक्त स्वरूप को प्राप्त होऊँगा , वह मेरा हो रूप होगा , मैं वहीं हूँ| इस प्रकार सोचते , प्राप्ति को प्रतीक्षा न करके अपने शरीर को हीं सोउ्हं कहने लगता है| यहीं इस मार्ग को सबसे बड़ी बाधा है| वह दुःखालयम् अशाश्वतम् में ही घूम- फिरकर खडा हो जाता है| जो मेरी शरण लेकर चलता है वह- मुझसे पुरुषों मैं इस किन्तु =
२६२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पराः अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते१ १६| | जो मेरे परायण होकर सम्पूर्ण कर्मों अर्थात् आराधना को मुझमें अर्पण करके अनन्य भाव से योग अर्थात् आराधना - प्रक्रिया के द्वारा निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं- तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् १७ | | केवल चित्त लगानेवाले उन भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार-्सागर से उद्धार करनेवाला होता हूँ इस प्रकार चित्त लगाने की प्रेरणा और विधि पर योगेश्वर प्रकाश डालते हैं- मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय| निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः११८१| इसलिये अर्जुन! तू मन लगा, मुझमें ही बुद्धि लगा| उपरान्त ही निवास करेगा , इसमें कुछ भी संशय नहों है| मन और बुद्धि भी न लगा सके, तबः ( अर्जुन ने पीछे कहा भी है कि मन को रोकना तो मैं वायु को तरह दुष्कर समझता इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- अथ चित्तं समाधातुं न शक्रोषि मयि स्थिरम्| अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जचयत१९१| यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापित करने में समर्थ नहीं है, तो हे अर्जुन ! योग के अभ्यास द्वारा मुझे प्राप्त होने की इच्छा करा ( जहाँ भी चित्त जाय, वहाँ से घसीटकर उसे आराधना , चिन्तन-क्रिया में लगाने का नाम अभ्यास है) यदि यह भी न कर पाये तो? - अभ्यासेउप्यसमर्थोउसि मत्कर्मपरमो भव| मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि१११०१| यदि तू अभ्यास में भी असमर्थ है तो केवल मेरे लिये कर्म कर अर्थात् आराधना करने में तत्पर हो जा| इस प्रकार मेरी प्राप्ति के लिये कर्मों को करता ये तु मुझमें मुझमें इसके तू मुझमें
द्वादश अध्याय २६३ हुआ तू मेरी प्राप्तिरूपी सिद्धि को हो प्राप्त होगा| अर्थात् अभ्यास पार न लगे तो साधना- पथ में लगे भर रहो| अथैतदप्यशक्तोउसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् १११| यदि इसे भी करने में असमर्थ है तो सम्पूर्ण कर्मों के फल का त्याग कर अर्थात् लाभ-्हानि की चिन्ता छोड़कर मद्योग के आश्रित होकर अर्थात् समर्पण के साथ आत्मवान् महापुरुष की शरण में जा| उनसे प्रेरित होकर कर्म स्वतः होने लगेगा| समर्पण के साथ कर्मफल के त्याग का महत्त्व बताते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्व्यानं विशिष्यते| ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्|११२| | केवल चित्त को रोकने के अभ्यास से ज्ञानमार्ग से कर्म में प्रवृत्त होना श्रेष्ठ है| ज्ञान-्माध्यम से कर्म को कार्यरूप देने की अपेक्षा ध्यान श्रेष्ठ है; क्योंकि ध्यान में इष्ट रहता ही है| ध्यान से भी सम्पूर्ण कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है; क्योंकि इष्ट के प्रति समर्पण के साथ हीं योग पर दृष्टि रखते हुए कर्मफल का त्याग करने से उसके योगक्षेम की जिम्मेदारी इष्ट की हो जाती है| इसलिये इस त्याग से वह तत्काल ही परमशान्ति को प्राप्त हो जाता है| अभी तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि अव्यक्त को उपासना करनेवाले ज्ञानमार्गी से समर्पण के साथ कर्म करनेवाला निष्काम कर्मयोगी श्रेष्ठ है॰ दोनों एक ही कर्म करते हैं; ज्ञानमार्गी के पथ में व्यवधान अधिक हैं| उसके लाभ-्हानि की जिम्मेदारीं स्वयं पर रहतीं है जबकि समर्पित भक्त की जिम्मेदारी महापुरुष पर होती है, इसलिये वह कर्मफल- त्याग द्वारा शोघ्र ही शान्ति को प्राप्त होता है| अब शान्तिप्राप्त पुरुष के लक्षण बताते हैं- अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव चढ निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी| ११३१| किन्तु
२६४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता इस प्रकार शान्ति को प्राप्त हुआ जो पुरुष सब भूतों में द्वेषभाव से रहित , सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है और जो ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख- दुःख को प्राप्ति में सम तथा क्षमावान् है सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः| मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यों मद्भक्तः स मे प्रियः१११४१ | जो निरन्तर योग को पराकाष्ठा से संयुक्त है, लाभ तथा हानि में सन्तुष्ट है, मन तथा इन्द्रियोंसहित शरीर को वश में किये हुए है, दृढ़ निश्चयवाला है, वह मुझमें अर्पित मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझे प्रिय है| यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः| हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः सच मे प्रियः१ ११५|| जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहों होता और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्विग्न नहीं होता एवं हर्ष , सन्ताप, भय और समस्त विक्षोभों से मुक्त है वह भक्त मुझे प्रिय है| साधकों के लिये यह श्लोक अत्यन्त उपयोगी है| उन्हें इस ढंग से रहना चाहिये कि उनके द्वारा किसीं के मन को ठेस न लगे| इतना तो साधक कर सकते हैं; किन्तु दूसरे लोग इस आचरण से नहीं चलेंगे| वे तो संसारी हैं ही , वे तो आग उगलेंगे , कुछ भी कहेंगे; पथिक को चाहिये कि अपने हृदय में उनके द्वारा ( उनके आघातों से ) भी उथल - पुथल न होने दे| चिन्तन में सुरत लगी रहे , क्रम न टूटे| उदाहरण के लिये आप स्वयं सड़क पर नियमानुकूल बायें से चल रहे हैं, कोई मदिरा पीकर चला आ रहा है, उससे बचना भी आपकी जिम्मेदारी है| अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः | सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ११६१ | आकांक्षाओं से रहित, सर्वथा पवित्र है , दक्षः' अर्थात् आराधना का विशेषज्ञ है ( ऐसा नहों कि चोरीं करता हो तो दक्ष है॰ श्रीकृष्ण के अनुसार कर्म एक ही है, नियत कर्म - आराधना - चिन्तन , उसमें जो दक्ष है) , किन्तु जो पुरुष
द्वादश अध्याय २६५ जो पक्ष-विपक्ष से परे है , दुःखों से मुक्त है, सभी आरम्भों का त्यागी वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है| करने योग्य कोई क्रिया उसके द्वारा आरम्भ होने के लिये शेष नहों रहती| या न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति| शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः| ११७१| जो न कभी हर्षित होता है , न द्वेष करता है , न शोक करता है , न कामना ही करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों के फल का त्यागी है, जहाँ विलग नहीं है , अशुभ शेष नहों है, भक्ति को इस पराकाष्ठा वह पुरुष मुझे प्रिय है| समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः| शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः१ ११८१ | शत्रु और मित्र में, मान तथा अपमान में सम है , जिसके अन्तःकरण की वृत्तियाँ सर्वथा शान्त हैं , जो सर्दी- गर्मी , सुख- दुःखादि द्वन्दवों में सम और आसक्तिरहित है तथा- तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः१११९१| निन्दा तथा स्तुति को समान समझनेवाला है , मननशीलता की चरम सीमा पर पहुँचकर जिसकी मनसहित इन्द्रियाँ शान्त हो चुकी हैं, जिस किसी प्रकार शरीर - निर्वाह होने में जो सदैव जो अपने निवास स्थान में ममता से रहित है, भक्ति की पराकाष्ठा पर पहुँचा हुआ वह स्थिरबुद्धिवाला पुरुष मुझे प्रिय है| ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते| श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेउतीव मे प्रियाः११२०१| जो मेरे परायण हुए हार्दिक श्रद्धायुक्त पुरुष इस उपर्युक्त धर्ममय अमृत का भली प्रकार सेवन करते हैं, वे भक्त मुझे अतिशय प्रिय हैं| कोई शुभ से युक्त जो पुरुष सन्तुष्ट है ,
२६६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता निष्कर्ष - गत अध्याय के अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि- अर्जुन ! तेरे सिवाय न कोई पाया है,न पा सकेगा- जैसा तूने देखा; अनन्य भक्ति अथवा अनुराग से जो भजता है, वह इसी प्रकार मुझे देख सकता है, तत्त्व के साथ मुझ जान सकता है और मुझमें प्रवेश भी पा सकता है| अर्थात् परमात्मा ऐसी सत्ता है, जिसको पाया जाता है| अतः अर्जुन! भक्त बन| अर्जुन ने इस अध्याय में प्रश्न किया कि॰ भगवन् ! अनन्य भाव से जो आपका चिन्तन करते हैं और दूसरे वे जो अक्षर - अव्यक्त को उपासना करते हैं इन दोनों में उत्तम योगवेत्ता कौन है? योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि दोनों मुझे ही प्राप्त होते हैं; क्योंकि मैं अव्यक्त स्वरूप हूँ| जो इन्द्रियों को वश में रखते हुए मन को सब ओर से समेटकर अव्यक्त परमात्मा में आसक्त हैं उनके पथ में क्लेश विशेष हैं॰ जब तक देह का अध्यास ( भान ) है, तब तक अव्यक्त स्वरूप को प्राप्ति दुःखपूर्ण है; क्योंकि अव्यक्त स्वरूप तो चित्त के निरोध और विलयकाल में मिलेगा| उसके पूर्व उसका शरीर ही बीच में बाधक बन जाता है॰ ' मैं हूँ, मैं हूँ , मुझे पाना है' - कहते- कहते अपने शरीर को ही जाता है| उसके लड़खड़ाने की अधिक सम्भावना है| अतः अर्जुन ! तू सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके अनन्य भक्ति से मेरा चिन्तन कर| जो मेरे परायण भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को अर्पण करके मानव शरीरधारी मुझ सगुण योगी के रूप का ध्यान द्वारा तैलधारावत् निरन्तर चिन्तन करते हैं, उनका मैं शीघ्र हीं संसार-्सागर से उद्धार करनेवाला हो जाता हूँ॰ अतः भक्तिमार्ग श्रेष्ठ है| अर्जुन ! मुझमें मन को लगा| मन न लगे तो भी लगाने का अभ्यास कर| जहाँ भी चित्त जाय , पुनः घसीटकर उसका निरोध कर| यह भो करने में असमर्थ है तो तू कर्म कर| कर्म एक ही है, यज्ञार्थ कर्मा तू कार्यम् कर्म करता भर जा , दूसरा न करढ उतना ही कर, पार लगे चाहे न लगे| यदि यह भी करने में असमर्थ है तो स्थितप्रज्ञ, आत्मवान्, तत्त्वज्ञ महापुरुष की शरण होकर किन्तु किन्तु ओर घूम मुझमें
द्वादश अध्याय २६७ सम्पूर्ण कर्मफलों का त्याग कर/ ऐसा त्याग करने से तू परमशान्ति को प्राप्त हो जायेगा| तत्पश्चात् परमशान्ति को प्राप्त हुए भक्त के लक्षण बताते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा - जो सम्पूर्ण भूतों में द्वेषभाव से रहित है, जो करुणा और दयालु है, ममता और अहंकार से रहित है, वह भक्त मुझे प्रिय है॰ जो ध्यान-योग में निरन्तर तत्पर और आत्मवान् , आत्मस्थित है, वह भक्त मुझे प्रिय है| जिससे न किसीं को उद्वेग प्राप्त होता है और स्वयं भी जो किसीं से उद्वेग को प्राप्त नहों होता , ऐसा भक्त मुझे प्रिय है|जो शुद्ध है, दक्ष है, व्यथाओं से उपराम है, सर्वारम्भों को त्यागकर जिसने पार पा लिया है, ऐसा भक्त मुझे प्रिय है| सम्पूर्ण कामनाओं का त्यागी और शुभाशुभों का पार पानेवाला भक्त मुझे प्रिय है|जो निन्दा और स्तुति में समान और मौन है , मनसहित जिसकी इन्द्रियाँ शान्त और मौन हैं, जो किसी भी प्रकार शरीर- निर्वाह और रहने के स्थान में ममता से रहित है, शरीर- रक्षा में भी जिसकी आसक्ति नहीं है, ऐसा स्थितप्रज्ञ भक्तिमान् पुरुष मुझे प्रिय है| इस प्रकार श्लोक ग्यारह से उन्नीस तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने शान्तिप्राप्त भक्त को रहनी पर प्रकाश डाला, जो साधकों के लिये उपादेय है| अन्त में निर्णय देते हुए उन्होंने कहा - अर्जुन! जो मेरे परायण हुए अनन्य श्रद्धा से युक्त पुरुष इस ऊपर धर्ममय अमृत को निष्कामभाव से भली प्रकार आचरण में ढालते हैं, वे भक्त मुझे अतिशय प्रिय हैं| अतः समर्पण के साथ इस कर्म में प्रवृत्त होना श्रेयतर है; क्योंकि उसके हानि- लाभ की जिम्मेदारी वह इष्ट सद्गुरु अपने ऊपर ले लेते हैं| यहाँ श्रीकृष्ण ने स्वरूपस्थ महापुरुष के लक्षण बताये उनकी शरण में जाने को कहा और अन्त में अपनी शरण में आने की प्रेरणा देकर उन के समकक्ष अपने को घोषित किया| एक योगी , महात्मा थे| इस अध्याय में भक्ति को श्रेष्ठ बताया गया, अतः इस अध्याय का नामकरण भक्तियोग' युक्तिसंगत है| से युक्त में सन्तुष्ट योगयुक्त कहे हुए महापुरुषों श्रीकृष्ण
२६८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता ३४ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु बह्यविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे भक्तियोगो ' नाम द्वादशोउध्यायः ११२| | इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में भक्तियोग नामक अध्याय पूर्ण होता है| इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः यथार्थगीता भाष्ये भक्तियोगो नाम द्वादशोउध्यायः|११२१ | इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य ' यथार्थ गीता में भक्तियोग' नामक अध्याय पूर्ण होता है| हरिः ३>ँ तत्सत् 1१ बारहवाँ बारहवाँ
३ँँ श्री परमात्मने नमः || अथ त्रयोदशोडध्यायः /१ गीता के आरम्भ में ही धृतराष्ट्र का प्रश्न है- संजय! धर्मक्षेत्र में तथा कुरुक्षेत्र में युद्ध को इच्छा से एकत्र हुए मेरे और पाण्डुपुत्रों ने क्या किया? किन्तु अभी तक यह नहीं बताया गया कि वह क्षेत्र है कहाँ? जिन जिस क्षेत्र में युद्ध बताया , स्वयं ही उस क्षेत्र का प्रस्तुत अध्याय में निर्णय देते हैं कि वह क्षेत्र वस्तुतः है कहाँ? श्रीभगवानुवाच इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते| वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः १११| कौन्तेय ! यह शरीर ही एक क्षेत्र है और इसको जो भली प्रकार जानता है , वह क्षेत्रज्ञ है| वह उसमें फँसा नहों है बल्कि उसका संचालक है॰ ऐसा उस तत्त्व को विदित करनेवाले ने कहा है| शरीर तो एक ही है, इसमें धर्मक्षेत्र और कुरुक्षेत्र ये दो क्षेत्र कैसे? वस्तुतः इस एक ही शरीर के अन्तराल में अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियाँ पुरातन हैं| एक तो परमधर्म परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाली पुण्यमयो प्रवृत्ति दैवीं सम्पद् है और है आसुरी सम्पद्- दूषित दृष्टिकोण से जिसका गठन है जो नश्वर संसार में विश्वास दिलाती है| जब आसुरी सम्पद् का बाहुल्य होता है तो यही शरीर ' कुरुक्षेत्र बन जाता है और इसी शरीर के अन्तराल में जब दैवी सम्पद् का बाहुल्य होता है तो यही शरीर धर्मक्षेत्र कहलाता है| यह चढाव उतार बराबर लगा रहता है; तत्त्वदर्शी महापुरुष के सान्निध्य में जब कोई अनन्य भक्ति द्वारा आराधना होता है तो इन दोनों प्रवृत्तियों में निर्णायक युद्ध का सूत्रपात हो जाता है क्रमशः दैवीं सम्पद् का उत्थान और महापुरुष ने एतद्यो महापुरुषों दूसरी किन्तु में प्रवृत्त
२७ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता आसुरी सम्पद् का शमन हो जाता है| आसुरी सम्पद् के सर्वथा शमन के उपरान्त परम के दिग्दर्शन को अवस्था आती है| दर्शन के साथ ही दैवी सम्पद् को आवश्यकता समाप्त हो जाती है , अतः वह भी परमात्मा में स्वतः विलीन हो जाती है| भजनेवाला पुरुष परमात्मा में प्रवेश पा जाता है| ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन ने देखा कि कौरव-पक्ष के अनन्तर पाण्डव-पक्ष के योद्धा भी योगेश्वर में विलीन होते जा रहे हैं| इस विलय के पश्चात् पुरुष का जो स्वरूप है, वही क्षेत्रज्ञ है| आगे देखें- क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत| क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं ममत१२१| हे अर्जुन ! तू सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही जान भी क्षेत्रज्ञ हूँ जो इस क्षेत्र को जानता है, वह क्षेत्रज्ञ है- ऐसा उसे साक्षात् जाननेवाले महापुरुष कहते हैं और श्रीकृष्ण कहते हैं कि॰ मैं भी क्षेत्रज्ञ हूँ अर्थात् योगेश्वर ही थे| क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ अर्थात् विकारसहित और पुरुष को तत्त्व से जानना ही ज्ञान है , ऐसा मेरा मत है अर्थात् साक्षात्कारसहित इनकी जानकारी का नाम ज्ञान है| कोरी बहस का नाम ज्ञान नहों है| तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्| स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणुढ़१३१| वह क्षेत्र जैसा है और जिन विकारोंवाला है तथा जिस कारण है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाववाला है , वह सब मुझसे संक्षेप अर्थात् क्षेत्र विकारवाला है, किसी कारण से हुआ है, जबकि क्षेत्रज्ञ केवल प्रभाववाला है| मैं ही कहता हूँ - ऐसी बात नहों है, ऋषि भो कहते हैं - ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् बह्यसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः| १४१ | यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्त्व ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार गायन किया गया है| नाना प्रकार से वेदों की मन्त्रणा द्वारा विभाजित करके भी कहा गया है तथा विशेष रूप से निश्चित किये हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के वाक्यों द्वारा भी अर्थात् मैं श्रीकृष्ण भी एक प्रकृति से हुआ में सुन|
त्रयोदश अध्याय २७२ वहीं कहा गया है| अर्थात् वेदान्त , महर्षि , ब्रह्मसूत्र और हम एक ही बात कहने जा रहे हैं॰ श्रीकृष्ण वहीं कहते हैं, जो इन सबने कहा है| क्या शरीर ( क्षेत्र ) इतना ही है, जितना दिखायो देता है? इस पर कहते हैं- महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च| इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः १५ ] | अर्जुन ! पंच महाभूत ( क्षिति , जल , पावक , गगन और समीर ) , अहंकार , बुद्धि और चित्त ( चित्त का नाम न लेकर उसे अव्यक्त परा प्रकृति कहा गया अर्थात् मूल पर प्रकाश डाला गया है , जिसमें परा प्रकृति भी सम्मिलित है, उपर्युक्त आठों अष्टधा मूल प्रकृति है) तथा दस इन्द्रियाँ ( आँख, कान नाक , त्वचा वाक् , हाथ , पैर , उपस्थ तथा गुदा) , एक मन और पाँच इन्द्रियों के विषय ( रूप , रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श ) तथा- इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः| एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्| |६१ | इच्छा , द्वेष , सुख, दुःख और सबका समूह स्थूल देह का यह पिण्ड, चेतना और धैर्य - इस प्रकार यह क्षेत्र विकारोंसहित संक्षेप में कहा गया| संक्षेप में यही क्षेत्र का स्वरूप है, जिसमें बोया हुआ भला और बुरा बोज संस्कारों के रूप में उगता है| शरीर हीं क्षेत्र है| शरीर में गारा-मसाला किस वस्तु का है? तो यही पाँच तत्त्व , दस इन्द्रियाँ , एक मन इत्यादि - जैसा लक्षण ऊपर गिनाया गया है| इन सबका सामूहिक संघात पिण्ड शरीर है| जब तक ये विकार रहेंगे , तब तक यह पिण्ड भी विद्यमान रहेगा , इसलिये कि यह विकारों से बना है| अब उस क्षेत्रज्ञ का स्वरूप देखें, जो इस क्षेत्र में लिप्त नहीं बल्कि इससे है- अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः| १७१| हे अर्जुन ! मान अपमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, अहिंसा (अर्थात् अपनी तथा अन्य किसीं को आत्मा को कष्ट न देना अहिंसा है| प्रकृति जिह्वा , निवृत्त
२७२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता अहिंसा का अर्थ केवल इतना हीं नहों है कि चीँटी मत मारो| श्रीकृष्ण ने कहा कि अपनी आत्मा को अधोगति में न पहुँचाओ| उसको अधोगति में पहुँचाना हिंसा है और उसका उत्थान ही शुद्ध अहिंसा है| ऐसा पुरुष अन्य आत्माओं के उत्थानहेतु भी उन्मुख रहता है| हाँ, इसका आरम्भ किसी को ठेस न पहुँचाने से होता है॰ यह उसी का एक अंगनप्रत्यंग है) , क्षमाभाव , मन-्वाणी की सरलता , आचार्योपासना अर्थात् श्रद्धा - भक्तिसहित सद्गुरु को सेवा और उनको उपासना , पवित्रता , अन्तःकरण को स्थिरता , मन और इन्द्रियोंसहित शरीर का निग्रह और - इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॰१८११ इस लोक और परलोक के देखे-सुने भोगों में आसक्ति का अभाव, अहं का अभाव तथा जन्म , मृत्यु , वृद्धावस्था , रोग और भोगादि में दुःख- दोष का बारम्बार चिन्तन , असक्तिरनभिष्वङ्ग पुत्रदारगृहादिषु| नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु१ १९१ | पुत्र , स्त्रो , धन और गृहादि में आसक्ति का अभाव , प्रिय तथा अप्रिय को प्राप्ति में चित्त का सदैव सम रहना ( क्षेत्रज्ञ को साधना स्त्री - पुत्रादि गृहस्थी की परिस्थितियों में ही आरम्भ होती है ) और- मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि १११०१ | श्रीकृष्ण एक योगी थे अर्थात् ऐसे किसी महापुरुष में ) अनन्य योग से अर्थात् योग के अतिरिक्त अन्य कुछ भी स्मरण न करते हुए, अव्यभिचारिणी भक्ति ( इष्ट के अतिरिक्त किसी चिन्तन का न आना ) , एकान्त स्थान का सेवन , मनुष्यों के समूह में रहने को आसक्ति का न होना तथा- अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्| एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोउन्यथात११११| मुझमें
त्रयोदश अध्याय २७७२ आत्मा के आधिपत्यवाले ज्ञान में एकरस स्थिति और तत्त्वज्ञान के अर्थस्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार- यह सब तो ज्ञान है और इससे जो विपरीत है वह सब अज्ञान है- ऐसा कहा गया है| उस परमतत्त्व परमात्मा के साक्षात्कार के साथ मिलनेवाली जानकारीं का नाम ज्ञान है॰ ( अध्याय चार में उन्होंने कहा कि यज्ञ के पूर्तिकाल में यज्ञ जिसे शेष छोड़ता है, उस ज्ञानामृत का पान करनेवाला सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है| अतः ब्रह्म के साक्षात्कार के साथ मिलनेवाली जानकारी ज्ञान है| यहाँ भी वही कहते हैं कि तत्त्वस्वरूप परमात्मा के साक्षात्कार का नाम ज्ञान है॰ ) इसके विपरीत सब अज्ञान है| अमानित्व इत्यादि उपर्युक्त लक्षण इस ज्ञान के पूरक हैं| यह प्रश्न पूरा हुआ| ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते| अनादिमत्परं बह्म न सत्तन्नासदुच्यते१ ११२१| अर्जुन ! जो जानने योग्य है तथा जिसे जानकर मरणधर्मा मनुष्य अमृत- तत्त्व को प्राप्त होता है, उसे अच्छी प्रकार कहूँगा| वह आदिरहित परमब्रह्म न सत् कहा जाता है और न असत् हीं कहा जाता हैः क्योंकि जब तक वह अलग है तब तक वह सत् है और मनुष्य उसमें समाहित हो गया तो कौन किससे कहे| एक ही रह जाता है, दूसरे का भान नहीं| ऐसी स्थिति में वह ब्रह्म न सत् है, न असत् हैः बल्कि जो स्वयं सहज है, वहीं है| सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोउक्षिशिरोमुखम् सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठतित ११३१| वह ब्रह्म सब ओर से हाथ- पैरवाला , सब ओर से नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर से श्रोत्रवाला है -सुननेवाला है; क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है॰ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च१११४| | वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जाननेवाला है, फिर भी सब इन्द्रियों से रहित है| वह आसक्तिरहित , गुणों से अतीत होने पर भी सबको धारण और जब
२७४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता पोषण करनेवाला और सभी गुणों को भोगनेवाला है अर्थात् एक-एक करके सभी गुणों को अपने में लय कर लेता है| जैसा श्रीकृष्ण कह आये हैं कि यज्ञ और तपों को भोगनेवाला मैं हूँ॰ अन्त में सम्पूर्ण गुण मुझमें विलीन हो जाते हैं| बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च| सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् १५/ | वह ब्रह्म सभी जीवधारियों के बाहर- भीतर परिपूर्ण है| चर और अचर रूप भी वही है| सूक्ष्म होने से वह दिखायी नहीं पड़ता , अविज्ञेय है, मन- इन्द्रियों से परे है तथा अति समीप भी वही है| अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्| भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं प्रभविष्णु चढ११६१| अविभाज्य होकर भी वह सम्पूर्ण चराचर भूतों में अलग ्अलग के सदृश प्रतीत होता है| वह जानने योग्य परमात्मा समस्त भूतों को उत्पन्न करनेवाला , भरण- पोषण करनेवाला और अन्त में संहार करनेवाला है| यहाँ बाह्य और आन्तरिक दोनों भावों की ओर संकेत किया गया है॰ जैसे- बाहर जन्म और भीतर जागृति, बाहर पालन और भीतर योगक्षेम का निर्वाह, बाहर शरीर का परिवर्तन और भोतर सर्वस्व का विलय अर्थात् भूतों को उत्पत्ति के कारणों का लय और उस लय के साथ ही अपने स्वरूप को प्राप्त हो जाता है| यह सब उसी ब्रह्म के लक्षण हैं| ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते| ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् |१७१| वह ज्ञेय ब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति है , तम से अति परे कहा जाता है| वह पूर्ण ज्ञानस्वरूप है , पूर्ण ज्ञाता है, जानने योग्य है और ज्ञान द्वारा ही प्राप्त होनेवाला है| साक्षात्कार के साथ मिलनेवाली जानकारी का नाम ज्ञान है| ऐसी जानकारीं द्वारा ही उस ब्रह्म का प्राप्त होना सम्भव है| वह सबके हृदय में स्थित है| उसका निवास स्थान हृदय है| अन्यत्र ढूँढ़ने पर वह नहों मिलेगा| अतः हृदय में ध्यान तथा योगाचरण द्वारा ही उस ब्रह्म को प्राप्ति का विधान है| और दूर ग्रसिष्णु
त्रयोदश अध्याय २ ७७५ इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते| ११८१| हे अर्जुन ! बस इतना ही क्षेत्र, ज्ञान तथा जानने योग्य परमात्मा का स्वरूप संक्षेप में कहा गया है| इसे जानकर मेरा भक्त मेरे साक्षात् स्वरूप को प्राप्त होता है| अभी तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जिसे क्षेत्र कहा था, उसी को अब प्रकृति' और जिसे क्षेत्रज्ञ कहा था, उसी को अब पुरुष शब्द से इंगित करते हैं - चैव विद्व्यनादी उभावपि| विकारांश्च प्रकृतिसम्भवान् ११९१ | यह प्रकृति - दोनों को हीं तू अनादि जान तथा सम्पूर्ण विकार त्रिगुणमयो प्रकृति से हो उत्पन्न हुआ जान| कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते| पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते| १२०१| कार्य और करण ( जिनके द्वारा शुभ कार्य किये जाते हैं-विवेक , वैराग्य इत्यादि तथा अशुभ कार्य होने में काम, क्रोध इत्यादि करण हैं) को उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और यह पुरुष सुख- दुःखों को भोगने में कारण कहा जाता है॰ प्रश्न उठता है कि॰क्या वह भोगता हीं रहेगा या इससे कभी छुटकारा भी मिलेगा? जब प्रकृति दोनों ही अनादि हैं, तब कोई इनसे छूटेगा कैसे? इस पर कहते हैं- पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्| कारणं गुणसङ्गोउस्य सदसद्योनिजन्मसु११२११| प्रकृति के बीच में खडा होनेवाला पुरुष ही प्रकृति से उत्पन्न हुए गुणों के कार्यरूप पदार्थों को भोगता है और इन गुणों का संग ही इस जोवात्मा के अच्छी तथा बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है| यह कारण अर्थात् प्रकृतिं पुरुषं गुणांश्चैव विद्वि और पुरुष और पुरुष प्रकृति
२७६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता के गुणों का संग समाप्त होने पर ही जन्म- मृत्यु से मुक्ति मिलती है| अब उस पुरुष पर प्रकाश डालते हैं कि वह किस प्रकार प्रकृति में खडा है?- उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः परमात्मेति देहेउस्मिन्युरुषः परः१ १२२१| वह पुरुष उपद्रष्टा , हृदय देश ही समीप- हाथ, पाँव , मन जितना आपके समीप है उससे भी अधिक समीप द्रष्टा के रूप में स्थित है| उसके प्रकाश में आप भला करें, बुरा करें, उसे कोई प्रयोजन नहीं है| वह साक्षी के रूप में खडा है| साधना का सही क्रम पकड़ में आने पर पथिक कुछ ऊपर उठा, उसकी ओर तो द्रष्टा पुरुष का क्रम बदल जाता है, वह अनुमन्ता अनुमति प्रदान करने लगता है, अनुभव देने लगता है| साधना द्वारा और समीप पहुँचने पर वहीं पुरुष ' भर्ता' बनकर भरण- पोषण करने लगता है , जिसमें आपके योगक्षेम की भी व्यवस्था कर देता है| साधना और सूक्ष्म होने पर वही ' भोक्ता ' हो जाता है॰ ' भोक्तारं यज्ञ तपसाम् यज्ञ , तप जो कुछ भी बन पड़ता है, सबको वह पुरुष ग्रहण करता है| और जब ग्रहण कर लेता है , उसके बादवाली अवस्था में ' महेश्वरः ' महान् ईश्वर के रूप में परिणत हो जाता है| वह प्रकृति का स्वामी बन जाता है; अभी कहों जीवित है तभी उसका मालिक है| इससे भी उन्नत अवस्था में वही पुरुष परमात्मेति जब परम से संयुक्त हो जाता है, तब परमात्मा कहलाता है| इस प्रकार शरीर में रहते हुए भी वह पुरुष आत्मा ' परः ' ही है, सर्वथा इस प्रकृति से परे ही है| अन्तर इतना ही है कि आरम्भ में वह द्रष्टा के रूप में था, क्रमशः उत्थान होते ्होते परम का स्पर्श कर परमात्मा के रूप में परिणत हो जाता है॰ य एवं वेत्ति पुरुषं च गुणैः सह| सर्वथा वर्तमानोउपि न स भूयोउभिजायते| १२३१ | इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य साक्षात्कार साथ विदित कर लेता है, वह सब प्रकार से बरतता हुआ भी फिर नहीं चाप्युक्तो में बहुत बढा किन्तु प्रकृति चाप्युक्तो प्रकृतिं
त्रयोदश अध्याय २ ७७७ जन्मता अर्थात् उसका नहीं होता| यहीं मुक्ति है| अभी तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने ब्रह्म और प्रकृति की प्रत्यक्ष जानकारीं के साथ मिलनेवाली परमगति अर्थात् उसका से निवृत्ति पर प्रकाश डाला और अब वे उस योग पर बल देते हैं जिसको प्रक्रिया है आराधनाः क्योंकि इस कर्म को कार्यरूप दिये बिना कोई पाता नहों| ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना| अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे| १२४१| हे अर्जुन! उस आत्मानम् ' परमात्मा को कितने ही मनुष्य तो ' आत्मना - अपने अन्तर्चिन्तन से ध्यान के द्वारा ' आत्मनि - हृदय ्देश में देखते हैं, कितने ही सांख्ययोग के द्वारा ( अर्थात् अपनो शक्ति को समझते हुए उसी कर्म में प्रवृत्त होते हैं॰ ) और अन्य बहुत से उसे निष्काम कर्मयोग के द्वारा देखते हैं| समर्पण के साथ उसी नियत कर्म में प्रवृत्त होते हैं| प्रस्तुत श्लोक में मुख्य साधन है ध्यान| उस ध्यान में प्रवृत्त होने के लिये सांख्ययोग और निष्काम कर्मयोग दो धाराएँ हैं| अन्ये त्वेवमजानन्तः उपासते| तेउपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः1 १२५१| परन्तु दूसरे , जिनको साधना का ज्ञान नहों है, वे इस प्रकार न जानते हुए " अन्येभ्यः दूसरे जो तत्त्व को जाननेवाले महापुरुष हैं, उनके द्वारा सुनकर ही उपासना करते हैं और वे सुनने के परायण हुए पुरुष भी मृत्युरूपी संसार - सागर से निःसन्देह तर जाते हैं| अतः कुछ भी पार न लगे तो सत्संग करें| सन्तों के सान्निध्य में रहें| यावत्सञ्जचायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्| क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ| |२६| | हे अर्जुन यावन्मात्र भी स्थावर- जंगम वस्तुएँ उत्पन्न होतीं हैं, उन सम्पूर्ण को तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न जान| प्राप्ति कब होती है? इस पर कहते हैं- पुनर्जन्म पुनर्जन्म श्रुत्वान्येभ्य जो कुछ
२७८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्| विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति| |२७१ | जो पुरुष विशेष रूप से नष्ट होते हुए चराचर सभी भूतों में नाशरहित परमेश्वर को समभाव से स्थित देखता है, वहीं यथार्थ देखता है| अर्थात् उस प्रकृति के विशेष रूप से नष्ट होने पर ही वह परमात्मस्वरूप है, इससे पहले नहीं| इसी पर पोछे अध्याय आठ में भी कहा भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्ज्ञितः| भूतों के वे भाव, जो ( भले अथवा बुरे ) कुछ भी ( संस्कार ) संरचना करते हैं, उनका मिट जाना ही कर्म की पराकाष्ठा है॰ उस समय कर्म पूर्ण है| वही यहाँ भी कहते हैं किजो चराचर भूतों को नष्ट होते हुए और परमेश्वर को समभाव से स्थित देखता है, वही सहीं देखता है| समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमी श्वरम्| न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्| २८1१ क्योंकि वह पुरुष सर्वत्र समभाव से स्थित परमेश्वर को समान जेसा है, वैसा ही समान ) देखता हुआ अपने द्वारा स्वयं को नष्ट नहों करता| क्योंकि जैसा था , वैसा उसने देखा इसलिये वह परमगति को प्राप्त होता है| प्राप्तिवाले पुरुष के लक्षण बताते हैं- च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यतित १२९१| जो पुरुष कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति के द्वारा ही किया जाता देखता है अर्थात् जब तक प्रकृति है तभी तक कर्मों का होना देखता है तथा आत्मा को अकर्त्ता देखता है , वहीं यथार्थ देखता है| यरा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति| तत एव च विस्तारं बह्म सम्पद्यते तदा|१३०|| जिस काल भूतों के न्यारे-न्यारे भावों को एक परमात्मा में प्रवाहित , स्थित देखता है तथा उस परमात्मा से ही सम्पूर्ण भूतों का विस्तार समं प्रकृत्यैव सम्पूर्ण = में मनुष्य
त्रयोदश अध्याय २७९ देखता है , उस समय वह ब्रह्म को प्राप्त होता है जिस क्षण यह अवस्था आ गयो , उसी क्षण वह ब्रह्म को प्राप्त होता है| यह लक्षण भी स्थितप्रज्ञ महापुरुष का हीं है| अनादित्वान्नि्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः शरीरस्थोउपि कौन्त्तेय न करोति न लिप्यते| १३११ | कौन्तेय ! अनादि होने से और होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित भी वास्तव में न करता है और न लिप्त हीं होता है| किस प्रकार? - यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते| सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते११३२१| जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त हुआ आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहों होता , ठीक वैसे ही सर्वत्र देह में स्थित हुआ भी आत्मा होने के कारण देह के गुणों से लिप्त नहों होता| आगे कहते हैं- यथा प्रकाशयत्येकः लोकमिमं रविः| क्षेत्रं क्षेत्री तथा प्रकाशयति भारत११३३१| अर्जुन ! जिस प्रकार एक ही सूर्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है| अन्त में निर्णय देते हैं- क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॰ ३४१| इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा विकारसहित प्रकृति से छूटने के उपाय को जो ज्ञानरूपी नेत्रों द्वारा देख लेते हैं, वे महात्माजन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं| अर्थात् क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ को देखने की आँख ज्ञान है और ज्ञान साक्षात्कार का ही पर्याय है| गुणातीत होत़े हुए गुणातीत कृत्स्नं = कृत्स्नं
२८० श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता निष्कर्ष - गीता के आरम्भ में धर्मक्षेत्र , कुरुक्षेत्र का नाम तो लिया गया; किन्तु वह क्षेत्र वस्तुतः है कहाँ? - वह स्थल बताना शेष था, जिसे स्वयं शास्त्रकार ने प्रस्तुत अध्याय में स्पष्ट किया - कौन्तेय ! यह शरीर हीं एक क्षेत्र है| जो इसको जानता है वह क्षेत्रज्ञ है॰ वह फँसा नहों बल्कि निर्लेप है॰ इसका संचालक है॰ " अर्जुन ! सम्पूर्ण क्षेत्रों में मैं भी क्षेत्रज्ञ हूँ॰ - अन्य महापुरुषों से अपनी तुलना की| इससे स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण भी एक योगी थे; क्योंकि जो जानता है वह क्षेत्रज्ञ है , ऐसा महापुरुषों ने कहा है| मैं भी क्षेत्रज्ञ हूँ अर्थात् अन्य महापुरुषों की तरह मैं भी हूँढ़ उन्होंने क्षेत्र जैसा है , जिन विकारोंवाला है तथा क्षेत्रज्ञ जिन प्रभावोंवाला है उस पर प्रकाश डाला मैं ही कहता हूँ - ऐसी बात नहों है, महर्षियों ने भी यहीं कहा है| वेद के छन्दों में भी उसीं को विभाजित करके दर्शाया गया है| भी वही मिलता है| शरीर (जो क्षेत्र है) क्या इतना ही है, जितना दिखायो देता है? इसके होने के पीछे जिनका बहुत बड़ा हाथ है, उन्हें गिनाते हुए बताया कि अष्टधा मूल प्रकृति, अव्यक्त प्रकृति , दस इन्द्रियाँ और मन, इन्द्रियों के पाँचों विषय , आशा , तृष्णा और वासना- इस प्रकार इन विकारों का सामूहिक मिश्रण यह शरीर है| जब तक ये रहेंगे , तब तक शरीर किसी-्न-किसी रूप में रहेगा ही| यही क्षेत्र है, जिसमें बोया भला-बुरा बीज संस्कार रूप में उगता है| पार पा लेता है, वह क्षेत्रज्ञ है॰ क्षेत्रज्ञ का स्वरूप बताते हुए उन्होंने ईश्वरीय गुणधर्मों पर प्रकाश डाला और कहा कि क्षेत्रज्ञ इस क्षेत्र का प्रकाशक है| उन्होंने बताया कि साधना के पूर्तिकाल में परमतत्त्व परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन ही ज्ञान है| ज्ञान का अर्थ है साक्षात्कार| इसके अतिरिक्त भी है , अज्ञान है॰ जानने योग्य वस्तु है परात्पर ब्रह्म| वह न सत् है, न असत् - इन दोनों से परे है| उसे जानने के लिये लोग हृदय में ध्यान करते हैं , बाहर मूर्ति इसमें ब्रह्मसूत्र में जो इसका जो कुछ
त्रयोदश अध्याय २८२ रखकर नहों| बहुत से लोग सांख्य- माध्यम से ध्यान करते हैँ, तो शेष निष्काम कर्मयोग , समर्पण के साथ उसको प्राप्ति के लिये उसी निर्धारित कर्म आराधना का आचरण करते हैं| जो उसको विधि नहीं जानते , वे तत्त्वस्थित महापुरुष के द्वारा सुनकर आचरण करते हैं| वे भी परमकल्याण को प्राप्त हो जाते हैं| अतः कुछ भी समझ में न आये तो उसके ज्ञाता महापुरुष का सत्संग आवश्यक है| स्थितप्रज्ञ महापुरुष के लक्षण बताते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि॰ जैसे आकाश सर्वत्र सम रहता हुआ भी निर्लेप है, जैसे सूर्य सर्वत्र प्रकाश करते हुए भी निर्लेप है, ठीक इसी प्रकार स्थितप्रज्ञ पुरुष , सर्वत्र सम ईश्वर को जैसा है वैसा ही देखने की क्षमतावाला पुरुष क्षेत्र से अथवा प्रकृति से सर्वथा निर्लेप है| अन्त में उन्होंने निर्णय दिया कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की जानकारी ज्ञानरूपी नेत्रों द्वारा हीं सम्भव है॰ ज्ञान, जैसा कि पीछे बताया गया, उस परमात्मा के प्रत्यक्ष दर्शन के साथ मिलनेवाली जानकारीं है| शास्त्रों रटकर दुहराना ज्ञान नहों बल्कि अध्ययन तथा महापुरुष से उस कर्म को समझकर , उस कर्म पर चलकर मनसहित इन्द्रियों के निरोध और उस निरोध के भी विलयकाल में परमतत्त्व को देखने के साथ जो अनुभूति होती है, उसी अनुभूति का नाम ज्ञान है| क्रिया आवश्यक है| इस अध्याय में मुख्यतः क्षेत्रज्ञ का विस्तार से वर्णन किया गया| वस्तुतः क्षेत्र का स्वरूप व्यापक है| शरीर कहना तो सरल है; शरीर का सम्बन्ध कहाँ तक है? , तो समग्र ब्रह्माण्ड मूल का विस्तार है| अनन्त अन्तरिक्षों तक आपके शरीर का विस्तार है| उनसे आपका जीवन ऊर्जस्वी है, उनके बिना आप जी नहों सकते| यह भूमण्डल , विश्व , जगत् , देश , प्रदेश और आपका यह दिखायी देनेवाला शरीर उस का एक टुकड़ा भी नहीं है| इस प्रकार क्षेत्र का ही इस अध्याय में विस्तार से वर्णन है अतः - ३० तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु बह्यविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसम्बवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोउध्यायः ११३| | को बहुत किन्तु = प्रकृति प्रकृति
२८२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण होता है| श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्नीतायाः ' यथार्थगीता ' भाष्ये ` क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशो उध्यायः|११३१ | इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य यथार्थ गीता में ` क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ विभाग योग नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण होता है| हरिः ३ँ तत्सत् 1१
१| ३ँँ श्री परमात्मने नमः ( 0 ४ अथ चतुर्दशोडध्यायः ११ पिछले अनेक अध्यायों में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने ज्ञान का स्वरूप स्पष्ट किया| अध्याय ४/१९ में उन्होंने बताया कि जिस पुरुष द्वारा सम्पूर्णता से आरम्भ किया हुआ नियत का आचरण क्रमशः उत्थान होते-्होते इतना सूक्ष्म हो गया कि कामना और संकल्प का सर्वथा शमन हो गया, उस समय जिसे वह जानना चाहता है उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति हो जाती है , उसी अनुभूति का नाम ज्ञान है| तेरहवें अध्याय में ज्ञान को परिभाषित किया अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्| आत्मज्ञान में एकरस स्थिति और तत्त्व के अर्थस्वरूप परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन ज्ञान है॰ क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ के भेद को विदित कर लेने के साथ ही ज्ञान है| ज्ञान का अर्थ शास्त्रार्थ नहों , शास्त्रों को याद कर लेना ही ज्ञान नहों है| अभ्यास को वह अवस्था ज्ञान है , जहाँ वह तत्त्व विदित होता है| परमात्मा के साक्षात्कार के साथ मिलनेवाली अनुभूति का नाम ज्ञान है, विपरीत सब कुछ अज्ञान है| इस प्रकार सब कुछ बता लेने पर अध्याय चौदह में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं - अर्जुन ! उन ज्ञानों में भी परम उत्तम ज्ञान को मैं फिर भी तेरे लिये कहूँगा| योगेश्वर उसी की पुनरावृत्ति करने जा रहे हैं; क्योंकि ' सास्त्र सुचिन्तित पुनि पुनि देखिअ ( रामचरितमानस , ३/३६/८ )- भली प्रकार चिन्तन किया हुआ शास्त्र भी बार-बार देखना चाहिये| इतना ही नहीं , ज्यों-ज्यों आप साधन- पथ पर अग्रसर होंगे , ज्यों-ज्यों उस इष्ट में प्रवेश पाते जायेंगे , त्यों-त्यों ब्रह्म से नवीन-् नवीन अनुभूति मिलेगी| यह जानकारी सद्गुरु महापुरुष ही देते हैं, इसलिये श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं फिर भी कहूँगा| कर्म इसके भो प्रस्तुत
२८४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता सुरति ( स्मृति ) ऐसा पटल है , जिस पर संस्कारों का अंकन सदैव होता रहता है॰ यदि पथिक को इष्ट में प्रवेश दिलानेवाली धूमिल पडतीं है तो उस स्मृति- पटल पर प्रकृति अंकित होने लगती है, जो विनाश का कारण है| इसलिये पूर्तिपर्यन्त साधक को इष्ट - सम्बन्धी जानकारी रहना चाहिये आज स्मृति जीवन्त है; किन्तु अग्रेतर अवस्थाओं में प्रवेश मिलने के साथ यह अवस्था नहीं रह जायेगी| इसीलिये पूज्य महाराज जी' कहा करते थे कि ब्रह्मविद्या का चिन्तन रोज करो, एक माला रोज घुमाओ- जो चिन्तन से घुमायी जाती है, बाहर कोी माला नहीं| यह तो साधक के लिये है; जो वास्तविक सद्गुरु होते हैं वे सतत उस पथिक के पीछे लगे रहते हैं| भोतर उसकीं आत्मा से जागृत होकर तथा बाहर अपने क्रिया- कलापों से उसे भविष्य में घटित होनेवाली परिस्थितियों से अवगत कराते चलते हैं| योगेश्वर श्रीकृष्ण भी महापुरुष थे| अर्जुन शिष्य के स्थान पर है॰ उसने उनसे सँभालने की प्रार्थना को थी| इसलिये योगेश्वर का कथन है कि ज्ञानों में भी अति उत्तम ज्ञान को मैं पुनः तेरे लिये कहूँगा| श्रीभगवानुवाच परं भूटाः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः११११| अर्जुन ! ज्ञानों में भी अति उत्तम ज्ञान , परमज्ञान को मैं फिर भी तेरे लिये कहूँगा (जिसे पोछे कह चुके हैं) , जिसे जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परमसिद्धि को प्राप्त होते हैं ( जिसके कुछ भी पाना शेष नहों रहता ) इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः सर्गेउपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति चढ१२१| इस ज्ञान का ' उपाश्रित्य - नजदीक से आश्रय लेकर , क्रिया से चलकर , पास पहुँचकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए लोग सृष्टि के आदि में पुनः जन्म नहीं जानकारी दुहराते किन्तु = श्रीकृष्ण बाद
अध्याय २८५ लेते और प्रलयकाल में अर्थात् शरीरान्त होते समय व्याकुल नहीं होते; क्योंकि महापुरुष के शरीर का अन्त तो उसी दिन हो जाता है, जब वह स्वरूप को प्राप्त होता है| उसके बाद उसका शरीर रहने का एक मकान मात्र रह जाता है| पुनर्जन्म का स्थान कहाँ है, जहाँ लोग जन्म लेते हैं? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- मम योनिर्महद्बह्य तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत११३ | हे अर्जुन! मेरी महद्ब्रह्म' अर्थात् अष्टधा मूल प्रकृति सम्पूर्ण भूतों को योनि है और उसमें मैं चेतनरूपी बीज को स्थापित करता हूँ॰ उस जड़- चेतन के संयोग से सभी भूतों को उत्पत्ति होती है| सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः तासां बह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिताढ़१४१| कौन्तेय ! सब योनियों में जितने शरीर उत्पन्न होते हैं , उन सबको ` योनिः ' गर्भधारण करनेवाली माता आठ भेदोंवाली मूल प्रकृति है और मैं ही बीज का स्थापन करनेवाला पिता हूँ| अन्य कोई न माता है, न पिता| जब तक जड़- चेतन का संयोग रहेगा , जन्म होत़े रहेंगे; निमित्त तो कोई्नकोई बनता ही रहेगा| चेतन आत्मा जड़ प्रकृति में क्यों बँध जाती है? इस पर कहते हैं- सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्|१५/| महाबाहु अर्जुन ! सत्त्वगुण , रजोगुण और तमोगुण प्रकृति से उत्पन्न हुए ही इस अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं॰ किस प्रकार? - तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्1 सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघत१६१| निष्पाप अर्जुन ! उन तोनों गुणों में प्रकाश करनेवाला निर्विकार सत्त्वगुण निर्मलत्वात् ' निर्मल होने के कारण सुख और ज्ञान की आसक्ति से चतुर्दश तोनों गुण
२८६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता आत्मा को शरीर में बाँधता है| सत्त्वगुण भी बन्धन ही है| अन्तर इतना हीं है एकमात्र परमात्मा में है और ज्ञान साक्षात्कार का नाम है| सत्त्वगुणी तब तक बँधा है जब तक परमात्मा का साक्षात्कार नहों हो जाता रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्| तन्रिबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॰१७१| हे अर्जुन ! राग का जोता - जागता स्वरूप रजोगुण है| उसे तू ' कर्मसङ्गेन ' कामना और आसक्ति से उत्पन्न हुआ जान| वह जोवात्मा को कर्म और उसके फल को आसक्ति में बाँधता है| वह कर्म में प्रवृत्ति देता है| तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत1१८१ | अर्जुन समस्त देहधारियों को मोहनेवाले को तू अज्ञान से उत्पत्न हुआ जान| वह इस जीवात्मा को प्रमाद अर्थात् व्यर्थ की चेष्टा , आलस्य कि कल करेंगे ) और निद्रा के द्वारा बाँधता है| निद्रा का अर्थ यह नहों है कि तमोगुणी अधिक सोता है| शरीर सोता हो ऐसी बात नहीं| ' या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी| जगत् ही रात्रि है| तमोगुणी व्यक्ति इस जगत्रूपी निशा में रात-्दिन व्यस्त रहता है, प्रकाश स्वरूप की ओर अचेत रहता है॰ यही तमोगुणी निद्रा है| जो इसमें फँसा है, सोता है| अब तीनों गुणों के बन्धन का सामूहिक स्वरूप बताते हैं- सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत| ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्चयत्युत११९१| अर्जुन ! सत्त्वगुण सुख में लगाता है, शाश्वत परमसुख को धारा में लगाता है, रजोगुण कर्म करता है और तमोगुण ज्ञान को आच्छादित करके प्रमाद में अर्थात् अन्तःकरण को व्यर्थ चेष्टाओं में लगाता है| जब गुण एक ही स्थान पर एक ही हृदय में हैं तो अलग ्अलग कैसे विभक्त हो जाते हैं? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं- कि सुख तमोगुण में प्रवृत्त
अध्याय २८७ रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा| ११०१| हे अर्जुन ! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है, वैसे हीं सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर बढ़ता है तथा इसी प्रकार रजोगुण और सत्त्वगुण को दबाकर तमोगुण बढ़ता है| यह कैसे पहचाना जाय कि कब और कौन-सा गुण कार्य कर रहा है? - सर्वद्वारेषु देहेडस्मिन्प्रकाश उपजायते| यरा तरा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युता ११११| जिस काल शरीर तथा अन्तःकरण और सम्पूर्ण इन्द्रियों में ईश्वरीय प्रकाश और बोधशक्ति उत्पन्न होती है , उस समय ऐसा जानना चाहिये कि सत्त्वगुण विशेष वृद्धि को प्राप्त हुआ है| तथा- लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा| रजस्येतानि जायान्ते विवृद्धे भरतर्षभा११२१| हे अर्जुन की विशेष वृद्धि होने पर लोभ, कार्य में प्रवृत्त होने की कर्मों का आरम्भ अशान्ति अर्थात् मन को चंचलता, विषय भोगों को लालसा- यह सब उत्पन्रन होते हैं| अब तमोगुण की वृद्धि में क्या होता है? - अप्रकाशोउप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च| तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दनढ़ ११३१| अर्जुन ! तमोगुण के बढ़ने पर अप्रकाशः (प्रकाश परमात्मा का द्योतक है) ईश्वरीय प्रकाश को ओर न बढ़ने का स्वभाव, कार्यम् कर्म - जो करने योग्य प्रक्रिया-विशेष है उसमें अप्रवृत्ति, अन्तःकरण में व्यर्थ की चेष्टाओं का प्रवाह और संसार में मुग्ध करनेवाली प्रवृत्तियाँ - यह सभी उत्पन्न होते हैं| इन गुणों की जानकारी से लाभ क्या है?- यरा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ११४ | चतुर्दश रजोगुण ज्ञानं में इस रजोगुण चेष्टा, देहभृत्
२८८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता जब यह जीवात्मा सत्त्वगुण के वृद्धिकाल को प्राप्त होता है शरीर-्त्याग करता है , तब उत्तम कर्म करनेवालों के मलरहित दिव्य लोकों को प्राप्त होता है| तथा- रजसि गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते| तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते१ ११५/| रजोगुण को वृद्धि होने पर मृत्यु को प्राप्त होनेवाला कर्मों की आसक्तिवाले मनुष्यों में जन्म लेता है तथा तमोगुण की वृद्धि में मरा हुआ पुरुष मूढ़ योनियों में जन्म लेता है, जिसमें कोट- पतंगादिपर्यन्त योनियों का विस्तार है| अतः गुणों में भी मनुष्यों को सात्त्विक गुणोंवाला होना चाहिये| प्रकृति का यह बैंक आपके अर्जित गुणों को मृत्यु के उपरान्त भी उन्हें आपको सुरक्षित लौटाता है| अब देखें इसका परिणाम- कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्| रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्|११६| | सात्त्विक कर्म का फल सात्त्विक, निर्मल, सुख, ज्ञान और वैराग्यादि कहा गया है राजस कर्म का फल दुःख और तामस कर्म का फल अज्ञान है| तथा सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव चढ प्रमादमोहौ तमसो भवतोउ्ज्ञानमेव चढ११७१| सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्रन होता है ( ईश्वरीय अनुभूति का नाम ज्ञान है) ईश्वरीय अनुभूति का प्रवाह होता है| रजोगुण से निःसन्देह लोभ उत्पन्न होता है तथा से प्रमाद, मोह, आलस्य ( अज्ञान) ही उत्पन्न होता है॰ ये उत्पन्न होकर कौन-सी गति देते हैं? - ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः१ ११८१| सत्त्वगुण में स्थित हुआ पुरुष ऊर्ध्वमूलम् - उस मूल परमात्मा को में मृत्यु प्रलयं तमोगुण
अध्याय २८९ ओर प्रवाहित होता है, निर्मल लोकों को जाता है॰ रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्यम श्रेणी के मनुष्य होते हैं , जिनके पास न सात्त्विकं विवेक- वैराग्य ही होता है और न अधम कोट- पतंग योनियों में जाते हैं बल्कि को प्राप्त होते हैं और निन्दित तमोगुण में प्रवृत्त हुए तामस पुरुष ' अधोगतिः अर्थात् पशु- पक्षी , कोट - पतंगादि अधम योनियों को प्राप्त होते हैं| इस प्रकार किसी -न-किसी रूप में योनि के ही कारण हैं|जो पुरुष गुणों को पार कर लेते हैं , वे जन्म - बन्धन से छूट जाते हैं और मेरे स्वरूप को प्राप्त होते हैं| इस पर कहते हैं- नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति| गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोउधिगच्छतित११९१| जिस काल में द्रष्टा आत्मा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्त्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यन्त परे परमतत्त्व को ' वेत्ति विदित कर लेता है, उस समय वह पुरुष मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है| यह बौद्धिक मान्यता नहों है गुण में बरतते हैं| साधन करते-करते एक ऐसीं अवस्था आती है , जहाँ उस परम से अनुभूति होती है कि गुणों के सिवाय कोई कर्त्ता नहों दिखता, उस समय पुरुष तीनों गुणों से अतीत हो जाता है| यह कल्पित मान्यता नहों है| इसी पर आगे कहते हैं- गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्! जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तो उमृतमश्नुते| १२०१| पुरुष इन स्थूल शरीरों को उत्पत्ति के कारणरूप तीनों गुणों से अतीत होकर जन्म , मृत्यु , वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से विशेष रूप से मुक्त हाकर अमृत तत्त्व का पान करता है| इस पर अर्जुन ने प्रश्न किये- अर्जुन उवाच कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो| किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते १२११| चतुर्दश पुनर्जन्म तीनों गुण कि गुण
२९ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता प्रभो ! इन तीनों गुणों से अतीत हुआ पुरुष किन-किन लक्षणों होता है और किन प्रकार के आचरणोंवाला होता है तथा मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है? श्रीभगवानुवाच प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति| १२२१| अर्जुन के उपर्युक्त तीनों प्रश्नों का उत्तर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा - अर्जुन ! सत्त्वगुण के कार्यरूप ईश्वरीय प्रकाश, के कार्यरूप और तमोगुण के कार्यरूप मोह को न तो प्रवृत्त होने पर बुरा समझता है और न निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा ही करता है| तथा- उदासीनवदासीनो गुणैर्यों न विचाल्यते| गुणा वर्तन्त योउवतिष्ठति नेङ्गते| १२३१| जो इस प्रकार उदासीन के सदृश स्थित हुआ गुणों द्वारा विचलित नहों किया जा सकता गुण गुण में ही बरतते हैं ~ ऐसा यथार्थतः जानकर उस स्थिति चलायमान नहों होता , तभी वह गुणों से अतीत होता है| समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः २४१ | जो निरन्तर स्वयं में अर्थात् आत्मभाव में स्थित है , सुख और दुःख में सम है, मिट्टी , पत्थर और स्वर्ण में भी समान भाववाला है, धैर्यवान् है, जो प्रिय और अप्रिय को बराबर समझता है , अपनी निन्दा तथा स्तुति में भी समान भाववाला है और - मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः| सर्वारम्भपरित्यागी स उच्यते| २५ | जो मान और अपमान में सम है , मित्र और शत्रु - पक्ष में भी सम है , वह सम्पूर्ण आरम्भों से रहित हुआ पुरुष गुणातीत कहा जाता है| से युक्त देते हुए जो पुरुष रजोगुण प्रवृत्ति इत्येव गुणातीतः
अध्याय श्लोक बाईस से पचीस तक गुणों से अतीत पुरुष के लक्षण और आचरण बताये गये कि वह चलायमान नहीं होता , गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता , स्थिर रहता है| अब प्रस्तुत है गुणों से अतीत होने को विधि- मां च योउव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते| स गुणान्समतीत्यैतान्दह्यभूयाय कल्पते| १२६१| जो पुरुष अव्यभिचारिणी भक्ति द्वारा अर्थात् इष्ट के अतिरिक्त अन्य सांसारिक स्मरणों से सर्वथा रहित होकर योग द्वारा अर्थात् उसी नियत कर्म द्वारा मुझे निरन्तर भजता है, वह इन तीनों गुणों का अच्छी प्रकार उल्लंघन करके परब्रह्म के साथ एक होने के योग्य होता है , जिसका नाम कल्प है| ब्रह्म के साथ एकीभाव हो जाना ही वास्तविक कल्प है| अनन्य भाव से नियत कर्म का आचरण किये बिना कोई भी गुणों से अतीत नहों होता| अन्त में योगेश्वर निर्णय देते हैं- हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च| शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च| २७| | हे अर्जुन ! उस अविनाशी ब्रह्म का ( जिसके साथ वह कल्प करता है जिसमें वह गुणातीत एकीभाव से प्रवेश करता है) , अमृत का, शाश्वत-्धर्म का और उस अखण्ड एकरस आनन्द का मैं ही आश्रय हूँ अर्थात् परमात्मस्थित सद्गुरु ही इन सबका आश्रय है| श्रीकृष्ण एक योगेश्वर थे| अब यदि आपको अव्यक्त अविनाशी ब्रह्म , शाश्वत - धर्म , अखण्ड एकरस आनन्द को आवश्यकता है तो किसी तत्त्वस्थित अव्यक्तस्थित महापुरुष की शरण लें| उनके द्वारा ही यह सम्भव है| निष्कर्ष - इस अध्याय के आरम्भ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि॰ अर्जुन ! ज्ञानों में भी अति उत्तम परमज्ञान को मैं फिर भी तेरे लिए कहूँगा , जिसे जानकर मुनिजन उपासना के द्वारा मेरे स्वरूप को प्राप्त होते हैं , फिर सृष्टि के आदि में चतुर्दश बह्यणो
२९२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता वे जन्म नहीं लेते; किन्तु शरीर का निधन तो होना हीं है , उस समय वे व्यथित नहों होते| वे वास्तव में शरीर तो उसीं दिन त्याग देते हैं , जिस दिन स्वरूप को प्राप्त होते हैं| प्राप्ति जीते-्जी होती है, किन्तु शरीर का अन्त होते समय भी वे व्यथित नहों होते| प्रकृति से ही उत्पन्न हुए रज, सत्त्व और तम तीनों गुण ही इस जीवात्मा को शरीरों में बाँधते हैं॰ दो गुणों को दबाकर तीोसरा गुण बढ़ाया जा सकता है| गुण परिवर्तनशील हैं| प्रकृति , जो अनादि है, नष्ट नहीं होती; बल्कि गुणों का प्रभाव टाला जा सकता है| गुण मन पर प्रभाव डालते हैं| जब सत्त्वगुण की वृद्धि रहती है तो ईश्वरीय प्रकाश और बोधशक्ति रहती है| रजोगुण रागात्मक है| उस समय कर्म का लोभ रहता है, आसक्ति रहतीं है और अन्तःकरण में तमोगुण कार्यरूप लेने पर आलस्य- प्रमाद घेर लेता है| सत्त्व को वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त पुरुष ऊपर के निर्मल लोकों में जन्म लेता है| रजोगुण को वृद्धि को प्राप्त हुआ मनुष्य मानवयोनि में ही लौटकर आता है और तमोगुण को वृद्धिकाल शरीर त्यागकर अधम ( पशु , कोट , पतंग इत्यादि) योनि को प्राप्त होता है| इसलिये मनुष्यों को क्रमशः उन्नत गुण सात्त्विक को ओर ही बढ़ना चाहिये| वस्तुतः तीनों गुण किसी-्न-किसी योनि के ही कारण हैं| गुण ही आत्मा को शरीरों में बाँधते हैं , इसलिये गुणों से अतीत होना चाहिये| जिससे मुक्त होते हैं उसका स्वरूप बताते हुए योगेश्वर ने कहा- अष्टधा मूल प्रकृति गर्भ को धारण करनेवाली माता है और मैं हीं बीजरूप पिता हूँ| अन्य न कोई माता है, न पिता| जब तक यह क्रम रहेगा , तब तक चराचर जगत् में निमित्त रूप से कोई-न-कोई माता-पिता बनते रहेंगे; किन्तु वस्तुतः प्रकृति ही माता है, मैं ही पिता हूँढ़ अर्जुन ने तीन प्रश्न किये- गुणातीत पुरुष के क्या लक्षण हैं? क्या आचरण हैं? और किस उपाय से मनुष्य इन तोनों गुणों से अतीत होता है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गुणातीत पुरुष के लक्षण और आचरण बताये और अन्त में गुणातीत होने का उपाय बताया किजो पुरुष अव्यभिचारिणी भक्ति में मनुष्य
अध्याय २९३ और योग के द्वारा निरन्तर मुझे भजता है, वह तीनों गुणों से अतीत हो जाता है| अन्य किसी का चिन्तन न करते हुए निरन्तर इष्ट का चिन्तन करना अव्यभिचारिणी भक्ति है| जो संसार के संयोग-वियोग से सर्वथा रहित है , उसी का नाम योग है॰ उसको कार्यरूप देने को प्रणाली का नाम कर्म है| यज्ञ जिससे सम्पन्न होता है , वह हरकत कर्म है| अव्यभिचारिणी भक्ति द्वारा उस नियत कर्म के आचरण से ही पुरुष तोनों गुणों से अतीत होता है और अतीत होकर ब्रह्म के साथ एकीभाव के लिये , पूर्ण कल्प को प्राप्त होने के लिये योग्य होता है| गुण जिस मन पर प्रभाव डालते हैं, उसके विलय होते हीं ब्रह्म के साथ एकीभाव हो जाता है , यही वास्तविक कल्प है| अतः बिना भजन किये कोई गुणों से अतीत नहों होता अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण निर्णय देते हैं - वह गुणातीत पुरुष जिस ब्रह्म के साथ एकोभाव में स्थित होता है उस ब्रह्म का, अमृत-्तत्त्व का , शाश्वत- धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का मैं ही आश्रय हूँ अर्थात् प्रधान कर्त्ता हू अब तो श्रीकृष्ण चले गये, अब वह आश्रय तो चला गया, तब तो बड़े संशय को बात है| वह आश्रय अब कहाँ मिलेगा? लेकिन नहों , श्रीकृष्ण ने अपना परिचय दिया है कि वे एक योगी थे , स्वरूपस्थ महापुरुष थे| ' शिष्यस्तेउहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्| अर्जुन ने कहा - मैं आपका शिष्य हूँ , आपको शरण हूँ॰ मुझे सँभालिये| स्थान- स्थान पर श्रीकृष्ण ने अपना परिचय दिया, स्थितप्रज्ञ महापुरुष के लक्षण बताये और उनसे अपनी तुलना की| अतः स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण एक महात्मा , योगी थे| अब यदि आपको अखण्ड एकरस आनन्द, शाश्वत - धर्म अथवा अमृत ्तत्त्व को आवश्यकता है तो इन सबकी प्राप्ति के स्रोत एकमात्र सद्गुरु हैं| सीधे पुस्तक पढ़कर इसे कोई नहीं पा सकता| जब वही महापुरुष आत्मा से अभिन्न होकर रथी हो जाते हैं , तो शनैः - शनैः अनुरागी को संचालित करते हुए उसके स्वरूप तक, जिनमें वे स्वयं प्रतिष्ठित हैं, पहुँचा देते हैं| वही एकमात्र माध्यम हैं॰ इस प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने को सबका आश्रय बताते हुए इस चौदहवें अध्याय का समापन जिसमें गुणों का विस्तार से वर्णन है| अतः- चतुर्दश किया ,
२९४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता ३४ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु बह्यविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे ' गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशो उध्यायः१११४१ | इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में गुणत्रय विभाग योग' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण होता है| श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः ' यथार्थगीता भाष्ये ` गुणत्रयविभागयोगो ' नाम चतुर्दशो उध्यायः १४१ | इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामो अड़गड़ानन्दकृत श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य यथार्थ गीता में गुणत्रय विभाग योग' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण होता है| १त हरिः ३>ँ तत्सत् 1१
अँँ श्री परमात्मने नमः | |अथ पञ्चदशोडध्यायः|| महापुरुषों ने संसार को विभिन्न से समझाने का प्रयास किया है| किसी ने इसी को भवाटवी कहा, तो किसीं ने संसार-्सागर कहा| अवस्था- भेद से इसीं को भवनदी और भवकूप भी कहा गया और कभी इसकी तुलना गोपद से की गयी अर्थात् जितना इन्द्रियों का आयतन है, उतना ही संसार है और अन्त में ऐसी भी अवस्था आयो कि ' नामु लेत भवसिन्धु ( रामचरितमानस , १/२४/४ ) भी सूख गया| क्या संसार में ऐसे समुद्र हैं? योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भी संसार को समुद्र और वृक्ष की संज्ञा दो| अध्याय बारह में उन्होंने कहा - जो मेरे अनन्य भक्त हैं , उनका संसार - समुद्र से शोघ्र ही उद्धार करनेवाला होता हूँ॰ यहाँ प्रस्तुत अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि संसार एक वृक्ष है, उसको काटते योगीजन उस परमपद को खोजते हैं॰ देखें- श्रीभगवानुवाच ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्| छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्१११| अर्जुन ! ऊर्ध्वमूलम् ' ऊपर को परमात्मा हीं जिसका मूल है अधःशाखम् ' - नीचे प्रकृति ही जिसको शाखाएँ हैं, ऐसे संसाररूपी पोपल के वृक्ष को अविनाशी कहते हैं॰ ( वृक्ष तो अ- श्वः अर्थात् कल तक भी रहनेवाला नहों , जब चाहे कट जायः किन्तु है अविनाशी| ) श्रीकृष्ण के अनुसार अविनाशी दो हैं - एक संसाररूपी वृक्ष अविनाशी और दूसरा उससे भी परे परम अविनाशी| वेद इस अविनाशी संसार-विटप के पत्ते कहे गये हैं| जो पुरुष इस संसाररूपी वृक्ष को देखते हुए विदित कर लेता है, वह वेद का ज्ञाता है| जिसने उस संसार - वृक्ष को जाना है , उसने वेद को जाना है , न कि ग्रन्थ पढ़नेवाला| पुस्तक पढ़ने से तो उधर बढ़ने की प्रेरणा मात्र मिलती है| पत्तों के दृष्टान्तों सुखाहीं| भवसिन्धु हुए ही
२९६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता स्थान पर वेद को क्या आवश्यकता है? वस्तुतः पुरुष भटकते- भटकते जिस अन्तिम कोपल अर्थात् अन्तिम जन्म को लेता है , वहों से वेद के वे छन्द (जो कल्याण का सृजन करते हैं ) प्रेरणा देते हैं , वहों से उनका उपयोग है| वहों से भटकाव समाप्त हो जाता है| वह स्वरूप की ओर घूम जाता है| तथा- अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके१ १२११ इस संसार - वृक्ष की तीनों गुणों के द्वारा बढ़ी हुई विषय और भोगरूप कोपलोंवाली शाखाएँ नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं| नीचे की ओर कोट - पतंगपर्यन्त और ऊपर देवभाव से लेकर ब्रह्मापर्यन्त सर्वत्र फैलो हुई हैं तथा केवल मनुष्य- योनि में कर्मों के अनुसार बाँधनेवाली हैं अन्य सभी योनियाँ भोग भोगने के लिये हैं| मनुष्य-योनि ही कर्मों के अनुसार बन्धन तैयार करती है॰ रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा| अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल- मसङ्गशस्त्रेण दृढन छित्त्चा| १३/ | परन्तु इस संसार - वृक्ष का रूप जैसा कहा गया है , वैसा यहाँ नहीं पाया जाताः क्योंकि न तो इसका आदि है , न अन्त है और न अच्छी प्रकार से इसकी स्थिति ही है ( क्योंकि यह परिवर्तनशील है)| इस सुदृढ़ संसाररूपी वृक्ष को दृढ़ ' असङ्गशस्त्रेण ' - असंग अर्थात् वैराग्यरूपी शस्त्र द्वारा काटकर ( संसाररूपी वृक्ष को काटना है| ऐसा नहों कि पोपल को जड़ में परमात्मा रहते हैं या पीपल का पत्ता वेद है और आरती करने लगे पेड़ की॰ ) इस संसार - वृक्ष का मूल तो स्वयं परमात्मा ही बीजरूप से प्रसारित है, तो क्या वह भो कट जायेगा? दृढ़ वैराग्य द्वारा इस प्रकृति का सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, यहीं काटना है| काटकर करें क्या? - मूलवाले
पञ्चदश अध्याय २९७ तत पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः तमेव चाद्यं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता १४| | दृढ़ वैराग्य द्वारा संसार विटप को काटने के उपरान्त उस परमपद परमेश्वर को अच्छी प्रकार खोजना चाहिये, जिसमें गये हुए पुरुष फिर पीछे संसार में नहों आते अर्थात् पूर्ण निवृत्ति प्राप्त कर लेते हैं| किन्तु उसकी खोज किस प्रकार सम्भव है? योगेश्वर कहते हैं , इसके लिये समर्पण आवश्यक है| जिस परमेश्वर से पुरातन संसार - वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी आदिपुरुष परमात्मा की मैं शरण हूँ (उनको शरण गये बिना वृक्ष मिटेगा नहों )| अब शरण में गया हुआ वैराग्य में स्थित पुरुष कैसे समझे कि वृक्ष कट गया? उसकी पहचान क्या है? इस पर कहते हैं- निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ै - र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्यायं तत्|१५/| उपर्युक्त प्रकार के समर्पण से जिनका मोह और मान नष्ट हो गया है, आसक्तिरूपी संगदोष जिन्होंने जीत लिया है, अध्यात्मनित्या परमात्मा के स्वरूप में जिनकी निरन्तर स्थिति है, जिनको कामनाएँ विशेष रूप से हो गयो हैं और सुख-दुःख के द्वन्द्वों से हुए ज्ञानीजन उस अविनाशी परमपद को प्राप्त होते हैं| जब तक यह अवस्था नहीं आती , तब तक संसार- वृक्ष नहों कटता| यहाँ तक वैराग्य को आवश्यकता रहती है| उस परमपद का क्या स्वरूप है , जिसे पाते हैं?- न तद्भासयते सूर्यों न शशाङ्को न पावकः यद्गत्वा निवर्तन्ते तद्वाम परमं मम| १६| | उस परमपद को न सूर्य, न चन्द्रमा और न अग्नि ही प्रकाशित कर पाते जिस परमपद को प्राप्त कर मनुष्य पीछे संसार में नहों आते हैं, वही मेरा पुरुषं पुराणी| निवृत्त विमुक्त
२९८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता परमधाम है अर्थात् उनका नहों होता| इस पद की प्राप्ति में सबका समान अधिकार है इस पर कहते हैं- ममैवांशो जीवलोके सनातनः मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति| १७१ | जोवलोके' अर्थात् इस देह में ( शरीर ही लोक है) यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है और वही इस त्रिगुणमयी माया में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है| भला कैसे? - शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युक्क्रामतीश्वरः गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् १८१ जिस प्रकार वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को ग्रहण करके ले जाता है, ठीक उसी प्रकार देह का स्वामी जीवात्मा जिस पहले शरीर को त्यागता है, उससे मन और पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के कार्यकलापों को ग्रहण करके ( आकर्षित करके , साथ लेकर ) फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है , उसमें जाता है॰ (जब अगला शरीर तत्काल निश्चित है तो आटे का पिण्ड बनाकर किसे पहुँचाते हैं? लेता कौन है? इसलिये श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि यह अज्ञान तुझे कहाँ से उत्पत्रन हो गया कि पिण्डोदक क्रिया लुप्त हो जायेगी ) वहाँ जाकर करता क्या है? मनसहित छः इन्द्रियाँ कौन हैं?- श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घाणमेव चढ अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते| १९१| उस शरीर में स्थित होकर यह जोवात्मा कान, आँख, त्वचा , जिह्वा, नासिका और मन का आश्रय लेकर अर्थात् इन सबके सहारे हीं विषयों का सेवन करता है| किन्तु ऐसा दिखायी नहों पड़ता , सब उसे देख नहीं पाते| इस श्रोकृष्ण कहते हैं- उत्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्| नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ११०१| शरीर छोड़कर जाते हुए, शरीर में स्थित हुए, विषयों को भोगते हुए अथवा तीनों गुणों से युक्त हुए भी जीवात्मा को विशेष मूढ़ अज्ञानी नहों जानते| पुनर्जन्म जीवभूतः विमूढा
पञ्चदश अध्याय २९९ केवल ज्ञानरूपी नेत्रवाले ही उसे जानते हैं , देखते हैं , ठीक ऐसा ही है| अब वह दृष्टि कैसे मिले? आगे देखें- यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्| यतन्तोउप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः १११| योगीजन अपने हृदय में चित्त को सब ओर से समेटकर इस आत्मा को यत्न करते प्रत्यक्ष देखते हैं अकृतार्थ आत्मावाले अर्थात् मलिन अन्तःकरणवाले अज्ञानोजन यत्न करते हुए भी इस आत्मा को नहों जानते ( क्योंकि उनका अन्तःकरण बाह्य प्रवृत्तियों में अभी बिखरा है) | चित्त को सब ओर से समेटकर अन्तरात्मा में यत्न करनेवाले भाविकजन ही उसे पाने के योग्य होते हैं॰ अतः अन्तःकरण से सतत सुमिरन आवश्यक है| अब उन महापुरुषों के स्वरूप में जो विभूतियाँ पायी जाती हैं (जो पीछे बता भी आये हैं ) , उन पर प्रकाश डालते हैं- यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेउखिलम् यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्| ११२१ | जो तेज सूर्य में स्थित हुआ सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, जो तेज चन्द्रमा में स्थित है और जो तेज अग्नि में है, इसे तू मेरा ही जान| अब उस महापुरुष को कार्य-प्रणाली बताते हैं गामाविश्य च धारयाम्यहमोजसा| पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः| ११३१| मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूँ और चन्द्रमा में रसस्वरूप होकर सम्पूर्ण वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँप अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्रनं चतुर्विधम् ११४१ | मैं ही प्राणियों के शरीर में अग्निरूप से स्थित होकर प्राण और अपान हुआ चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ अध्याय चार में स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इन्द्रियाग्नि, संयमाग्नि , योगाग्नि , प्राण - अपानाग्नि , ब्रह्माग्नि इत्यादि तेरह - चौदह अग्नियों का उल्लेख हुए ही किन्तु भूतानि से युक्त
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता जिनमें सबका परिणाम ज्ञान है॰ ज्ञान ही अग्नि है| श्रीकृष्ण कहते हैं, ऐसा अग्निस्वरूप होकर प्राण और अपान से युक्त चार विधियों से ( जप सदैव श्वास- प्रश्वास से होता है , उसकी चार विधियाँ बैखरी , मध्यमा , पश्यन्ती और परा हैं -इन चार विधियों से) तैयार होनेवाले अन्न को मैं ही पचाता हूँप श्रीकृष्ण के अनुसार ब्रह्म हो एकमात्र अन्न है, जिससे आत्मा पूर्ण तृप्त हो जाता है फिर कभी अतृप्त नहों होता| शरीर के पोषक प्रचलित अन्नों को योगेश्वर ने आहार की संज्ञा दी है ( युक्ताहार...)| वास्तविक अन्न परमात्मा है| बैखरी , मध्यमा , पश्यन्ती और परा की चार विधियों से निकलकर ही वह अन्न परिपक्व होता है| इसी को अनेक ने नाम, रूप लीला और धाम कहा है| पहले नाम का जप होता है , क्रमशः हृदय- देश में इष्ट का स्वरूप प्रकट होने लगता है , तत्पश्चात् उसको लीला का बोध होने लगता है कि वह ईश्वर किस प्रकार कण- कण में व्याप्त है? किस प्रकार वह सर्वत्र कार्य करता है? इस प्रकार हृदय-्देश में क्रियाकलापों का दर्शन हीं लीला है ( बाहर की रामलोला रासलीला नहों ) और उस ईश्वरीय लोला को प्रत्यक्ष अनुभूति करते हुए जब मूललीलाधारी का स्पर्श मिलता है , तब धाम को स्थिति आती है| उसे जानकर साधक उसी में प्रतिष्ठित हो जाता है| उसमें प्रतिष्ठित होना और परावाणी की परिपक्वावस्था में परब्रह्म का स्पर्श कर उसमें स्थित होना दोनों साथ-्साथ होता है| इस प्रकार प्राण और अपान अर्थात् श्वास और प्रश्वास होकर चार विधियों से अर्थात् बैखरी , मध्यमा , पश्यन्ती और क्रमशः उत्थान होते- होते परा की पूर्तिकाल में वह ' अन्न - ब्रह्म परिपक्व हो जाता है , मिल भी जाता है पच भी जाता है और पात्र भी परिपक्व हीं है| सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च| वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्|११५| | मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ॰ मुझसे ही स्वरूप को स्मृति ( सुरति, जो तत्त्व परमात्मा विस्मृत है उसका स्मरण हो किया, महापुरुषों से युक्त