9 तितिक्षा क्या होती है तथा तितिक्षा का विषय क्या होता है? अभी भी साधन करने चाहिए। ( ऋग्वे. १०/९७/१५ ) प्राचीन काल में लोग ही राजा का चुनाव करते थे यह एक सूक्त से ज्ञात होता है। लेकिन साधनचतुष्टय सम्पत्ति के उत्तर ही ब्रह्मजिज्ञासा के रूप में सुस्पष्ट रूप से विदित होता है। अतः यहाँ पर भी उदात्त स्वर विधान के लिए प्रकृत सूत्र का कार्य है। कर्ता अपनी क्रिया और कर्म से जिसको अभिप्राय करता है वह सम्प्रदान होता है। यातारम् इसका क्या अर्थ है? सूत्र अर्थ का समन्वय- कृत्यस्य अपत्यम् इस अर्थ में कृत शब्द से अण् प्रत्यय करने पर कार्त: यह रूप बनता है। द्वितीययादि में आहुति का देवता इन्द्र है। जहाँ उदात्त का लोप होता है, वहाँ ` अनुदात्तस्य उदात्तः' अनुदात्तस्य उदात्तः यह पद जोड़ा जाता है। वह यह है कि जैसे इस जन्म में देहादिसङऱगाताभिमान का रागद्वेषादि द्वारा किया गया धर्माधर्म तत्फल अनुभव होता है तथा अतीत का अविद्यमान जन्म से अनादि अविद्या के द्वारा संसरण किया गया संसार भी अतीत से आगे नहीं आ सकता है। तथा मुमुक्षु नहीं होता है। अव्यय से षष्ठी समास निषेध का क्या उदाहरण है? आत्मा के अवयव नहीं होते हैं। निर्वृत्ति सुख प्रदान नहीं करती है। उसी प्रकार भूतबलिः, गोहितं, गोसुखं, गोमुखं, गोರಕ್ಷितम् इत्यादि इस सूत्र के उदाहरण हैं। अतः पञ्चानां राजाणां समाहारः इस विग्रह में पञ्चराजन् यहाँ पर तत्पुरुष समासान्त का राजाहःसखिभ्यष्टच् '' इससे टच् की प्रवृति होती है। प्रकृतपाठ में हमारे द्वारा पढ़े हुए समासस्वरों की आलोचना की है। यहाँ प्राक् यह पूर्व अर्थवाचक अवयव पद है। तृतीयासप्तम्योर्बहुलम् '' इस सूत्र से अदन्त अव्ययीभाव से तृतीया में और सप्तमी में बहुल सु प्रत्यय को अम् आदेश होता है। वहाँ पत्नी होती है। दिशावाचक और संख्यावाचक का सुबन्तम् समानाधिकरण से सुबन्त के साथ संज्ञा होने पर तत्पुरुषसमास संज्ञा होती है। प्रीतिपाश के द्वारा जिस प्रकार से मन के बन्धन का कारण होता है उसी प्रकार रागपाश के मोक्ष के लिए भी मन का कारण कारुणिक होता है। सूत्र का अर्थ - जिस अविद्यमान आहो उताहो से युक्त व्यवधान रहित तिङन्त को, उसको अनुदात्त नहीं होता है। उससे दण्डिन् ङीप् होता है। तब प्रमाणगत असम्भावना दूर हो जाती है। सूत्र का अर्थ- छन्द में दक्षिण आदि और अन्त उदात्त होता है। अर्थात् तत्पुरुष समास में तुल्य अर्थ में, तृतीयान्त, सप्तम्यन्त, उपमानवाची, अव्यय द्वितीयान्त और कृत्यप्रत्ययान्त पूर्वपद प्रकृति स्वर होता है। सूक्ष्म विचार से जाना जाता है की ये तीनों देव परमात्मा की तीन अभिव्यक्तियाँ ही हैं। जैसे स्वर्ग की प्राप्ति के लिए ज्योतिष्टोमयज्ञानी करते हैं। करुणा भी शास्त्र के विरुद्ध नहीं है, और यथार्थता की अनुभूति शास्त्रसम्मत होनी चाहिए। उसके साधन क्या है इस विषय में अनेक पूर्वपक्ष हैं। कर्मयोग के कितने दूर जाने चाहिए तथा कर्मयोग के फल को किस प्रकार से जानना चाहिए। सभी दर्शनों का आरम्भ उस दर्शन से ही होता है। प्राक्कडारात्समासः'' इस सूत्र से समास पद का अधिग्रहण किया गया है। और यहाँ उत्पन्न किये बिना भी बहुत रूपों में कार्य कारण रूप से ही रहता है। उदात्ताद् अनुदात्तस्य स्वरितः ये सूत्र में आये हुए पदच्छेद है। मनुष्य सामान्य रूप से एक शिर, दो लोचन और दो पाद होता है, किन्तु यह पुरुष सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सभी जगह विचरण करने वाले होने से अनेक विशेषताओं से रहित है। लेकिन जो सम्पूर्ण विश्व ओतप्रोतरूप से व्याप्त अनुस्यूत है वह परब्रह्म एक ही बार ऊपर और नीचे जाकर रह सकता है। वहाँ पर प्रमाण। उससे आवृत्त होकर निर्गुण ब्रह्म होता है। गमत् यह रूप कैसे सिद्ध होता है? (पा.द. 1.53 ) ननु किं वै तात्पर्यनिर्णायकलिङ्गम् । पतञ्जलि ने इस वेद की नौ शाखा का निर्देश किया फिर भी वर्तमान में पैप्लाद, और शौनक संज्ञा में ये दो ही शाखा प्राप्त होती है। व्यदधुः - विपूर्वक धाधातु से लङ् लकार प्रथमपुरुषबहुवचन में यह रूप निष्पन्न होता है। त्वष्ट ने एक हजार स्वर्ण वस्त्र निर्मित करके उसे समर्पित किया। द्व्याम् इति द्वितीयाम् । साकार शब्द के दो पर्याय लिखिए। यज्ञ के द्वारा अनायास से वह पशु देवीरूप को प्राप्त करता है। वररुचि ने भी 'भवन्ती', 'अध्यतीनी', 'हस्तनी' इत्यादि पारिभाषिक शब्दों का उल्लेख किया है, वे पाणिनीय'लट्, लुङ, लिट्'इत्यादि शब्द प्राचीन है। अन्यथा इन दोनों गुणवाचक से विशेषणत्व और विशेष्यत्व का भाव कामचरत्व से खञ्जकुब्जः, कुब्जखञ्जः इससे अनियामापत्ति होती है। अग्नि कौन से देव होते हैं जो जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त मनुष्य के साथ रहते है। इन दोनों के द्वारा तत्व तथा पदार्थ में परिशुद्धी होती है। तीनों समासों में जिस समास में पूर्वपद संज्ञावाचक है उस समास की संख्यापूर्वोद्विगुः इस सूत्र से द्विगु संज्ञा का विधान होता है। अव्ययीभावे चाकाले इस सूत्र की व्याख्या कीजिए। इसलिए वृत्ति स्वयं अज्ञान का नाश नहीं कर सकती है। यस्मान्न ऋते किञ्चन कर्म क्रियते तन्मे मन शिवसङ्कल्पमस्तु ॥ ३ ॥ अतिष्ठत् - स्थाधातु से लङ में प्रथमपुरुष एकवचन का रूप है। जिसको शास्त्र के द्वारा जाने हुए विषयों का स्वानुभव होने पर ज्ञानविज्ञान तृप्ति का अन्तः करण होता है। देवब्रह्मणोः यहाँ द्वन्द्वसमास है, देवश्च ब्रह्मा च देवब्रह्मणोः, तयोः देवब्रह्मणोः यहाँ विग्रह है। इस प्रकार से शरीर, वचन, मन के पुष्कल, धन तथा शुश्रुषा के द्वारा ईश्वर ही हमारे अनन्तकोटीजन्मान्तरों के द्वारा अर्जित सुकृतपरिपाक के द्वारा गुरुमूर्तिरूप से अवतरित है। भोग्यवस्तुओं में आकर्षण होता है। असुर की परिभाषा का निर्देश करते हुए वेद का वचन करते हैं - ते असुर अयज्ञा अक्षिणा अनक्षत्राः। यहाँ द्वितीयादि सप्तमी तत्पुरुष सामान्य होते हैं। विद्यमान होता है धर्मादि पुरुषार्थ में जहाँ वेद है'' जैसे बृहत् प्रातिशाख्यों में कहा गया है। और प्रतिपद विधान षष्ठयन्त का इससे समास प्राप्त होने से उक्त वार्तिक से उसका निषेध किया गया है। यहाँ आकारान्त घञन्त होने से दाय इस पद के अन्त यकार से उत्तर अकार को प्रकृत सूत्र से उदात्त स्वर होता है। यह ही एक नियम होता है। वहाँ पर प्रमाण। इसलिए केवल सुगुण की उपासना करनी चाहिए। गतौ यह सप्तमी एकवचनान्त पद है। और यहाँ इतरेतरयोग द्वन्द समास हुआ। यूपदारु इसका विग्रह वाक्य है - यूपाय दारु। इसका उत्तर सु प्रत्यय स्वार्थिक में होता है। मन ही बन्ध का कारण है ऐसा कहा गया है। अतः उत्तरपद यहाँ कर्मवाचक क्त प्रत्ययान्त है। निघण्टु में पाँच अध्याय है। किन्तु एक सौ आठ संख्या तक ही उपनिषद् प्राप्त होते है। तेरहवे मन्त्र में इन्द्र वृत्र का युद्धविषय में कहा गया है। क्रिया प्रश् न के अर्थ में विद्यमान किम् शब्द का लोप हुआ। उसकी पत्नी श्वशु और अन्य आकाङक्षा उससे द्वेष करते है। सु का उकार का उपदेसेजनुनासिक इत् '' इस सूत्र से इत् संज्ञा होने पर तस्य लोपः'' इससे लोप होने पर कृष्णश्रित स् होता है। अतः उसके स्थान पर पूतक का ही प्रयोग करते हैं। पर्जन्य सम्पूर्ण पिता माता कहलाते है। व्याख्या - देव इन्द्र आदि असुर के विषय में मारने का निश्चय किया उसी प्रकार तुम भक्तों को इच्छित फल दो। वहाँ प्रथमपाठ में साधन का सामान्य स्वरूप बताया गया है। और जो विष्णु प्रलय के बाद एक स्थान को तीन प्रकार से विशेष कम्पाता हुआ रोकता है, यह अर्थ है। श्रीरामकृष्ण के जीवन को और अनुभव को देखकर विवेकानन्द ने वेदान्त सम्प्रदाय के उपदल मतों के साधने के लिए और मतों की अविष्का को किया। 15. श्रवण मनन निदिध्यासन को जानना चाहिए, श्रवण के तात्पर्य में लिङगों को जानना चाहिए, वेदान्त में अधिकारी का विवेक उपस्थापित करना चाहिए। उससे यहाँ तिङ, शतृ-शानच् इत्यादि ग्रहण करते है। आप अन्तरिक्ष से हमारे लिए वृष्टि प्रदान करो। उससे यहाँ अयम् इस शब्द में विशेष्य होता है। धारणा कुशलता के अभाव में ब्रह्मविषयणी चित्तवृत्ति विचिन्तक धीरे धीरे एकाग्र जब होती है तब वह ध्यान कहलाता है। जंघाओं से वैश्य और पाद से शूद्र उत्पन्न हुए। नित्य वस्तु कौन-सी है जो तीनों कालों में रहती है वह नित्य वस्तु कहलाती है। बाल्यखिल्य सूक्तों को छोड़कर सम्पूर्ण ऋग्वेद में दस मण्डल, ८५ अनुवाक, और २०८ वर्ग है। इसलिए ये प्रमाणिक होते हैं। 18. समाधि का साधारण लक्षण क्या है? (2.6 ) चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः'' ( 2.1.36 ) सूत्रार्थ-चतुर्थ्यन्त अर्थ के लिए जो तदवाची अर्थबलिहितसुखरक्षितैः इसके साथ चतुर्थ्यन्त सुबन्त को विकल्प से तत्पुरुषसमास संज्ञा होती है। यह ज्ञान ही प्रकाशक होता है। निश्चय से एकांत फलदायक होता है। श्रुतियों के भी अन्दर सचक्षुरिव सर्नोऽकर्म इव समाना अमना इव अर्थात् जीवन्मुक्त देह इन्द्रियों में अभिमान के अभाव से आँखों से जो कुछ देखा जाता है वह वस्तुतः दिखाई नहीं देता है। सावेकचस्तृतीयादिविभक्तिः इस सूत्र से विभक्तिः इस प्रथमा एकवचनान्त पद की यहाँ अनुवृति आ रही है। सूत्र अर्थ का समन्वय- यहाँ अङ्ग इससे युक्त कुरु तिङन्त पद है। जो शब्द पूर्व गुणवाचक थे अब वे द्रव्यवाचक और गुणवचनशब्द से ग्रहण किये जाते हैं। चित्त का मल क्या होता है। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षसूक्त में पासों का वर्णन, उनका बुरा फल, और जुआरी का परिणाम दिया गया है। वेदान्त के द्वारा दुःखों की निवृत्ति निश्चय से ही होती है। अग्निप्रेत्यर्थक पुरोडाशयाग, इन्द्रप्रेत्यर्थक पुरोडाशयाग, और इन्द्रप्रेत्यर्थक पयोद्रोव्ययाग इन तीनों यागों का समूह दर्शयाग होता है। इस वार्तिक से षष्ठीतत्पुरुषसमास का निषेध होता है। सरल शब्दों में कहें तो - हे मित्रावरुणतुम महानता के प्रति प्रसिद्ध हो क्योंकि उसके द्वारा निरन्तर भ्रमण करने वाला सूर्य वर्षाकाल में जल देता है। उसके ही तात्पर्यग्राहकलिङ्गों के द्वारा वेदान्त वाक्यों के तात्पर्य का निर्णय किया जाता है। यहाँ तद्धितेषु अचाम् आदिः यह पदच्छेद है। जो भेद होता है वह व्यावर्तक भेद अथवा विशेष्य कहलाता है। अत: इस सूत्र का अर्थ होता है भेदक समानाधिकरण भेद से बहुल समास होता है'', और वह तत्पुरुषसमास संज्ञा होती है। यहाँ विविध अपराधो के प्रायश्चित्त के लिए प्रार्थना है। धीवर भी यदि अपने आत्मत्व से चिन्तन करता है तो वह भी उत्तम धीवर हो जाता है। वैसे ही यहाँ पर्जन्यदेवता का माहात्म्य प्रकट किया गया है, वहाँ उसके भयङ्कर रूप का वर्णन किया गया है, और पृथिवी पर उपयोगी रूप से जलवर्षा के द्वारा धन धान्य से पूर्णता के लिए प्रार्थना की गई है। वहाँ पर कहा गया है कि उपासना की परम्परा ही निर्विशेष ब्रह्म साक्षात्कार के निमित्त है। भू आदि तीन लोक यही अर्थ है। अथर्व शब्द का क्या अर्थ है? लेकिन वहाँ जाने के लिए नियुक्त होने पर माता हमेशा कहती है। सुबामन्त्रिते पराङ्गवत्स्वरे इससे सुप् की अनुवृत्ति होती है। इसलिए पतञ्जलि ने कहा है- अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वार्थोपस्थानम् इति। और जिस योग यज्ञ में पूजनीय एकीभूत हुआ। विवेक वैराग्य का कारण होता है इस प्रकार से सिद्धान्त कहते हैं। पाणिनीयशिक्षा- यह शिक्षा अत्यधिक प्रसिद्ध और लोकप्रिय है। इस सूत्र में तीन पद है। धारणा सत्य होने पर ही ध्यान सम्भव होता है। यथा देवदत्त! शब्द सम्बोधन एकवचन का रूप है। आत्मविषयक स्थैर्य का अनुकूल मानस व्यापार ही निदिध्यासन है इस प्रकार से वेदान्त परिभाषाकार ने कहा है। क्तक्तवतु निष्ठा यह सूत्र यहाँ प्रमाण है। मन चित्तकर्षक होता है। यहाँ झल् यह विभक्ति का विशेषण है। इन्द्र का अश्व रंग क्या है? वस्तुओ का दर्शन होता है, उसको प्राप्त किया जाता है, और उसका अनुभव जब होता है तब जो वृत्ति होती है वह प्रमोद कहलाती है। इससे भी व्याकरण की ओर लोक की प्रवृत्ति लम्बे काल से थी यह जाना जाता है। और अजादेः का अर्थ होता है अजादिगणपठितशब्दान्त से। रेचक, पूरक, कुम्भक आदि के द्वारा प्राण का निग्रह करना प्राणायाम कहलाता है। 'डाइप् शोधने' धातु से 'आतो मनिन' से विच् प्रत्यय। पुरुषसूक्त अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। षोडशश्लोकिकेशिक्षा- श्रीरामकृष्ण नाम के विद्वान के द्वारा षोडशश्लोकिकेशिक्षा इस नाम का एक छोटा ग्रन्थ भी लिखा है,जिसमे स्वर का और व्यञ्जन का विचार किया गया है। अतः प्रकृत सूत्र से यहाँ पूर्वपद बहु शब्द को विकल्प से प्रकृति स्वर होता है। अश्व शब्द 'स्वान्गशिटामदन्तानाम्'इस सूत्र से आद्युदात्त है। इसी प्रकार यद्वृत्त से परे तिङन्त को नित्य ही अनुदात्त नहीं होता है, यह सूत्र का अर्थ है। इसलिए ब्रह्मज्ञान का प्रतिबन्ध होता है। तत्पुरुष पाठ में सामान्य तत्पुरुष विधायक आठ सूत्रों का उल्लेख है। 'द्वितीयाटोस्वेनः' (पा. २. ४. ३४) इससे यहाँ यह आदेश हुआ है। आमन्त्रितस्य यह पद पदस्य इस पद के साथ सम्बद्ध है। चित्त शुद्ध हो जाने पर क्या करना चाहिए। सूत्र का अर्थ- स्त्रीत्व द्योत्य होने पर आजादिगणपठितशब्दान्त प्रातिपदिक से परे टाप् प्रत्यय होता है। (क) श्रवण (ख) मनन (ग) निदिध्यासन (घ) अपूर्वता 13. तात्पर्यनिर्णायक छ: लिङ्गो में यह अन्यतम नहीं है। जात्वपूर्वम् इस पूर्वसूत्र से अपूर्वम् इस प्रथमा एकवचनान्त पद की अनुवृति है। 2. यम किसे कहते हैं? इस ब्राह्मण के प्रारम्भ में ही इष्टी का विचार दिखाई देता है। एक सूक्त में भार्या के दुःख को छोड़कर के पति को प्राप्ति का विधान वर्णित है। गत्यर्थलोटा यह तृतीया एकवचनान्त पद है। जैसे - कृणानि हव्यदात्ते' इस पद में हकार पर विराम है। यह आनन्दमय कभी कौन होता है, कब होता है तथा कभी नहीं होता है। कृदन्त का ग्रहण होने पर गतिपूर्व और कारकपूर्व कृदन्त का भी ग्रहण होता है। इन सूक्तों के अध्ययन से उस समय की राजनिति स्थिति का विशाल वर्णन प्राप्त होता है। 8. धेर्यरूप। योगसूत्र में प्रत्याहार के स्वरूप के विषय में कहा गया है कि स्वविषयसम्प्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार इन्द्रियानां प्रत्याहार इति। ऊङूभावः अनूङ यह अव्ययीभाव है। वस्तुतः यहाँ पर आवरण को कहा गया है। इस शिक्षा में वैदिक स्वरों का उदाहरण सहित विशिष्ट और विस्तृत वर्णन है। शाखा के साथ किसका सम्बन्ध है? यहाँ भाष्य में भाष्यकार ने साधनों का क्रम बताया है सत्वशुद्धि ज्ञान प्राप्ति, सर्व कर्म सन्यास, ञ्ननिष्ठा इत्यादि। बृहदारण्यकोपनिषद् में - नान्योस्तोस्ति द्रष्टा (3-7.23)। अथर्व मन्त्रों में इहलोक परलोक फल के विषय में विवेचना करते है तथा घर निर्माण के लिए, नील बचाने के लिए, बीज बोने के लिए उपयोगी विषयों का तथा गृहस्थ जीवन के अनेक विषयों का वर्णन है। छान्दोग्योपनिषद् का वर्णन कीजिए। आगम कहता है कि ब्रह्म ही सत्य है। इस श्रुति से सुवर्ण अण्ड का गर्भभूत प्रजापति ही हिरण्यगर्भ के नाम से कहलाता है। 8 सत्य का वर्णन करने वाला मुण्डक श्रुति वाक्य कौन-सा है? कर्मफल यदि शुभ होता है तो कर्ता सुख का अनुभव करता है तथा कर्मफल बुरा होता है तो कर्ता दुःख का अनुभव करता है। तत्त्वमसि यहाँ पर जीवात्मा तथा परमात्मा के ऐक्य का प्रतिनिधि है। इसलिए अज्ञान का कभी भी नाश नहीं होता है। विवेकानन्द के मत में भक्ति कितने प्रकार की होती है? इस अध्याय का कथन है कि अग्निहोत्र से जिन देवों की संतुष्टि का विधान है अथवा देवों को तृप्त करते हैं, वे देव जीव के अन्दर रहते हैं। पहले दूसरे अध्याय में महाव्रत का वर्णन प्राप्त होता है। धागे जलते हैं तो तन्तु कार्य वाले वस्त्र भी फटा जाता है। इस अर्थ में निरुक्र में कहा है - मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः। क्योंकि रागदि बाह्यविषय होते हैं और वे अखण्डवस्तु को प्राप्त करने में कुछ भी सहायता नहीं करते हैं। इस कारण से यहाँ पर जल स्पर्श करते हैं। अन्तः करण में जितने निषिद्धकर्मों से उत्पन्न पाप होते हैं उतने ही वे पाप निषिद्धकर्म को प्रेरित करते हैं। क्योंकि वह ही वेदान्तों का तात्पर्य है। 'सामानि यो वेति स वेद तत्त्वम्'यह वचन सामवेद की महिमा को बताता है। 13.वेदान्त के चार अनुबन्ध है। इस सूत्र में चार पद है। व्याकरण शास्त्र की व्याख्या कीजिए। अतः उससे परे अनुदात्त के स्थान में प्रकृत सूत्र से स्वरित स्वर होता है। सूत्र व्याख्या-यह संज्ञा सूत्र है। वहाँ मन्त्र वैदिक तत्त्व के रूप में प्रसिद्ध है। वह जैसे कोई किसी विषय में मन को नियोजित करता है। साधारण रूप से अङ्गहीन आदि दोष रहित बकरे को बलि के लिए देते हैं। उदात्तः यह प्रथमान्त होने से विधायक पद है ऐसा जाना जाता है। 30. अव्ययीभावः'' इसका अधिकार कब तक है? हमें प्रसन्नता और सुख प्रदान करो। 46. बहुव्रीहि समास विधायक वार्तिक लिखो? समास भेद विषय पर अन्तिमपाठ में विस्तार पूर्वक आलोचना (विचार ) की जायेगी इस पाठ में केवल समास का ही अव्ययीभाव समास का विवरण है। सूत्र व्याख्या-यह विधिसूत्र है। 8. अत्यधिक गति से। यहाँ अग्नि के प्रति कहते है की हे अग्नि पिता वैसे ही पुत्र के कल्याण के लिए उसके पास में रहता है, अनायास से ही उसकी प्राप्ति का विषय है जैसे तुम भी हमारे कल्याण के लिए अनायास प्राप्ति का विषय होना चाहिए। ` अथ द्वितीयां प्रागीषात्'इस सूत्र से द्वितीयाम् यह पद अधिकृत है। तीन होते हैं पूरक कुम्भक तथा रेचक। इस प्रकार से चैतन्य वासना के द्वारा ही वृद्धिवृत्ति के ज्ञान के कारणों से आत्मा के आवरण के नाश के द्वारा आत्मा प्रकाशित होती है। उभय पदार्थ प्रधान है जहाँ वह उभयपदार्थ प्रधान हो। अतः अग्नि और सोम ने इन्द्र से एक पशु मांगा। स्तोकान्तिकदूरार्थकृच्छ्राणि क्तेन'' इस सूत्र का विग्रह सहित एक उदाहरण दीजिये। जो साधनचतुष्टय सम्पन्न होता है। इस प्रकार के मनुष्यों के लिए शास्त्रों में प्रायश्चित कर्म का विधान किया गया है। इसलिए सुख का उपाय इष्ट ही होता है। ब्राह्मण ग्रन्थों में स्थान-स्थान पर शब्दों के निर्वचन का निर्देश उपलब्ध होता है। सूत्र की व्याख्या- संज्ञा- परिभाषा- विधि- नियम अतिदेश अधिकार छः प्रकार के पाणिनीय सूत्रों में यह विधिसूत्र है। यहाँ तैजोमयत्व केवल वासनामय है। किन्तु दसवें मण्डल में अधिकतर तुम प्रत्यय का प्रयोग दिखाई देता है। अचक्षु पर्याय से अक्ष्ण को समासान्त तद्धित संज्ञक अच् प्रत्यय होता है। 4. इन्द्रियेभ्यः परा हर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः यह कठोपनिषद् में कही गई एक श्रुति है। स इद् देवेषु गच्छति - वह ही देवों में जाता है यह अर्थ है। तत्काल एतत्काल तददेश एतद्देश आदि विशेषण विशिष्ट वाचक पदों का एकदेश एकविशेष्य में देवदत्त स्वरूप पिण्डमात्र में यदि तात्पर्य है वह यह देवदत्त है इस प्रकार यहाँ लक्षण का कोई भी आश्रय नहीं लेना चाहिए। असुरेषु - असुर इस प्रातिपदिक का सप्तमी एकवचन में यह रूप बनता है। अतः उस फिष का अथवा प्रातिपदिक के अन्त्य ऐकार को प्रकृत सूत्र से उदात्त होता है। इनमें स्थूलशरीर अन्नमय कोश होता है। इसलिए वायु आँखों के लिए प्रत्यक्ष नहीं होती है। जो याग बारह दिनों से अधिक दिनों में निष्पन्न होता है, उसका क्या नाम है? दर्शनों में वेदान्त का और अद्वैत का स्थान अत्यधिक प्रधान है। बहुत दूर से दुर्गमप्रदेश से सोमलता को लेकर के प्रयास पूर्वक उसकी रक्षा करते थे। इसलिए अन्नमय इस प्रकार से शरीर का नाम भी अनर्थ ही होता है। 9. अभीषुभिः इसका क्या अर्थ है? कुछ मुख्य आख्यानों के उदाहरण दीजिए। (कठ.उ.1.2.9) अर्थात् यह ज्ञान केवल तर्क के द्वारा तथा अपनी बुद्धि के द्वारा अनुमानों से प्राप्त तथा प्राप्त नहीं होता है। जैसे कोई भी साधारण व्यक्ति राजदर्शन के लिए अपने घर को छोड़कर के राजमन्दिर में प्रवेश नहीं करते है, वैसे ही वैसे ही बाह्यविषयों का परित्याग करके अखण्ड वस्तु के ग्रहण के लिए प्रवृत्त चित्त की रागादि संस्कार उद्बोधकारण से स्तब्धीभाव उस ब्रह्मवस्तु के ग्रहण से उस कषाय को इस प्रकार से कहते है। सुपा इसकी और तदन्तविधि सुबं को प्राप्त होती है। इससे उपहित तुरीय ब्रह्म के अभेद से अवभासमान त्वं पद का वाच्यार्थ होता है। यह उपनिषद् शाङखायन आरण्यक का ही अंश है। 10. जन् -धातु से लिट् लकार प्रथमपुरुषबहुवचन में। नित्य प्रलय सुषुप्ति को कहते है। उसके परिहार के लिए उत्तरगर्भ के मन्त्र दिया गया है- श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचं ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः। स्फोटब्रह्मवादी वैयाकरण पुनः कहता है की जगत जन्म का कारण है। कल्प सूत्र दो प्रकार के है - श्रौतसूत्र और स्मार्तसूत्र। जाग्रत तथा स्वप्नस्थ मन चञ्चल होता है तथा सुषुप्ति में निश्चल होता है। सूत्र में सम्बुद्धौ इस पद से यहाँ एकवचनं सम्बुद्धिः' इस सूत्र में स्थित पारिभाषिक पद सम्बुद्धि शब्द का ग्रहण है, और यहाँ सम्बुद्धि शब्द का भी अन्वर्थ है। सूत्र की व्याख्या- छः प्रकार के पाणिनीय सूत्रों में यह विधिसूत्र है। यज्ञ में माषों का विधान निषिद्ध है। एवं आव्ययीभाव समास में शरद आदि प्रातिपदिक से पर समासान्त तद्धित संज्ञको का टच् प्रत्यय होता है। 3. आङपूर्वक हृ-धातु से लिट् प्रथमपुरुषबहुवचन में। 5. मुण्डकोपनिषद् में लिखा है न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। यहाँ अनुदात्तं पदमेकवर्जम् इस सूत्र से विहित अनुदात्त स्वर के निषेध के लिए इस सूत्र में उभौ इस सूत्र से ग्रहण किया गया है। विभृथः - भृधातु से परस्मैपद में लट् -लकार में मध्यमपुरुषद्विवचन में विभृथः रूप बना। और कौन त्रिलिङ्गक है यहाँ पर कोश आदि का प्रमाण है। किसके समान पासों का संघ स्वच्छंद रूप से विचरण करता है? ऋग्वेद की संहिता में तीन छन्दों की प्राचुर्य है। उस व्यक्ति के पुत्र का। जो विष्णु सर्वलोक में प्रकाशित करता है, अद्वितीय वैसा ही विष्णु के तीन पैरों के द्वारा विशेष रूप से इस लोक का निर्माण हुआ। 40. उस प्रतीति जनन से योग्यता का तात्पर्य होता है 41. तात्पर्य निर्णायक लिङ्ग छः हैं 1. उपक्रम तथा उपसंहार, 2. अभ्यास, 3. अपूर्वता, 4. फल, 5. अर्थवाद, 6. उपपत्ति। इस दशा में ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए उससे समाधन नाश नहीं हो। और कौन देखता है। बुद्धि विज्ञान होता है। उदाहरण तृतीयान्त का तृतीयान्तार्थ गुण और वचन के साथ समास में इस सूत्र का उदाहरण है शङकुलाखण्डः। ऋग्वेद के अनेक सूक्तों में श्रृंगार रस का उल्लेख प्राप्त होता है। जब तक वह नहीं हो जाता तब तक स्वयं के द्वारा देखता हुआ भी उसका अनुसरण नहीं करता है। तस्यलोपः सूत्र दोनों का लोप होता है। कृष्णश्रितः यहाँ पर समास में श्रितः उत्तरपद है। उससे उदात्त स्थान में स्वरित के स्थान में जो यण् है, उससे पर अनुदात्त के स्थान में स्वरित होता है यह सूत्र का अर्थ है। अतिवर्धै - अतिपूर्वक वृध् -धातु से लेट् उत्तमपुरुष एकवचन में। कामये - कम् -धातु से लट आत्मनेपद उत्तमपुरुष एकवचन में कामये यह रूप बनता है। वृत्रतरम् - अतिशयेने वृत्रम् इस अर्थ में तरप् करने पर वृत्रतरम् यह रूप बनता है। समास संज्ञा होती है यह उसका अर्थ है। बहुव्रीहो प्रकृत्या पूर्वपदम् इस सूत्र से प्रकृत्या और पूर्वपदम् इन दो पदों की अनुवृति है। वेदों में विहित कर्मों का व्यवस्थित करना क्रम पूर्वक कल्प शास्त्र में कल्पित है। वे दो पदों से होती है। वेदान्तपरिभाषाकारों के द्वारा प्रतिपादित अर्थ का ही विस्तार वेदान्तसार में देखा गया है। देवब्रह्मणोरनुदात्तः इस सूत्र का क्या अर्थ है? और कहा गया है - इन्द्रियानामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलैषु या॥ उच्चैरुदात्तः, नीचैर्नूदात्तः, समाहारः स्वरितः, इन तीनों सूत्रों में पाणिनि ने उन तीनों स्वरों के लक्षण बताए है। मन ही वैवस्वतಾಯ तादर्थे अर्थ में चतुर्थी। "उच्चैरुदात्तः", "नीचैर्नुदात्तः", और "समाहारः स्वरितः" आचार्य गालव द्वारा शिक्षा ग्रन्थ है। त्रिकद्रुक याग में ज्योति, गाय, आयु इन तीनों नामों का ही यज्ञ त्रिकद्रुक कहलाता है। शिवकल्याणकारी धर्मविषय संकल्प जिस प्रकार का हो उसी प्रकार मेरा मन भी हो। अर्थात् जैसे विश्वास जो विश्वासी मनुष्य को विश्वास के अनुसार कार्य करने की प्रेरणा देता है। काम भी कर्म के कारण प्रवृत्त होता है। साधनचतुष्टय में अन्यतम साधन शमादिषट् सम्पत्ति उस सम्पत्ति में दूसरा भाग दम होता है। जैसे ब्रह्म की पारमार्थिकी सत्ता तथा जगत की व्यावहारिक सत्ता है। किस मन्त्र का प्रयोग किस उद्देश्य से होता है, इसकी युक्ति सहित व्यवस्था ब्राह्मण ग्रन्थ में सब जगह उपलब्ध होती है। वो ही यज्ञ का पुरोहित है। नियम यह होना चाहिए की संयोग सविद द्रव्य ही द्रव्यान्तर का आरम्भक होता है। दर्शन आस्तिक नास्तिक के रूप में दो प्रकार से माने जाते हैं। 'प्राक्कडारात्समासः'', सह सुपा, तत्पुरुषः ये तीनों अधिकृत सूत्र हैं। इस प्रकार गाः पति इस विग्रह में गोपा शब्द निष्पन्न होता है। यह ही विषय सङ्ग दोष होता है। मोक्ष परम पुरुषार्थ की प्राप्ति के लिए अद्वैतवेदान्त प्रपञ्च का निर्माण किया गया है। और तस्यलोपः इस सूत्र से उसका लोप होता है। न प्रातिलोम्यं अप्रातिलोम्यं तस्मिन् अप्रातिलोम्ये यहाँ नञ्तत्पुरुष समास है। वहाँ पर बुद्धिवृत्ति का घट रूप अज्ञान का नाश होता है। उसका और भी सरलता से प्रस्तुति कर दी जा रही है। उससे यहाँ पदों का अन्वय इस प्रकार है - दीर्घात् अष्टनः असर्वनामस्थानविशिष्टा विभक्ति उदात्तः इति। विष्णुसूक्त में भी विष्णुदेव की स्तुति की गई है। परन्तु सूत्र के वैकल्पिक होने से दूसरे पक्ष में एकादेश उदात्तनोदात्तः' इस सूत्र से उदात्त स्वर का विधान है। जीवनकाल के विस्तार के लिए किसका विशेष विधान है? और यहाँ यास्क का और कात्यायन के मतों का समन्वय प्रदर्शित किया जा रहा है। अक्षस्य धू: इस विग्रह में प्रक्रिया कार्य में अक्षधुर होने पर अनक्षे इससे अप्रत्यय नहीं होता है। 36. तत्पुरुष समास का लक्षण क्या है? 2 पाराशर्य व्यास का भी यहाँ उल्लेख प्राप्त होता है (१/९/२)। सावेकाचस तृतीयादिर्विभक्तिः ( ६.१.१८६ ) सूत्र का अर्थ- सु वि के परे एक अच् शब्द, उससे परे तृतीया विभक्ति से आरम्भ करके परे विभक्ति को उदात्त होता है। यह ब्राह्मणों का प्रिय है, अतः उसके वक्षस्थल में ब्राह्मणों के पादघात के लक्षण है। उससे दार्शनिक तत्त्वों की सरल शैली में बोध्य होता है इस प्रकार की कामना करता है। विवेक चूडामणी में कहा गया है। अपिहितम् इसका क्या अर्थ है? याज्ञिक विषयों में कुछ विरोध प्रतीत होता है, वहाँ शुद्धकरित ब्राह्मण का उद्देश्य है। मेरूदण्ड के निम्नदेश में जनन शक्ति आधारभूत मूलाधार चक्र में विद्यमान है। फिर भी शरीरभेद के द्वारा समष्टि कारण शरीर अभिप्राय से यह भेद कहते है समष्टि कारण शरीरज्ञान के द्वारा चैतन्यसर्वज्ञ ईश्वर ही होता है। वैसे ही यौवन काल में जितनी शक्ति होती है उतनी शक्ति वृद्धावस्था में भी नहीं होती है। मन के बाह्येन्द्रियों के निग्रह से ही तत्त्वज्ञान का मार्ग उन्मुक्त नहीं होता है। विभक्ति पद अधिकरण कारक का बोध कराता है। व्याख्या - चार त्रिष्टुभ् । वृत्र को मारकर इन्द्र ने बन्द जलमार्ग को खोल दिया। और कहते है अरण्य में अध्ययन के कारण ही इनको आरण्यक कहते है। पदपाठ - सुषारथिः। अनुदात्तम् यह प्रथमान्त की अनुवृति है। उसके विधायक अनेक सूत्र हैं। नगरखण्ड ने भी इसको आदि वेद कहा है। इस याग का देवता प्रजापति, इन्द्र, अग्नि हैं। दृष्ट्वाय - दृश् -धातु से क्त्वाय (वैदिक) लोक में दृष्ट्वा। अथवा स्थूलत्व को बनाकर के सौन्दर्य आदि धर्म आत्मा को ही समझते है। मूर्धन् - मूर्ध्न् - इसका सप्तमी एकवचन में यह वैदिक रूप है। उस मार्ग से ही नदियाँ प्रवाहित होती हैं। उससे कस्य शब्द का लिङ्ग क्या है इसके ज्ञान के लिए अमरकोश ग्रन्थों में और लिङ्ग अनुशासन में पढ़ना चाहिए। श्रवण से तात्पर्य है सभी उपनिषद् ब्रह्म में ही होते हैं। प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द तथा आगम प्रमाण के द्वारा। स्वप्नस्थ अवस्था में यह तैजस होता है। अनुदात्तस्य च यत्र उदात्तलोपः ये सूत्र में आये पदच्छेद है। आजकल अथर्ववेद की कितनी शाखा प्राप्त होती है? उन दोनों में (उप और राम) इस पद को छोड़कर अर्थ के लिए दूसरे पास इस पद को प्रयुक्त करके विग्रह होता है। उनमें से एक पक्षी स्वादिष्ट फल को खाता है और दूसरा बिना खाए ही रहता है। वह मेरा मन मङ्गलमय हो। नित्य समास के प्राय लौकिक विग्रह नहीं होता है। व्याख्या - जुआरी अपनी छाती को उडाते हुए उछल-उछल कर बाधा पर आता है और कहता है की यहाँ पर कौन धनवान है उसको मैं नैना जीतूँगा, ऐसा सुनते हुए वह चौकी पर उछल-उछल करता है। चतुर्थ्यन्तस्य यूप इसका जो अर्थ है उसको उस शब्द से कहते है। और भी सात अधोलोक क्रमशः अतल, तितल, सुतल, रसतल, तलातल, महातल, और पाताल है। 14. ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा होने पर योगी को क्या लाभ प्राप्त होता है? इस प्रकार के अवयवों से युक्त यह स्थूल शरीर होता है। 9 अच्छी प्रकार से ग्रहण करते हैं। वहाँ पर अजहत् लक्षणा है। यस्य व्रत औषधिर्विश्वरूपः स नः पर्जन्य महि शर्म॑ यच्छ॥ यज्ञीय आपात को दूर करने वाला यह अर्थ है। मनोमयकोश का विकृति आ रही है। इस सूत्र से वौषट् -शब्द को विकल्प से उदात्त और एकश्रुति का विधान है। उससे उस समुदाय को अभ्यस्त संज्ञा प्राप्त होती है। आत्मा तो हमेशा एक होती है फिर भी उपाधि भेद से अनेकजीवस्वरूप के द्वारा जानी जाती है। वह चित्तवृत्ति जीव के स्वरूपविषयक अज्ञान का नाश करती है। इसका उदाहरण है कर्षः, और दायः। इन आख्यानों के द्वारा पाठकों के हृदय में उद्ठिग्न मन का शान्तायक शीतल निवास करता है। ऐतरेय आरण्यक किस भेद के अन्तर्गत आता है? दधि और घृत भोग्य पदार्थ में किया है। इसलिए ब्राह्मणनामधेयस्य यह पद कहा गया है। यह सूत्र सर्वस्य द्वे इस अधिकार में है। जैसे - छान्दोग्योपनिषद् के छठे अध्याय में तत्त्वमसि इस वाक्य को नौ बार पढ़ा गया है। इस सूत्र में कर्षात्वतो घञोऽन्त उदात्तः' इस सूत्र से उदात्तः इस प्रथमान्त पद की अनुवृति आती है। यहाँ विधीयमान उदात्त धर्म तीसरी आदि विभक्ति के परे स्वरों का होता है। इन्द्र का शतक्रतु इसका नामकरण कैसे हुआ? जैस दीपक अन्धकार का विनाशक होता है उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान भी अज्ञान का विनाशक होता है। प्रत्यक्ष तथा अनुमान से ही उनका ज्ञान होता है। इसीलिए कवि कहते है की - हे प्रकाशमान उषा! इससे अन्य अध्यायों में आरण्यक के मुख्य विषयों का प्रतिपादन होता है। वेद में अनेक देवों के नाम मिलते हैं। इस पाठ में हम दो सूक्तों की आलोचना करेंगे। अव्ययीभावसमास का पाठ में यह समास विधायक पाँच सूत्रों को सन्निविष्ट किया गया है। तीसरे अध्याय से छठे अध्याय तक कौषीतकि- उपनिषद् कहलाता है, तथा सातवां, आठवा अध्याय संहितोपनिषद् कहलाता है। इसलिए यह वृत्ति होती है। अतः जातेष्ट्याग का विधायक वाक्य है - वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत् पुत्रे जाते इति। परन्तु स्वर विधान विषय में ही यह पराङ्गवत् भाव होता है अन्य विषयों में नहीं होता है। इस पाठ को पढ़कर आप सक्षम होंगे- मन्त्रों के स्वर विधान विषय को जान पाने में; स्वर विधायक सूत्रों को समझ पाने में; सूत्रों का अर्थ और उदाहरण बताने में; उदाहरणों में सूत्र अर्थ का समन्वय किस प्रकार का होता है जान पाने में। और अन्नन्त बहुव्रीहि संज्ञक बहुयज्वन् प्रातिपदिक से स्त्रीत्व द्योतन के लिए डाबुभ्यामन्यतरस्याम् सूत्र से विकल्प से डाप् प्रत्यय होता है। सूत्र अर्थ का समन्वय- आभ्युद्धरति यहाँ हरति यह तिङन्त, अभि यह गतिसंज्ञक उद् यह भी गतिसंज्ञक है। चैतन्य के सम्बद्ध अधिष्ठान को ही सत्ता में लिङ्ग कहा जाता है। विग्रह के दो भेद होते हैं। उसी प्रकार से संसारतापत्रयदन्दह्यमान भी अपने स्वरूप की जिज्ञासा जगत्निवर्तक से सुनने वाले को ब्रह्मनिष्ठ को कर्तालाल के समान अपने प्रकाशात्मस्वरूप के साथ गुरु के पास जाता है। उसी प्रकार से बुद्धि के स्थैर्य सम्पादन के द्वारा भी कुछ कल्पना करके उसे लक्ष्य में परिकल्पित करके नेहेद्ध करना चाहिए। प्रथम आहुति में अग्नि के विषय में पुरोडाश दिया जाता है। इसके बाद नञ् तत्पुरुष समास का वर्णन इस पाठ में आता है। विधि शब्द का क्या अर्थ होता है वहाँ यज्ञ का तथा उसके अङ्ग उपाङगों के अनुष्ठान का उपदेश है। अगच्छत् - गम् -धातु से लड प्रथमपुरुष एकवचन का रूप है। यहाँ कुत्सितानि यह प्रथमाबहुवचनान्त कुत्सनैः तृतीया बहुवचनान्त पद है। उससे इस सूत्र का अर्थ होता है - जित् और नित् परे रहते तदन्त शब्दों का आदि नित्य उदात्त होता है। कारण सामग्री के अभाव से आकाश की उत्पत्ति नहीं होती है। एवं - यो जात एव प्रथम मनस्वन् देवो देवान् क्रतुना पर्यभूषत् । और इसके बाद भवत् शब्द उगिदन्त है। कर्ता में और करण में विद्यमान तृतीयान्त सुबन्त को कृदन्त के साथ बहुल और तत्पुरुष समास हुआ। शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान ये सभी नियमों के तात्पर्य है। महावीर गुण से महात्म्य से युक्त शौर्य से युक्त अनेक शत्रुओं को हरने में समर्थ, उत्तम गुण से युक्त और ऐश्वर्य से युक्त धर्मात्मा युक्त भक्त है। प्रत्येक अध्याय में अनुवाक हैं। तुम अमृतत्व को प्राप्त हो। अज्ञान के द्वारा ही ज्ञान आवृत्त होता है। इसलिए उनमें गुण दोष नहीं होते हैं। इस मैथुन के आठ अङ्ग होते हैं। इन सूक्तों में कुछ प्रसिद्ध और अत्यधिक चर्चित हैं। इसके बाद प्रस्तुत सूत्र से भ संज्ञक उप राजन् शब्द के टि का अन् का लोप होने पर उपराज अ होने पर सर्व संयोग होने पर निष्पन्न उपराजशब्द से सु, सौरमि, प्रक्रिया कार्य में उपराजम् रूप निष्पन्न होता है। उभयादतः इस शब्द से क्या तात्पर्य है? अच्छी प्रकार से और सरलता से अध्ययन के लिए यहाँ वर्ग भेद किया है। तब आत्मा आत्मा को देखता है। विशेष- यह सूत्र पूर्वक आद्युदात्तश्च इस सूत्र का अपवाद है। इस सूक्त में दान और महिमा का सुंदर वर्णन है। ब्रह्मचर्य से तात्पर्य है गुप्तेन्द्रिय उपस्थ का संयम। महर्षि पतञ्जलि के मत में अथर्ववेद की कितनी शाखा हैं? सारथि जैसे हाथों से घोड़ो को इधर उधर करता है और नियंत्रित करता है उसी प्रकार मन भी मनुष्यों को इधर उधर करता है और नियंत्रित करता है। किन्तु स्त्रीत्व बोध के लिए कुछ प्रत्ययों की कल्पना की है। यहाँ पर अधिक धन देने वाले इन्द्र ने शास्त्ररूप सूर्य किरणों से मेघ को मारा। और उससे हमारी समृद्धि होती है। यहाँ कर्मधारय समास में पूर्वपद का और उत्तरपद के इस वार्तिक से लोप होता है। अन्य प्रकार से नहीं होता है। 12. वेदान्त के प्रयोजन को बताइए? यह किस प्रकार का ज्ञान ग्रहण करता है। उनमें ङीप् प्रत्यय भी एक है। द्यूतक्रीडा उसी शक्ति के वश में होती है। उसके बाद उसकी विदेह मुक्ति हो जाती है। यह ही सूर्योदयकाल को कहते है। निश्चित रूप से जो वैद्य रोग को जानता है, औषधि को जानता है और औषधि का प्रयोग जानता है। इस प्रकार जो मनुष्य मेरी स्तुति करता है उस पुरुष की इच्छाओं को पूर्ण करते हुए उसकी में रक्षा करता हूँ, उसकी मैं शक्तिशाली बना देती हूँ। उससे भोज्योष्ण इस समस्त पद का भोज्य शब्द स्वरित ही रहता है। वैसे ही यदि पूर्व संस्कार से माला चन्दन भारा, पुत्र, घर, पशुक्षेत्र में होने वाले मन में जो अन्तःकरण की निवृत्ति विशेष से निग्रह किया गया उस प्रकार से वृत्ति विशेष शम कहलाता है। सरलार्थ - यहाँ पर इन्द्र से कहते है की हे इन्द्र वृत्र का कोई भी सहायक मैंने नहीं देखा जिससे तेरा हृदय वृत्र को मारने से भयभीत हो गया। वेदों ने प्रतिवेद को पुनः मन्त्र और ब्राह्मण दो प्रकार विभाग किया। उससे इस सूत्र का अर्थ होता है - भी- हरि- भृ- हु- मद- जन- धन- दरिद्रा और जाग्र' इन धातुओं के अभ्यस्त संज्ञको को पित लसार्वधातुक के परे रहते प्रत्ययों के पूर्व को उदात्त होता है। 25. निर्वकल्पक समाधि में चित्त की वृत्तियाँ रुकती हैं अथवा नहीं रुकते हैं? सूत्र का अवतरण- इस सूत्र की रचना आचार्य के द्वारा अभि शब्द को छोड़कर उपसर्ग के आदि स्वर को उदात्त विधान के लिए की गई है। इस प्रकार का मुख्य ऐक्य ही वेदान्त सिद्धान्त होता है। प्रतिमानम् - प्रतिपूर्वक मा धातु से ल्युट्प्रत्यय करने पर प्रतिमानम् यह रूप बनता है। परार्थाभिधानं वृत्तिः यह वृत्ति लक्षण है। और भी कुछ मन्त्र इस प्रकार से है उच्चतर दार्शनिक मत को अच्छी प्रकार से प्रकट करते हुए देखना चाहिए। उन सभी वचनों का जीवन्मुक्ति में प्रमाण है एषा ब्राह्मी स्थिति पार्थ नैनान् प्राप्य विमुच्यते। कर्म इस प्रकार बलपूर्वक जन्म कराता है तथा मृत्यु भी कराता है। और भयभीत निन्यानवे (९९) नदियों को और अन्तरिक्ष के श्येन पक्षी के समान जल में डूब गया। और भी तत्तेजोऽसृजतज'' इस क्रम का वाचक एक शब्द है, अर्थात् ಕ್ರಮो गम्यते, और वायुराग्निः (तै. उ. 2.1.1) इससे प्रसिद्ध एक श्रुति का क्रम से निराकरण किया गया है। समास के भेद विषय में बहुत सी विप्रतिपत्तियाँ हैं। सायणाचार्य के अनुसार से गम् -धातु लोट् प्रथमपुरुष एकवचन में यह वैदिक रूप है। ( ८.२.५ ) सूत्र का अर्थ- उदात्त के साथ एकादेश उदात्त होता है। जिन मन्त्रों में पाद व्यवस्था नहीं है वह निगद कहलाता है। ऋग्वेद और यजुर्वेद के दो महावाक्य लिखिए। समासान्त अप्रत्यय। तब उसी मुख से खग-मृग-आधा-मेश-घोड़-नीलगाय-अर्धव-धेने उत्पन्न हुए। अविवेकी बालक के द्वारा अज्ञान काल में यह देखा जाता है की में बड़ी हूँ, मैं छोटी हूँ, इस प्रकार के देह सङ्गात में अहं प्रत्यय होता है। सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म इस प्रकार से यह ज्ञान शब्द उसके प्रकाश का ही अर्थ है। मित्रावरुण के निवास स्थान में लगभग दस हजार किरने एक साथ जुड़ती हैं। वृत्ति जड होती है। प्रायोगिक- नहीं। निघण्टु के पञ्चमाध्याय काण्ड कौन सा है? सूत्र का अर्थ- निपात आद्युदात्त हो। अपानो हि अवगमन्वान पैवादीस्थानावर्ती। लोपे विभाषा इस सूत्र का अर्थ लिखिए। सरलार्थ - कर्मनिष्ठ मेधावी पुरुष जिस मन से यज्ञ में और यज्ञ की विधि विधान आदि में कार्य करते हैं और जो प्राणियों के अन्तर्भाग में स्थित होकर पूज्य है। चौथे, पांचवें और छठे अध्याय में ऐतरेय उपनिषद् है। इस समास को तत्पुरुषसमास समानाधिकरण और व्यधिकरण दो विधियों में विभक्त कहा जा सकता है। इस कारण से वे अनुदित होम कहलाते हैं। वहाँ गोष्ठजशब्द का और ब्राह्मणनामधेय के पदच्छेद दो हैं। तद्धितेष्वचामादेः इस सूत्र का क्या अर्थ है? अन्य अनुष्टुप् ८९८, पङिक्ते ४९८, उष्णिक ६९८, बृहती ३७१ है। इसकी प्रक्रिया का संक्षिप्त विवरण १९वें अध्याय के महीधर भाष्य के आरम्भ में उपलब्ध होता है। वेदों का ज्ञान सम्पूर्ण वेदों के ज्ञान के लिए अत्यन्त आवश्यक है। 1 त्रयी लक्षण कौन-कौन से हैं? जिस मन से यह सब ज्ञात होता है, और जिस मन से अतीतकालिकसम्बन्धी वस्तु, वर्तमानसम्बन्धी वस्तु तथा भविष्यत्कालिकसम्बन्धी वस्तु का ज्ञान होता है, जिस मन से होतृमैत्रावरुण आदि सात होतृओं से युक्त अग्निष्टोम यज्ञ को विस्तृत करता है वह मेरा मन शुभसङ्कल्प से युक्त हो। प्रज्ञा सुषुप्ति कारण शरीराभिमानी होती है। बाह्य अग्निहोत्र से इसको तृप्ति होती है। इसलिए नहीं लक्षणा स्वीकृत की गई है। वहाँ उदात्त संज्ञा विधायक पाणिनीय सूत्र ही उच्चौरुदात्तः है। इस वेद में वर्णित विषयों का विभाजन तीन प्रकार कर सकते है -१ आध्यात्मिक, २ आधिभौतिक, ३ और आधिदैविक। ऋग्वेद का कल्पसूत्र क्या है? बन्ध का कारण भी नहीं है। इस विषय में पुराण, स्मृत्ति आदि ग्रन्थों में बहुत प्रमाण उपलब्ध होते हैं। वेद वर्णित किसी भी पार्थिव वस्तु की अथवा पार्थिव प्रकृतिक पदार्थ की प्रकृतिभूत है। 1 ब्रह्म सम्प्रदाय और 2 आदित्य सम्प्रदाय इस प्रकार से दो सम्प्रदाय होते हैं। तदनन्तर ही ब्रह्म जिज्ञासु होता है। मेरे फल के लिए यह कर्म करती हूँ फल में ठीक कहा हुआ कर्मो से जन्मरूप संसार को प्राप्ति होती है। बाल्ययौवन में मन उस स्थिति होने से मन अमर होता हुआ वृद्धावस्था से मुक्त हो जाता है। इन दोनों के विवेचना विषयों में अभेद है। यह सूत्र द्विपदात्मक है। उपासते - उप पूर्वक आस् -धातु से लट्लकार प्रथमपुरुषबहुवचनान्त का रूप है। मृत्यु तथा मुक्ति का कारण वह ही है। समान अधिकरण में ये दोनों होने पर समानाधिकरण अर्श आदि होने से अच् प्रत्यय होता है। 11. परिदिदेश यह किस लकार में होता है? अतः प्र य षः यह सिद्ध होता है। किसको? जीवन्मुक्ति तथा विदेहमुक्ति दोनों अवस्थाओं में मुक्ति की दृष्टि से भेद नहीं होता है। सूत्र अर्थ का समन्वय- यहाँ पटु शब्द प्रकार आदि गण में पढ़ा हुआ है। क्योंकि इन अलङ्कारों से अनेक सूक्ष्म अर्थ निकलते हैं। कात् यह पञ्चम्यन्त पद है। 13. प्राण प्राग्मनवान् वायुः नासाग्रवर्ती है। यहाँ वस् यह आदेश ` अनुदात्तं सर्वमापादादौ' इस अधिकार में है, उससे अकार अनुदात्त होता है। च यह अव्यय पद है। तीन आहुति किसको दी जाती है? अभि शब्द में प्राप्त उदात्त स्वर का निषेध उपसर्गाश्चाधिवर्जम्'इस सूत्र से होता है। ब्राह्मण में शब्दों के निर्वचन का मार्मिक और वैज्ञानिक निर्देश निरुक्त में कहा है। व्याख्या - प्राचीन काल में त्रिपुर राक्षसों को जीतने के लिए रुद्र का षष्ठी अर्थ में चतुर्थी हुई। वेद के द्वारा बताये गये उपाय प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण से अज्ञायमान है। 3. तायते इसका क्या अर्थ है? दूसरे प्रस्तर खण्ड में सोमरस के लेपन से रस को हटाया जाता है। अन्य पदार्थ प्रधान है जहाँ यह अन्य पदार्थ प्रधान है। मनु ने भी कहा है। इस प्रकार पञ्चम मन्त्र में कहा गया है कि जिसमे ऋग्वेद सामवेद यजुर्वेद और अथर्ववेद है। लौकिक में तो इत्ते रूप सिद्ध होता है। और निराकार ब्रह्म का आकार धारण करने में अयुक्त हो जाता है। सूत्र व्याख्या-यह विधिसूत्र है। इसलिए वह निर्मल ही होता है। आत्म अनात्म का विवेक यह तात्पर्य होता है। यहाँ तीन पदों के अन्तर्गत यह सूत्र है, न' यह अव्ययपद है, उदात्तद्वरितोदयम् यह प्रथमा एकवचनान्त पद है, और अगार्ग्यकाश्यपगालवानाम् यह षष्ठी बहुवचनान्त पद है। वह मन सामान्य विशेष ज्ञान का बोध कराता है, वह ही सिद्ध होता है। सन्धि स्वर वर्ण आदि का। यहाँ पर एक यज्ञ है, गवामयन-नामक यज्ञ ऐसा इसका नाम है। इसी प्रकार दोनों प्रकार के विचार से आहुति प्रदान करनी चाहिए। वृत्यर्थ का अवबोधक जो वाक्य है वही विग्रह है। लसार्वधातुकम् इसका लकार के स्थान में यह अर्थ है। इनमे एक धारा है अथर्व धारा और दूसरी अङ्गिरो धारा है। नखनिर्भिन्नः यहाँ पर पूर्वपद को प्रकृति स्वर तृतीया कर्मणि इस सूत्र से होता है। 2. अच्छा वद तवसं... इत्यादिमन्त्र की व्याख्या करो। वेदत्रयी जहाँ अलौकिक फल देने वाले हैं, वहा अथर्ववेद का लौकिक फल देने वाला है। उस समय इस इन्द्र ने इस माता को वृत्र के ऊपर मारने की इच्छा से नीचे प्रहार किया। जैसे कोई सारथि अपने रथ के वेग से भरे घोड़ो को इधर उधर ले जाता है और जैसे उन्हें संयम में रखता है, वैसे ही जो मन मनुष्यों को सभी कार्यो में प्रवृत करता है, और उनको उसी कार्य में डालता है, और जो मन हृद्देशवासी है, और जो जारा रहित है, और जो उत्पन्न हुए लड़कों में, युवकों में और वृद्धों में एक समान हो वह मेरा मन सङ्कल्प से युक्त हो। उनकी पत्नियो की अवस्था किस प्रकार होती है। अव्ययीभाव समास संज्ञक शब्द नपुंसक होता है। मैं मित्र और वरुण दोनों को धारण करती हूँ। अन्नमभट्ट के तर्क सङ्ग्रह में कहा गया है - सुखाद्युपलब्धिसाधनमंद्रिय मनः' इस प्रकार से और श्री मद्भगवद्गीता में भी कहा गया है ममैवांसो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। अव्ययीभाव से विभक्ति विपरिणाम से अव्ययीभाव होता है। विवास यह पद कैसे बना? वे हैं- श्रवणं कीर्तनं विष्णुः स्मरणम् पादसेवनम् । पुंवत्कर्मधारयजातीयदेशीयेषु इस सूत्र का एक उदाहरण दीजिये? बहुव्रीहौ प्रकृत्या पूर्वपदम् इस सूत्र से प्रकृत्या और पूर्वपदम् इन दो पदों की यहाँ अनुवृति आती है। कनिष्ठ आह चमसा यह प्रयोग भी वेद में प्राप्त होता है। तीसरी आहुति में अग्नि और सोम के लिये पुरोडाश अर्पण किया जाता है। तिङ यह प्रत्यय है। पौरोडाश, याजमान, वाजपेय, राजसूय आदि यागों का यहाँ विस्तार से वर्णन है। जैसे- घटाकाशः, कारकाकाशः, गृहकाशः, इस प्रकार के आकाश का जातीय भेद जैसे गौण होता है उसी प्रकार से श्रुति में आकाश की उत्पत्ति गौण ही देखना चाहिए। पतञ्जलि के योगसूत्र यहाँ मुख्य है। आमन्त्रित का आदि स्वर उदात्त होता है। परमवाचा रूप को सिद्ध कीजिये । वहाँ नपुसंक लिङ्गों की गणना होती है। दूसरी जगह भी कहा गया है - होतुश्चित्त पूर्वं हविद्यमाशते' यहाँ पत्थर के टुकड़े होतृ से पहले हवि खाते है, ऐसा जाना जाता है। और उसके विभक्ति विपरिणाम से व्याघ्रादिभिः का विशेषण से समानाधिकरणै: होता है। वहाँ पर एक छोटा ही सोता हुआ सर्प कुण्डल आकार में होता है, ऐसा योगियों ने कल्पना की है। दोषयुक्त चक्षु आदि कारणों से मैं अन्ध हूँ तथा निर्दोष चक्षु हूँ इस प्रकार से यह प्रत्यक्ष होता है। सभी वेदान्त शास्त्रों के सूक्ष्म निर्विशेष निरवय,नारञ्जन सभी का अनुवर्तन सत्य ब्रह्मवस्तु ही यहाँ पर सत्य है। तब वहाँ प्रतिककाल में भी बहुत से धर्म सम्प्रदायों की दर्शन सम्प्रदायों की उत्पत्ति हुई। और उससे चतुर्थयन्त वाच्य को वो तद्वाची और अर्थादि सुबन्तों से और सुबन्तों से विकल्प से तत्पुरुष समास संज्ञा होती है यही अर्थ प्राप्त होता है। अगर महर्षि जैमिनि ने वेदविरोधी कथन का प्रतिपादन किया और वे कैसे वेदविरोधी है ऐसा कहा। सामान्य लोग कहते हैं कि सामान्य वचन। चर्मणः समीपम् इति यह लौकिक विग्रह है, चर्मन् ङस् उप यह अलौकिक विग्रह है अव्यय विभक्ति इत्यादि सूत्र से अव्ययीभाव समास होने पर उपचर्मन् शब्द निष्पन्न होता है। यह सब प्रज्ञा नेत्र है, क्योंकि प्रज्ञा ही सभी को लेकर जाती है। ऋगादि तीनों वेद दूसरे लोक में फल देने वाले हैं। क्योंकि वह देह मांस में लिप्त होती हुई परिषद् से पूर्ण होती है। और इसके बाद ह्रस्व अकारान्त से खट्व प्रातिपदिक से स्त्रीयोतक के लिए अजाद्यतष्टाप् इस सूत्र से टाप् प्रत्यय होता है। काम्यकर्मों का त्याग किस प्रकार से करना चाहिए। अथर्ववेद का `क्षत्रवेद' इस नामकरण का कारण है। महाजलपात्र से भूमि पर जल वर्षा करो और नदियाँ बन्धारहित होकर आगे प्रवाहित हो, गायो के लिए पर्याप्त जल हो। 30. प्राणायाम प्रतिष्ठा होने पर ज्ञान के आवरण का क्लेश कर्म धर्म आदि का क्षय हो जाता है। चित्त की शुद्धि के बाद उपासना करनी चाहिए। रथोऽपि गर्त उच्येते' (नि. ३/५) इति यास्काचार्य ने कहा। इस कारण से मोक्ष तथा बन्ध परस्पर आश्रित है। दुर्गाचार्य के अनुसार निरुक्त में चौदह संख्या थी। जो सब कुछ दिखाई देता है वो सब भी पुरुष ही है और वो भी भूत, भविष्य और अतीत काल का ही है। इस अवस्था में पहले अभि शब्द के उदात्त इकार के स्थान में यण् किया गया है। उससे यहाँ प्रातिपदिक ह्रस्व अकारान्त है। अतः क्व यहाँ पर प्रकृत सूत्र से अकार को स्वरित स्वर होता है। विशेष्य का स्वरूप विषयक संस्कार सहयोग पदों के श्रवण से विशेष्यस्वरूप की उपस्थिति होती है। समानाधिकरणेन इस पद का द्वितीय अध्याय के प्रथमपाद समाप्ति तक अधिकार है। इस सूत्र से अनुदात्त स्वर का निषेध होता है। वस्तुतः ईश्वर के अनन्त रूप है। कौन-कौन से गतिसंज्ञक कहलाते हैं? कश्यप देखने वाला होता है। इन लघु आख्यानों में कुछ स्थलो में अत्यधिक गम्भीर तत्त्वों के तथ्य के सङ्केत प्राप्त होते है, जो ब्राह्मण का कर्मकाण्ड वर्णन से बिल्कुल भिन्न है, और गूढ़ - गम्भीर अर्थ का प्रतिपादन होता है। इस प्रकार से यहाँ अधिकारी इस पद से वेदार्थज्ञ लोग कहते है। छः मन्त्र वाले इस सूक्त का ऋषि याज्ञवल्क्य, मन देवता, त्रिष्टुप् छन्द है। उनकी विशिष्ट प्रमाण में मान्यता होनी चाहिए। चित्त का मल पाप होता है। यह ज्योतिष काल के विषय में शास्त्रों में कहा गया है। होता - बुलाने वाला। यज्ञकाल में देवों की स्तुति के लिये लिखे हुए मन्त्रों का उच्चारण करके देवों को बुलाने वाले, उस कार्य के लिए सङ्कलित मन्त्र कौ स्तुति रूप से वर्णन है, जिसका संग्रह ऋग्वेद है। यकार से उत्तर अकार का और शप् के अकार का ` अतो गुणे' इससे पररूप एकादेश होता है, उसका एकादेश उदात्तेनोदात्तः' इससे उदात्त स्वर होता है। यह मन्त्र ऋग्वेद की सृष्टि सूक्त से (१०-१२९) उद्धृत है। इसके बाद नञः नलोपविधायक सूत्र न लोपो नञः सूत्र की व्याख्या की गई है। (वि.चू.) सभी दुःखों को तथा सभी प्रकार के दुःखों को बिना चिन्ता के तथा विलाप के त्याग करके अप्रतीकार पूर्वक अप्रतीकार के रूप में सहन करना ही तितिक्षा कहलाती है। यज्ञ को आवश्यकता को अनुभव करके महामुनि व्यास ने अपने चार शिष्यों को वेदों की शिक्षा दी। मल निवृत्ति के लिए निष्कामकर्म तथा भूतयादि मल को हटाना चाहिए। राणायणीय शाखा विषय पर टिप्पणी लिखिए। वेद ज्ञान का सागर है। उसको भिन्न प्रकार से प्रकट किया जा सकता है। अव्ययीभावात् इस विशेषण से झयः तदन्त विधि में झयन्तात् होता है। शेषो बहुव्रीहिः इस सूत्र से पूर्व सूत्र तक। यद्यपि इस जल स्पर्श का कारण क्या है यह प्रश् न उत्पन्न होता है फिर भी जल पवित्र है इस प्रकार से कहा जाता है। राज्ञः पुरुषः यह वाक्य है। कामक्रोधादि प्रमाण के द्वारा शुद्धता का अनुमान किया जाता है। इसका अर्थ ही अनादिकाल से ही सूर्य की आदिप्रकाश के समान सभी को आनन्द प्रदान करता है, उसके गुणों की पूजा से सन्तोष को प्राप्त करता है। उनके मत में तो एक एक योग ही मोक्ष के लिए पर्याप्त होता है। नेत्र अर्थ में होता है। उदाहरण - आहो उताहो वा भुङक्ते यह इस सूत्र का एक उदाहरण है। (क) विवेक (ख) फल (ग) अपूर्वता (घ) उपपत्ति 13. तात्पर्यनिर्णायक छ: लिङ्गो में यह अन्यतम नहीं है। जैसे ये' इस पद का या २.३ वि'' इस प्रकार उच्चारण किया है। असम्प्रति अर्थ में अव्ययीभाव समास का उदाहरण है अतिनिद्रम् । धर्म का साधन ही अर्थ कहलाता है। भगवद्गीता के दूसरे प्रस्थान का क्या प्रमाण है? इस पाठ को पढ़कर आप सक्षम होंगे- धातु से विहित स्वरों के विषय में जान पाने में। प्रातिपदिक से विहित स्वरों के विषय में जान पाने में। उदात्त स्वर विषय में जान पाने में। स्वर प्रक्रिया में जान पाने में। स्वर विषय में पटुआ बन पाने में। सूत्रों के अर्थ निर्णय में समर्थ हो पाने में। सूत्र की व्याख्या में समर्थ हो पाने में। अनुवृत्तियों के द्वारा सूत्र अर्थ निर्णय कर पाने में। एवं यस्य राज्ञो जनपदे अथर्व शान्ति पारगाः। इन प्रपाठकों में काव्य, इष्टि, राजसूय, अग्गीचन आदि का वर्णन है। आहुः - ब्रू-धातु से लिट् प्रथमपुरुषबहुवचन में। यज्ञ अनुष्ठान और दार्शनिक विचारों से कौन सा ग्रन्थ मुख्य विषय है? पश्चात्देवादि जीव के बाद पृथिवी बनाई। प्रथम अष्टक सम्पूर्ण अध्यायों से युक्त है, द्वितीय अष्टक और नौवें अध्याय से आरम्भ करके चौबीसवें अध्याय तक है। उदाहरण - इसका उदाहरण है -बिभ्रेती जराम् । अहं राष्टी संगर्मी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञिरियानाम् । यजुर्वेद और सामवेद संहिता साहित्य है इस पाठ में यजुर्वेद की संहिता साहित्य विषय पर और सामवेद की संहिता साहित्य विषय पर आलोचना करेगें। इस सूत्र से तत्पुरुष समास होता है। कुछ स्वप्न में स्वयं को राजा मानते हैं। कवि ने कहाँ श्रद्धा को प्रकट किया? जिस अवस्था में स्थिरता के साथ लम्बे समय तक रुकना होता है वह आसन कहलाता है। उसकी निवृत्ति विविध उपायों के द्वारा होती है। आतिथ्येष्टि का अनन्तर प्रवर्ग्य नाम का अनुष्ठान, उसके बाद उपदिष्ट का अनुष्ठान किया जाता है। प्राचीन आचार्यो के मध्य में ऋक् मन्त्रों की गणना प्रसङ्ग में जो विरोध दिखाई देता है वह शाखा भेद से ही दिखाई देता है। यतोऽनावः इस सूत्र में अनावः यहाँ कौन सी विभक्ति है? सोम के लिए मौज पर्वत जैसे। यहाँ पदों का अन्वय इस प्रकार है - अनुमः शतुः अन्तोदात्तात् परा नदी अजादिः असर्वनामस्थाना विभक्तिः उदात्ता इति। ङ्याप्प्रातिपदिकात् सूत्र से प्रातिपदिक (5/9) की अनुवृत्ति आती है। यह ही भारतीय नाटकों की मूल प्रवृत्ति है। कृण्वन्ति - कृ-धातु से लट् प्रथमपुरुष एकवचन में रूप, कुर्वन्ति इसका वैदिक प्रयोग होता है। निरन्तर भ्रमण करना। वहाँ गुप् -धातु से गुपूधूपविच्छिपणिपनिभ्य आयः'' इस सूत्र से आय प्रत्यय करने पर गोपाय इसका ओकार उकार का विकृत होने पर उदात्तत्व होता है। काम्य, निषिद्ध, नित्य, नैमित्तिक, तथा प्रायश्चित इस प्रकार से ये पाँच प्रसिद्ध कर्म होते हैं। ब्राह्मण ग्रन्थों में मन्त्रों के विनियोग का विस्तृत वर्णन है। जीव ही पापपुण्य को प्राप्त करता है तथा उसका फल भोगता है। और वह याग अग्नि से ही सिद्ध होता है। देव कैसे अमर हुए? वह मेरा मन शुभ सङ्कल्प वाला हो। यह ग्रन्थ सूत्र रूप में है। अनुदात्त इसका है इस अर्थ में अनुदात्त शब्द से अर्श-आदिभ्योच् '' इस सूत्र से मत्वर्थीय-अच् प्रत्यय होने पर अनुदात्त पद निष्पन्न होता है। चितः इस पूर्व सूत्र से चितः इस षष्ठी अर्थ में प्रथमा एकवचनान्त पद की यहाँ अनुवृति आ रही है। पूर्वजन्मों में किए गये निषिद्ध कर्म अन्तः करण में अधर्म को पाप का दूसरा नाम भी ले जाते हैं। इसलिए ही भारतीय दर्शनों में मन उभय इन्द्रिय कहलाता है। वह ही प्रसन्न होने पर उपासकों के लिए ब्रह्मादिदेवपद को ऋत्विग अथवा विद्या देती है। इन आख्यानों में पाठक के हृदय में उद्ठिग्न चित्त में शान्ति तथा शीतलत्व विद्यमान है। चौथे दिन निरूठ पशुबन्धयाग की प्रक्रियानुसार अग्नि और सोम को उद्देश्य करके एक पशुयाग विहित है। यहाँ वाक्य से आभीक्ष्ण को समझा जा सकता है। मन्त्र के प्रारम्भिक भाग में प्रस्ताव है। यहाँ दो प्रकार के ग्रन्थ है, एक विशाल और दूसरा लघु आकार का। 3. वेदान्त का प्रयोजन क्या है? कर्मयोग को सही किया जाता है तो मुमुक्षु ज्ञान योग को प्राप्त करता है। जिस प्रकार भूखे को भोजन के अलावा कोई और नहीं अच्छा लगता है। अर्थात् समास के पूर्वपद में जो स्वाभाविक स्वर है, समास के बाद भी वैसा ही स्वर रहता है। अथर्ववेद, ब्रह्मवेद, अङिगरवेद, और अथर्वाङिगरसवेद ये प्रमुख नाम है। अग्निष्टोम का अन्य नाम क्या है? किन्तु यह सकारान्त ऊपर में अर्थ है, और अध यह नीचे अर्थ है। कर्मसंज्ञक को सम्प्रदानसंज्ञा होने से चतुर्थी विभक्ति होती है। 12. स्थूलविषयोपभोग कब होता है? और तदर्थश्च, अर्थश्च, बलिश्च, हितश्च, सुखश्च, रक्षितञ्च तदर्थात्बलिहितसुखरक्षितानि तैः तदर्थात्बलिहितसुखरक्षितैः यहाँ इतरेतर द्वन्द समास है। होम में, भोजन में और दान दक्षायण में श्रद्धा का विधान है, श्रद्धा से ही वे फल प्राप्त करते है इत्यादि विषय प्रथम मन्त्र में कहे गये है। चारों योगों का समन्वय विवेकानन्द के दर्शनानुसार कीजिए। इससे समासान्त अधिकार का विधान है। मन का शम किया जाता है। 12. चित्त का चाञ्चल्य ही विक्षेप होता है तथा विषयों से मन का आकर्षण विक्षेप होता है। फिषोऽन्त उदात्तः इस सूत्र से यहाँ उदात्तः इस विधेय स्वर बोधक पद की यहाँ अनुवृति है। 8. जजान इसका लौकिक रूप क्या है? इस सूत्र में चार पद है। अतः गवामयन की प्रकृति अग्निष्टोम है। बहुत काल पूर्व सम्पूर्ण सृष्टि एक जल समूह से व्याप्त थी। विशेषणं विशेष्येण बहुलम् '' इससे ही सिद्ध उपमानानि सामान्यवचनैः' यह सूत्र किसलिए है? पञ्चगो इस गो-शब्दान्त के तत्पुरुष होने से इस गोरतद्धितलुकि इस सूत्र से टच् प्रत्यय होता है। इस सोमरस में वैसे आसक्त भी थे की एक बार सोम के लिए चुराले। अधिकारी अनुबन्ध में इन पांच विषयों का वर्णन किया गया है - १. वेदाध्ययन २. काम्यनिषिद्धवर्जन ३. नित्यनैमित्तिक प्रायश्चित अनुष्ठान ४. उपासना ५. साधनचतुष्टय। अथवा रथ पर मधुशाला स्थापित करना यह अर्थ है। क्योंकि आथर्वणमहानारायण उपनिषद् में देवदेवी नाम की अथर्व शाखा के साथ सम्बन्ध को स्वीकार करते हैं। इनके क्रमशः उदाहरण है- कल्याणकारी पञ्चमाः, अन्तर्लोमः। अविद्याकाम बीज सभी कर्म होते हैं। महाव्रत के अनुष्ठान वर्णन, निष्कैवल्य शास्त्र, प्राणविद्या, पुरुष आदि का वर्णन, कुछ स्थलो में ब्रह्मविद्या की गूढ़ता का विस्तार भी वर्णित है। इसमें किन दस मंत्रों के द्वारा किसका प्रतिपादन किया गया है? लेकिन शास्त्रज्ञ भी अधिकारी स्वतन्त्रता से ब्रह्मज्ञान का अन्वेषण नहीं करता है। ऋक् संहिता आठ भागो में विराजमान है, और प्रत्येक भाग में आठ अध्याय है। उदाहरण -उदसुजो यदङिगरः इति। प्रज्ञान ब्रह्म में उत्पत्ति स्थिति तथा लय काल में प्रतिष्ठित प्रज्ञा यह अर्थ है। और वह तत्पुरुष समास है। याज्ञवल्क्य शिक्षा में किसकी विवेचना की है? पूजार्थक विधि-धातु से विधिलिङ में उत्तमपुरुषबहुवचन। उत्तरपदार्थ जिसका प्रधान है वह उत्तर पदार्थ प्रधान है। सह सुपा'' इस सूत्र को इवेन सह समासो विभक्त्थलोपाश्च'' इस वार्तिक इस समास का विधायक है ऐसा होता है। इस सूत्र का अर्थ होता है - षष्ठयन्त सुबन्तों को पूरण आदि अर्थो से सदादि से समास नहीं होता है। एक श्रुतौ दूरात्सम्बुद्धौ'इस सूत्र से यहाँ एक श्रुति' इस एकवचनान्त की अनुवृति आ रही है। पतञ्जलि के योगदर्शन में शीतोष्ण, भूख, प्यास, सुख, दुःख आदि का सहन करना तथा कृच्छन्द्रयाणादि व्रत, तप, पदों के द्वारा कहा गया है। वृत्र के द्वारा रचित बिजली मेघ अथवा वज्रेन्द्र को नहीं रोक सकती है। अगृधत् - गृध् -धातु से लङ् प्रथमपुरुष एकवचन में (वैदिक )। सान्वयप्रतिपदार्थ - अस्य = पुरुष या परमेश्वर का, मुख = आनन, ब्राह्मण = द्विज, आसीत् = था। आदीध्ये - आपूर्वक आत्मनेपद धी-धातु से लट् उत्तमपुरुष एकवचन में। इस प्रकार से कुछ युक्ति चतुष्टय के द्वारा देवों का साकारत्व प्रतिपादित करते है, और कुछ युक्ति की खण्डन करके देवों का निराकारत्व प्रतिपादित करते है। इसी प्रकार से जो साहित्य से अपरिचित होते हैं वे व्यञ्जन द्वारा प्रतिपादित वैदिक अर्थो को नहीं जान सकते है। वह क्रियावान तथा परिच्छिन्न होता है। 5 प्रायश्चित कर्म कौन-कौन से होते हैं? धातु के अन्त में क्या स्वर होता है? अहङऱकारोपासना तथा प्रतीकोपासना। सूत्र व्याख्या-यह विधिसूत्र है। पञ्चमी का अमादेश नहीं होता है। यज्ञस्य - यज् -धातु से नङ करने पर षष्ठी एकवचन में यज्ञस्य रूप बनता है। इसके बाद गवाक्षि शब्द का यचि भम् '' सूत्र से भसंज्ञा होने पर यस्येति च'' इससे इकार का लोप होने पर सर्वसंयोग में निष्पन्न गवाक्ष शब्द से लोकप्रसिद्ध पुल्लिङ्ग में विद्यमान सु प्रत्यय होने पर प्रक्रियाकार्य में गवाक्षः रूप बना। वाक्य से निन्दा भी जाना जाता है। शङ्कराचार्य ने भी कहा है-प्रतिषिध्यते एव तु परमार्थतः सर्वज्ञात् परमेश्वरात् अन्यः द्रष्रा श्रोता वा नान्योस्तो अस्ति द्रष्टा इत्यादिना इति। विज्ञानमय के समान ही उदय तथा अस्तमय आत्मा नहीं होता है ऐसा कहकर विज्ञानमय कोश के आत्मत्व का निरास किया गया है। अन्यथा वह क्षत्रियपदवाची नहीं हो सकता है। इस प्रकार से आत्मा के आवृत्त होने के कारण स्वस्वरूप के अज्ञान के कारण वह जीव भूलकर संसारिक हो जाता है। अतः आठवें अध्याय में स्थित'आमन्त्रितस्य च' इस सूत्र से सभी जगह अनुदात्त स्वर का विधान है। अदन्त अव्ययीभाव से तृतीया और सप्तमी के बहुल का अमादेश होता है। इस प्रकार से चित्त की शुद्धि होती है। वो ही देवों का अद्वितीय या एकमात्र ईश्वर है। 3. धर्मराजध्वरीन्द्र के मत में लक्षणा क्या है? वह उस स्वरूप का होता है मेरा मन धर्मेष्ट ही होता है। इस प्रकार से श्री रामकृष्ण ने अपने जीवन में वेदान्त तत्व का ही प्रयोग किया। इसलिए पतञ्जलि ऋषि इस सूत्र में कहते है-सन्तोषादनुत्तमसुखलाभः। उससे देवता स्वरूप और बीजभूत हिरण्यगर्भ नूतन सृष्टि के लिए आविर्भूत हुए। ऋतेन ऋतमपिहितम्... इत्यादिमन्त्र की व्याख्या करो। उनके योग में तृतीया विभक्ति सभी जगह दिखाई देती है। ज्ञात ज्ञान और ज्ञेय इन तीनो का ही समूह त्रिपुटी कहलाता है। 26. उदाहरण सहित अलौकिक विग्रह का लक्षण लिखो? उपनिषद् के रूप में ख्याति पाने के लिए ब्रह्म की भावना को प्राप्त करना चाहिए, ऐसा कुछ भी नहीं है। इसका यह अर्थ है की दृष्ट स्वरूप गगन के समान ही श्रेष्ठ है, एकारूप प्रकाशमान है, जन्मरहित, सकलोपाधि शून्य, ಕೂटस्थ, सर्वव्यापी, सदा विमुक्त जो अद्वैतवस्तु है उसको अहं इस प्रकार से कहता है, इसलिए श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है- वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः। चकार से स नपुंसकम् '' इस सूत्र से नपुंसकम् इस पद का ग्रहण किया गया है। श्रद्धा कामायनी ऋषिका, अनुष्टुप् छन्द, और देवता श्रद्धा है। पञ्चकोश विवेक इस पाठ का विषय है। 10. योगी के तप में प्रतिष्ठा होने पर किस प्रकार का फल प्राप्त होता है? इस सूत्र से असंज्ञा होने पर गम्यमान तद्धित से ञप्रत्यय होता है। (गीता 5.16) जिस अज्ञान के द्वारा जन्तु गतिशील होते हैं उस ज्ञान के द्वारा उन जन्तुओं का विवेकज्ञान आत्मविषय के द्वारा नष्ट आत्मा होती है, वे जन्तु आदित्य के समान सभी रूपों में दिखाई देने वाले आदित्य उस प्रकार के ज्ञान के लिए सभी को प्रकाशित करते हैं उसके बाद परमार्थतत्व सिद्ध होता है। स्कन्दस्वामी के अनुसार उसका अर्थ यज्ञ का प्रकृत मन्त्र में है। इस सूत्र से पञ्चमीतत्पुरुष समास होता है। इस सूत्र में दो पद हैं। शाकपार्थिव आदि शब्दों की सिद्धि के लिए पूर्वपद रहते उत्तरपद का लोप होने पर उपसंख्यान करना चाहिए। और इनमे अद्वैततत्व ही सर्वोच्कृष्ट श्रेणि इस उपाधि को देखकर वह ही अभ्यर्हि तत्त्व प्रचारित है। 4 मन तथा इन्द्रियों में श्रुति कौन-सी है? इसलिए कार्य के द्वारा कारण का अनुमान किया जाता है। और कुछ समय बाद - पर्वत के ऊपर जो जल चढ़ता है धीरे धीरे वह नीचे की और आता है तब तक तुम यहाँ रुकना। सूत्र व्याख्या-यह विधिसूत्र है। पूजितम् यह प्रथमा एकवचनान्त पद है। 30. केवलसमास का लक्षण क्या है? इन शिष्यों में शौनक के शिष्य बभ्रु तथा सैन्धवायन कहा है। सूत्र व्याख्या-यह अतिदेश सूत्र है। उससे ही आत्मा की उन्नति शीघ्र होती है। गौश्च श्वा च साववर्णश्च राट् च अञ् च क्रुञ् च क्रुत् च इस विग्रह करने पर इतरेतरद्वन्द्वस्मास में गोश्वन्साववर्णराडङक्रुङकृदः, उस पञ्चमी विभक्ति में गोश्वन्साववर्णराडङक्रुङकृद्भ्यः यह पद बनता है। 11. अधिकारी वेदान्तोक्त मार्ग का ही क्यों अनुसरण करना चाहिए। और उसका भोग होने पर प्रमोद होता है। 17. काम्यकर्मों का त्याग में क्या हेतु है? जिन दोनों पदों के अर्थ में परस्पर सम्बन्ध नहीं है उन दोनों पदों के मध्य समानता नहीं होती है। ज्ञान का आवरण अज्ञान है न कि कर्म उसकी बुद्धि उसकी आत्मा उसकी निष्ठा तत्परज्ञाननिर्धूत कल्मष जन्तु संसार चक्र का अतिक्रमण करता है। इस पाठ में निर्विकल्पक समाधि के अङ्गों के भेद सहित आलोचना की है। अतः कुछ मन्त्रों में बुखार निमित्त भी कुछ मन्त्र है। सुप् का तदन्त विधि में सुबन्तम् होता है। तीन गुण होते हैं। इस पाठ में केवलसमास का अव्ययीभावसमास का विधायक और उससे सम्बद्ध कार्यों का विधायक सूत्रों का प्रतिपादन किया गया है। तद्धितार्थश्च उत्तरपदञ्च समाहारश्च तद्धित उत्तरपद में जो समाहार है वह समाहारद्वन्द्व है। उससे युवन् ति यह स्थिति होती है। कर्मयोग के द्वारा चित्त के मल का नाश होता है। होमयाग आहुति प्रदान विषय में कौन सी विमति है? इसके बाद यस्येति च सूत्र से अकार का लोप होने पर और वर्णसम्मेलन होने पर शार्ङ्गरवी रूप सिद्ध होता है। इन बाल्य-खल्या सूक्तों का स्थान आठवें मण्डल में ही स्वीकार किया जाएगा। अन्वय - येन अमृतेन (मनसा) इद् भूतं भूवनं भविष्यत् सर्वं परिगृहीत। और आचार्य के उपदेश से विद्या प्राप्त होती है। इष्ट प्राप्त के लिए और अनिष्ट परिहार के लिए जो अलौकिक उपाय कहा जाता है वह वेद कहलाता है। 25. परिनिष्ठितत्वात् साधुरलौकिकः'' लौकिक विग्रह वाक्य लक्षण है। आभिचारिक मन्त्रों का प्रयोग शत्रुओं के नाश के लिए होता है। और माता मार्ग में घूमती है। इसी प्रकार प्रतिभाग के अनुष्ठान काल में छः माह तथा प्रति तिथि में तीस दिन का अनुष्ठान भी विहित है। इसके बाद उपचर्मशब्द से सु सोरमि प्रक्रियाकार्य में उपचर्मम् रूप निष्पन्न होता है। 5. निर्वोधा यह रूप कैसे सिद्ध हुआ? व्याख्या - कितने दिन या तिथि नौकाओं की रचना करने के लिए, नौकाओं की रचना करके मछली का स्मरण किया। एवं चकारः इत् यस्य स चित् यह बहुव्रीहि समास है। त्याग से ही मुक्ति होती है। त्रिष्टुप् -छन्द में कितने पाद और कितने अक्षर होते है? 13. अपीपरम् यहाँ पर धातु क्या है? अज्ञानोपहित जीव आत्मा के स्वरूप को नहीं जानता है। सोलहवें अध्याय में अग्निचयन प्रकार का वर्णन करके सोलहवें में सौ रुद्रीय होम मन्त्र कहे गये हैं। नौ रसों में भी श्रृंगार नाम का रस रस का राजा सभी साहित्य शास्त्रज्ञ मानते हैं। आरोहथः - आङ पूर्वक रुह-धातु से लट् -लकार मध्यमपुरुषद्विवचन में आरोहथः रूप बना। आमन्त्रितम् पूर्वमविद्यमानवत्'इस सम्पूर्ण सूत्र का अनुवर्तन होता है। कापिष्ठल संहिता के चरणव्यूह के अनुसार चरक शाखा में कठों का, प्राच्यकठों का, और कापिष्ठल कठ का उल्लेख प्राप्त होता है, उससे शाखा का सम्पूर्ण परिचय प्राप्त होता है। तब वह दुर्दशा को देखकर अपने पुरुष पर दया नहीं करता था, और उसकी रक्षा भी नहीं करना चाहता था। इन अवस्थाओं से अन्य कोई अवस्था जीव की नहीं होती है। यह उसका परिमाण है। जो कितव होता है उसकी सास भी उसको छोड़कर जाती है। किस प्रकार योगी लोग अपनी रक्षा करते है? सर्वसमासान्त प्रत्ययाः विषय आश्रित टिप्पणी लिखिए। इस प्रकार यहाँ उदात्त-इकार से परे अनुदात्त-ईकार अनुदात्त के स्थान में प्रकृत सूत्र से स्वरित स्वर होता है। वहाँ पर मैं देह हूँ यह मेरा यह अहंता तथा ममता रूपी भावना मूलभूत होती है। वैदिक मन्त्रों में प्रकृति का मनोहर वर्णन प्राप्त होता है। स्था-धातु से लिट् -लकार प्रथमपुरुषबहुवचन में स्था-धातु से। मैं जिसको चाहती हूँ उसको ही बलवान, ब्राह्मण, मन्त्रद्रष्टा, और मेधावी बना देती हूँ। पथो विभाषा इस सूत्र का क्या उदाहरण है? सूत्र व्याख्या-यह विधिसूत्र है। ब्रह्मा यज्ञ का निरीक्षक है और करता हुआ कार्य का निरीक्षण करता है। यजुर्वेद संहिता विवेच्य विषय पूर्व वर्णित विषयों से नितान्त भिन्न है। ब्रह्म न तो सत्य है और न ही मिथ्या है इस प्रकार से ऋग्वेद में कहा गया है। बिभ्यत् - भीधातु से शतृप्रत्यय करने पर प्रथमा एकवचन में वैदिक रूप है। वेदों में अनेक रूपों में प्राकृतिक शक्ति के रूप में देवतारूप में उसका परिकल्पन किया गया है और हम किसकी स्तुति करते है। अग्निष्टोम याग में उद्गाता मण्डप में औदुम्बर की शाखा का पाठ करता है। प्राचीन काल में इस संहिता की विशेष ख्याति थी। परन्तु योग के द्वारा प्रोक्त असम्प्रज्ञात समाधि का तथा वेदान्त में प्रतिपादित समाधि का अनेक भेद होते हैं। अथवा, पद और अर्थ में, तिल मित्रहे (धा. ६/१६, १०/७३)। तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् इति। रूप को बढाने वाले। प्रकारान्त से लक्षणों के तीन भाग होते हैं। इस रोग को स्ववैदय सेन नामक यज्ञ से किया गया है। महाभाष्य में ऋग्वेद की कितनी शाखा का उल्लेख है? अर्थ और उदाहरण सहित उसकी व्याख्या कीजिए। मन के द्वारा भूत, वर्तमान तथा भविष्य का ज्ञान होता है। एवं अन्नमयकोश, प्राणमयकोश, विज्ञानमयकोश तथा आनन्दमयकोश। अत: इस प्रकरण के अनेक मन्त्रों में पूर्व वर्णित उपद्रवों के दूर करने का उपाय है। उनमे आदि में तीन त्रिष्टुप् है, दो अनुष्टुप् और अन्त में अनुष्टुप् है। अहं रुद्राय धनुरा... इत्यादिमन्त्र की व्याख्या करो। 1. प्रातः। 2. हाथो में। जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण। चतुर्थ अध्याय के दसवें अनुवाक में। वृत्र ने अपनी महिमा से जो जल उन्होंने युद्ध किया तब जल ने उसके शरीर का उल्लङ्घन किया यह अर्थ है। 5 अज्ञान के नाश के लिए ब्रह्म में वृत्ति व्याप्ति अपेक्षित होती है। सत्यवन्त में और इनमें जो वेदान्त के द्वारा दुःखनाश को प्राप्त करता है। इस प्रकार प्रजापति और हिरण्यगर्भ पूजनीय थे। तब वास्तविक रस्सी का ही इस वस्तु का ज्ञान होता है। सभी प्रश्नों के उत्तर संस्कृत भाषा में ही लिखें। उन जन्तुओं को आदित्य के समान आदित्य सभी रूपों में वैसे ही दिखाई देने वाले उस ज्ञान को जानने के लिए वस्तुओं को प्रकाशित करता है। 8. धृति इसका क्या अर्थ है? किस कोश का जाग्रदादि किसी भी अवस्था में प्राधान्य है इस प्रकार का विचार होता है। सरलार्थ - पणि नाम के राक्षस गण गायों को छुपाये हुए मेघ भगवान के द्वारा रक्षित जल को वृत्रजल से रोक दिया। उसी यज्ञ से ऋक्, साम, यजु गायत्री आदि छन्द और अश्वगर्दभ आदि पशु उत्पन्न हुए। पौराणिक काल में यह संख्या 33 करोड़ तक थी। ङयि यह सप्तमी एकवचनान्त पद है। वेद कितने प्रकार का है? उससे देवों का प्राणभूत प्रजापति उत्पन्न हुए (उसको छोड़कर हम किसकी हवि के द्वारा पूजा करें)। यहाँ पर एक यज्ञ है, गवामयन नामक यज्ञ। लेकिन समुद्र में नहीं होता है। वह पाण्डुलिपि कश्मीर राज्यपाल के द्वारा जर्मन विद्वान रात महोदय के लिए उपहार रूप में भेजी थी। वहाँ विहित विरोधियों का उपनिषद् वाक्यों के मध्य में समन्वय का अत्यधिक सुंदर रूप से प्रदर्शन किया है। इनका स्वरूप नीचे आलोचित किया जाएगा। ( 10.3 ) वयसिप्रथमे ( 4.1.2 ) सूत्रार्थ-प्रथमवयवाचक अदन्त प्रातिपदिक से स्त्रीत्व द्योत्य होने पर ङीप् प्रत्यय होता है। जब आप बड़े होकर बुरे करने वाले मेघ को मारते हो, तब यह विश्व प्रसन्न होता है, क्योंकि वर्षा सभी जगत के प्रेमकारण के रूप में प्रसिद्ध है। इसके बाद लट् के स्थान पर लटः शतृशानचावप्रथमासनाधिकरणे इस सूत्र से शतृप्रत्यय होने पर भू शतृ होने पर शकार की लशक्वतद्धिते इस सूत्र से इत्संज्ञा का लोप होने पर तस्य लोपः इससे लोप होने पर ऋकार का उपदेशेऽजनुनासिक इत् इस सूत्र से इत्संज्ञा होने पर तस्यलोपः सूत्र से लोप होने पर भू अत् होता है। दसवें अध्याय में अग्निहोत्र का अङ्ग सहित और उपाङ्ग सहित वर्णन है। और अन्य घर की पत्नी को देखकर द्यूत से उन्मत्त मनुष्यों का भोग करता है। शतपथ ब्राह्मण का वचन है, ऐतद्वै जरामर्यं सत्रं जराया ह्योपासमात् मुच्यते मृत्युना वा' अर्थात् अग्निहोत्र को ही जरामर्यसत्र कहते हैं। और वहाँ विविध सूक्तों में लौकिक विषयों पर राजकर्मों का विधान है। जैसे दीपक का प्रकाश अन्धकार में विद्यमान घट का विषय होकर के घट का नाश करता है। ऋग्वेद- १.२२.२० सज्जन जहाँ रहते है, और जहाँ मधुसरोवर की रात होती है, वहा विष्णु निवास करते है। ज्निति यहाँ पर ज् च न् च ज्नौ, ज्नौ इत् जिसका वह ज्नित है उसमें ज्निति इसका अर्थ- ज्नित और नित् है। किन्तु अन्य मन्त्र में कहा गया है - सहसानि सहस्रशो ये रुद्रा अधिभूम्याम्'(तैत्तिरीय संहिता ४५-११-५) अर्थात् भूमि में हजार रुद्र है। साधनचतुष्टय संपन्न ब्रह्मबोधकों को वेदान्त वाक्यों को सुनकर के ब्रह्मविद्या को प्राप्त करता है। इस सूत्र में कर्षात्वतो घञोऽन्त उदात्तः' इस सूत्र से उदात्तः इस प्रथमान्त पद की अनुवृति आती है। आसितम् यहाँ पर क्तोऽचिकरणे च ध्रोव्यगति प्रत्यचसानार्थेभ्यः इससे अधिकरण में क्त प्रत्यय होता है। इन छः वेदाङ्गों का भी उल्लेख गोपथ ब्राह्मण, बौद्ध धर्मसूत्र, गौतम धर्मसूत्र, रामायण के समान प्राचीन ग्रन्थों में उपलब्ध होता है। वह कर्म कारण साधन कहलाता है। श्रवण के द्वारा जो अर्थ निश्चित होता है उसका प्रमाणान्तर से अत्यधिक विरोध होता है। उदाहरण का समन्वय- इस सुब्रह्मण्य नामक यजुर्वेद मन्त्र में देवशब्द और ब्रह्मन् -शब्द का प्रयोग है। गृत्सम के महर्षि ने अनेक स्तुति में वीररस से इन्द्र का वर्णन किया। उन मछलीओ में सबसे विशाल मछली बनी। एवं सूत्र का-''सप्तम्यन्त सुबन्त को शौण्डादि प्रकृतिक को सुबन्त के साथ विकल्प से तत्पुरुष समास संज्ञा होती है। न गोश्वसाववर्णराडङक्रुङकृद्भ्यः ( ६.१.१८२ ) सूत्र का अर्थ- ये पहले कभी नहीं बताया जा सका है। 61. सादृश्य अर्थ में अव्ययीभाव समास का क्या उदाहरण है? किन्तु भागवत में (१२/७/१) स्कन्ध का नाम निर्दिष्ट नहीं है। यहाँ सूत्र होने से अतः अव्ययीभाव से सुप् लोप एक वाक्य अम् तु अपञ् चम्याः यह दूसरा वाक्य है। उन्हें किस प्रकार से करना चाहिए। बहुवचनस्य वस्नसौ इस सूत्र से अनुदात्तं सर्वमापादादौ इस सूत्र का अनुवर्तन होता है। हे हमारे पालक, प्राण देने वाले तुम गर्जना करते हुए मेघ के साथ आओ। और अन्त में कितव अक्षाभिमानी देवता को प्रणाम करता हूँ। उससे शतृप्रत्यय उगित् होता है। सरलार्थ - इस मन्त्र में अग्नि के प्रति कहते है की हे अग्नि जैसे हिंसारहित यज्ञ चारो और व्याप्त था वैसे ही उस यज्ञ की आवश्यकता देवों के पास ही जाती है। इसलिए वह याग नैमित्तिक कर्म होता है। सूत्र से अल्प समास होता है किन्तु उस समास की विशेष संज्ञा नहीं कर सकते हैं। उससे पदों का अन्वय इस प्रकार होता है - चितः अन्तः उदात्तः इति। उसके बाद उसने कहा - जिस दिन जल प्रलय होता है तब नौका का निर्माण करके प्रतीक्षा करते हो। एक ही परमाणु मन के आदि कर्मों को आरम्भ करती है। यहाँ पर प्रकृत सूत्र से ही घृत शब्द के अन्त्य अकार को उदात्त किया है। बत्तीसवें और तीसवें अध्याय में सर्वमेध मन्त्रों का उल्लेख है। संख्या पूर्वः पूर्वावयवः यस्य स संख्यापूर्वं बहुव्रीहि समास है। इस सूत्र में छन्दसि यह विषय सप्तम्यन्त पद और अव्यय पद है। यदि यह प्राण आत्मा है तो सुषुप्ति काल में उसकी जाग्रत अवस्था में चोर चुराले नहीं जा सकते है। इस आरण्यक में महाव्रत के पांचवे दिन में प्रयुक्त होने वाली महानाम्न ऋचा है। जो धेर्यस्वरूप है। सावेकचस्तृतीयादिविभक्तिः इस सूत्र से विभक्तिः इस प्रथमा एकवचनान्त पद की यहाँ अनुवृति आ रही है। सूर्य चन्द्र आदि की कक्षा में आवर्तन कौन नियंत्रित करता है? विष्णु शब्द विष् -इस धातु से विष्णु शब्द का अर्थ व्यापक है। तैत्तिरीय आरण्यक के किस प्रपाठक में गङ्गा यामुन की कथा का वर्णन है? गच्छति - गम् - धातु से लट् प्रथमपुरुष एकवचन में गच्छति यह रूप बनता है। विपरीत भावना निदिध्यासन से निवृत्त होती है। यहाँ पर हेली के यज्ञादिकर्म काम्य नहीं होते हैं। प्रकाशित होता है यह अर्थ है। इससे अनुदात्त स्वर का विधान है। सूत्र का अर्थ- घृतादि शब्दों का अन्त्य स्वर उदात्त होता है। सूत्र का अवतरण- यहाँ टाप्, डाप्, चाप्, ङीष्, ङीप्, ये छह मुख्य स्त्री प्रत्यय हैं। देवों की अपेक्षा अग्नि अधिक रूप से मानव जीवन से अधिक सम्बद्ध है। अगले पाठ में इसी विषय को अनुवर्तन किया जाएगा। परन्तु साधारण लोग बहुत जन्मों में किये गये तप के बल से अधिकारी होते है। 1. आध्यात्मिक, 2. आधिभौतिक, 3. आधिदैविक। इन कर्मों को करने पर निषिद्धकर्मों के द्वारा उत्पन्न होने वाले दोष दूर हो जाते हैं। देने की इच्छा वाले का कल्याण करो, दान भोक्ता दक्षिणा में प्राप्त ऋत्विग के समान कल्याण करो। उपासना के बिना आत्म क्रिया साधना से मोक्ष सम्भव होता है। इस प्रकार के मन्त्रों में संशयों के कारण वेद प्रमाण नहीं है इस प्रकार पूर्वपक्षी मानते हैं। अतः ईळे यहाँ पर ` अनुदात्तं पदमेकवर्जम्'यह सूत्र प्रवर्त्तमान नहीं है। लोक से वे सभी लोक अपनी महिमा से उत्पन्न करते हुए वाणी की कीर्ति को कहते है। उस अज्ञान का ही एक विषय होता है। वहाँ स्यान्तस्य यह षष्ठी का एकवचनान्त है, उपोत्तमम् यह प्रथमा का एकवचनान्त है, च यह अव्ययपद है। मन आदि मूलभूत जगत् में प्रवृत्तियाँ होती हैं। वक्षति यह रूप किस किस लकार में होता है? उच्छः आदि में जिसके उञ् छादिः उसका समूह उञ् छादीनाम् है। विधि शब्द का क्या अर्थ है? जैमिनी के मत में देवों के अन्य रूप आदि नहीं हैं - मन्त्रमयी देवता। यह पुरुष कौन है उस पुरुष को देवों ने मानस यज्ञरूप में उठाया विराट्पुरुष को पशुरूप में माना है। अतः प्रकृत सूत्र से करिष्यति इस तिङन्त पद को अनुदात्त नहीं होता है। किन्तु लौकिकसंस्कृत के छन्दों में ये नहीं कहा गया है। जीव तथा ब्रह्म का ऐक्य। आपः - अपः इसका द्वितीयाबहुवचन का यह वैदिक रूप है। सान्वयप्रतिपदार्थः - एतावान् = अखिल परिदृश्य जगत्, अस्य = सर्वश्वर पुरुष, महिमा स्वसामर्थ्य विशेष विभूतिः। और उसका प्रशंसावचनैः अन्वय से सुबन्तैः रूप होता है। परिशिष्ट भाग बाद का नहीं कहा जा सकता है। स = अन्तर्यामि, भूमिं = ब्रह्माण्डगोलक रूप धरित्री, अथवा पञ्चभूत में व्याप्त, भूमि शब्द यहाँ पर पञ्चभूत उपलक्षक है। अशितः यह प्रथमा एकवचनान्त, कर्ता यह भी प्रथमा एकवचनान्त पद है। यूपदारु रूप को सिद्ध करो? अतः अविद्यमानवत्त् होने पर देवी: यह पद भी विद्यमान नहीं है। भूरे रंग के घोड़े उस रथ को ले जा रहे थे। पुनः उन चारों भागों का स्वस्वद्वितीया के अर्धभाग को छोड़कर भागान्तर में संयोग होता है पञ्चीकरण। और सूत्रार्थ होता है उभयप्राप्तौ कर्मणि'' इससे विहित षष्ठी तदन्त सुबन्त का सुबन्त के साथ समास नहीं होता है। चतुर्थ मन्त्र में अग्नि के प्रति कहा गया है की तुम जैसे हिंसारहित यज्ञ के चारो और व्याप्त होकर उसके द्वारा उस यज्ञ का अवश्य देवताओं की और जाता है। इसलिए वेद ज्ञान हमेशा आवश्यक होना चाहिए। सूक्त से कहा गया वाणी ही उस नैयायिक स्फोटाख्य से आगे वाणी है। जिससे उनमें स्वयं में युक्ति समन्वित चिन्तन शक्ति का विकास हो। विन्दते - विद् -धातु से लट् लकार प्रथमपुरुष एकवचन का यह रूप है। सरलार्थ - जिस प्रजापति से पहले जो उत्पन्न नहीं हुआ, जिसने प्रजापति ने सम्पूर्ण लोक की रचना की और वह उसका चारो और व्याप्त है, सोलह अवयवों से विशिष्ट प्रजापति प्रजा के साथ रमाता है, तीन प्रकार के तेज को धारण करता है। इस सूत्र में "प्रत्ययः","परश्च","तद्धिताः" "समासान्ताः" ये अधिकृत सूत्र हैं। ब्राह्मण ग्रन्थों में स्थान-स्थान पर शब्दों के निर्वचन का भी निर्देश उपलब्ध होता है। इस सूत्र में दो पद होते हैं। अरण्यक के भागों का नाम और पाठों को चित्र के रूप में प्रकट कीजिए। उन आवश्यकताओं को कुछ शब्दों से पूर्ण करने के लिए कल्प सूत्रों की रचना की है। तब परमप्रकाश से घट प्रकाशमान होता है। सुब्रह्मण्योम् यहाँ पर स्वरित को उदात्त का विधान है। इस प्रकार यातवै इसका तवै-प्रत्ययान्त होने से उसके आदि स्वर यकार से उत्तर अकार का और अन्त स्वर वकार से उत्तर ऐकार का संयुक्त रूप से इस सूत्र से उदात्त स्वर सिद्ध होता है। यह विष्णु सबसे अधिक क्रियाशील है। नीलपद अनिल उत्पल से उत्पलशब्द के व्यावर्तकत्व से इसका विशेषण होता है। यहाँ ईवेन तृतीया एकवचनान्त पद है। अपनी मोहनी शक्ति को मुझ पर विस्तृत मत करो। आजकल अथर्ववेद की कितनी शाखा प्राप्त होती है? प्राण में सुषुप्ति जगती है। दोनों के अशुद्ध आहार में ओलन होने पर तत्वदर्शी तथा कुत्ता में क्या भेद है। इसके बाद अजन्त कमि धातु से 'अचो यत्'इससे यत्प्रत्यय और अनुबन्ध लोप करने पर नेरनिटि इससे मकारोत्तर णिङः द इकार का लोप करने पर प्रथमा द्विवचन प्रक्रिया कार्य में काम्य रूप सिद्ध होता है। मल के कारण अशुद्ध चित्त विषयों में आकृष्ट होता है। जिस उपनिषद् में तेज प्रमुख सृष्टि के रूप में प्रतिपादित किया गया है। अर्थात् कर्मों के द्वारा यज्ञादि अनारब्ध अननुष्ठानों के द्वारा नैष्कर्म्य तथा कर्मशून्यभाव वाला पुरुष केवल संन्यास के द्वारा कर्म परित्यागमात्र के द्वारा ही ज्ञानरहित सिद्धि को नैष्कर्म्य लक्षण को प्राप्त नहीं करता है। उसी प्रकार से जीवन्मुक्ति की प्रतिष्ठा काल में उनके द्वारा कही गई जो जीवन्मुक्ति है वो स्वीकार नहीं की गई है और सभी मोक्ष शास्त्र अविद्वत् पुरुष के द्वारा लिखी गई उनके द्वारा लिखी गई प्रमाण नहीं है। अद्वैत वेदान्त मत में मुक्ति दो प्रकार की होती है। उस प्रकार से वेद के अर्थ को जानने के लिए भी वेदाङ्गों की अपेक्षा होती है। अहमेव वतैव... इत्यादिमन्त्र की व्याख्या करो। प्रशंसावचनैश्च'' सूत्र की व्याख्या की गई है? केवल देव अर्थ में ही नहीं अपितु पूर्व अक्ष शब्द के भी अर्थ में। यहाँ पर भी पूर्व शब्द कतम शब्द के समान ही प्रकृत सूत्र से विकल्प से प्रकृतिस्वर होता है। कुछ तो कहते हैं कि कर्मकाण्ड के बिना ज्ञान काण्ड सम्भव नहीं होता है। अधिष्ठानव्यतिरेक से कल्पित वस्तुओं के सत्वसिद्ध होने पर भी कल्पित वस्तुसत्ताव्यतिरेक से अधिष्ठान सत्व प्रत्यक्षसिद्ध होता है। और तेरहवे मन्त्र का कृषिदेवता है। इसके बाद कृदन्त होने से कृत्तद्धित समासाश्च सूत्र से प्रातिपदिक संज्ञा होने पर कारक का अदन्त प्रातिपदिकत्व से अजाद्यतष्टाप् सूत्र से टाप् प्रत्यय होने से टाप् की टकार की चुटू सूत्र से इत्संज्ञा होने पर, पकार की हलन्त्यम् सूत्र से इत्संज्ञा होने पर, तस्यलोपः सूत्र से दोनों इत्संज्ञकों का लोप होने पर कारक आ यह स्थिति होती है। उज् छादि एक समूह है, उन उज् छादि-मलेच्छा-जञ्ज्-जल्प-वध-युग-वेगादि-वेद आदि शब्दों के द्वारा। उदाहरण -इस प्रकार पञ्चानां गवां समाहारः इस लौकिक विग्रह में पञ्चन् आम् गो आम् इस अलौकिक विग्रह में तद्धितार्थोत्तपदसमाहारे च'' इससे समास प्रक्रिया कार्य में निष्पन्न पञ्चगवशब्द का संख्यापूर्वोद्विगुः इससे द्विगु समास में प्रस्तुत सूत्र से एकवद् भावः होता है। कुछ वस्तु अनित्य होती है तो देखते ही देखते हैं और कुछ वस्तुअनित होती है तो उसके पास से सुनकर ही जानते हैं। इससे जाना जाता है की इस वेद में पहले शान्ति पौष्टिक मन्त्रों की सत्ता थी उसके बाद आभिचारिक मन्त्रों का सन्निवेश हुआ। इसलिए आनन्दभुक् होता है। मन का कथन था कि मेरे बिना कहे हुए वचनों को प्रकट नहीं किया जा सकता है। अध्ययन केन्द्र में रहती है। पाण्डुपुत्र का समय राजतरङ्गिणी में वर्णित है - शत्येषु षट्सु सार्ध्येषु त्र्यधिकैषु च भूतले। उत्तरपर्वत वह स्थान अवतरणमार्ग इस नाम से भी प्रसिद्ध है। पूजायां नानन्तरम् इस सूत्र से पूजायां इन सप्तम्यन्त नानन्तरम् इन प्रथमान्त दो पदों की यहाँ अनुवृति है। वर्तमान में निघण्टु ग्रन्थ में वृषवाकपि शब्द सङ्ग्रहित है। ( ६.१.१८९ ) सूत्र का अर्थ - अनिट् अजादि लसार्वधातुक के परे रहते अभ्यस्त संज्ञको का आदि उदात्त होता है। भगवान में परमप्रीति ही परम भक्ति होती है। अपने स्वयं के आत्म से प्राप्त भेद ही स्वगत भेद कहलाता है। अखिलकार्यजात इसका कारण अद्वितीय ब्रह्म ही है। वहाँ पर प्रसर्पण करते हुए ऋत्विज के धीरे धीरे चलने का विधान है। जब मैं सन्तोष से उसका प्रसाद प्राप्त करुँगी। ऋक् यजु, साम, अथर्व भेद से वेद चार प्रकार का होता है। उससे भिन्न साधारण स्वर विधायक अनेक सूत्रों का अष्टाध्यायी में प्रयोग किया है। जीव परमात्मा अंश नहीं होता है। इस प्रकार से आगे देखना चाहिए। स्वविरोधी को शेर डराने वाला है, वैसे ही दुर्गमप्रदेश में भी घुमता है, वैसे ही सभी के द्वारा उसकी स्तुति की जाती है। लेकिन इस प्रकार का लोक में अनुभव नहीं होता है। 1 मोक्ष ही परम पुरुषार्थ है। तुविबाधम् - तुवीन् बाधते इस अर्थ में अच्प्रत्यय करने पर तुविबाध यह रूप है। सूत्र का अवतरण- चित्प्रत्ययों के अन्त्य स्वर को उदात्त विधान के लिए इस सूत्र की रचना की है। तृजकाभ्यां कर्त्तरि (2.2.25) सूत्रार्थ-कर्तृ अर्थो में जिन तृजक प्रत्ययों का तदन्त सुबन्त के साथ षष्ठयन्त सुबन्त का समास नहीं होता है। चित्त का विषयाकार परिणाम ही चित्तवृत्ति होती है। वृत्तिविशेषण के द्वारा आत्मविषयक श्रवणादि विषयों में बलपूर्वक मन का निग्रह शम कहलाता है। रुद्र के वर्णन में भी उसका सभी स्वरूप प्रकट होता है। ष॒ष्ठी" इससे प्राप्त समास का अपवाद भूत यह सूत्र है। निघण्टु ग्रन्थ की संख्या विषय में पर्याप्त मतभेद हैं। इस सन्दर्भ में अथर्ववेद का कथन है की बुखार पीडित लोग पीत वर्ण वाले होते हैं और कष्ट में होते हैं। उस प्रकार के ऋचाओं का समूह ही ऋग्वेद है। इसके बाद समासाधिकरण से कब तक इसका बोध होता है इसको प्राक्कडारात्समासः' इस सूत्र से प्रस्तुत किया गया है। 2. निषिद्ध कर्म कौन-कौन से हैं? यह वेद भगवान से अभिन्न और परोक्ष होने से दुर्गम है। सूत्र व्याख्या-यह विधिसूत्र है। वह ही मोक्षसाधन का अधिकारी कहलाता है। पतयन्ति - पत् -धातु से लट् प्रथमपुरुषबहुवचन में। इष्णन् नाम कर्मफल की इच्छा करने वाले का है। सूत्र का अर्थ - गति अर्थ वाले लोट लकार में युक्त लोट् अन्त तिङन्त को अनुदात्त नहीं होता है। अतः पूर्व के समान ही अनुदात्त स्वर का विधान है। निमी में जैसे चक्र की छड़ियाँ स्थित होती हैं वैसे ही इन्द्र ने भी सभी को धारण किया। कल्पसूत्र दो प्रकार का होता है? यदि केवल एक बार ही करना हो तो, वर्षा ऋतु में सम्पादित करना चाहिए। वहाँ प्रथम अर्थ है - ऋग्वेद में ऋत् शब्द का अर्थ प्रकृति यह अधिक प्राप्त होता है। ब्राह्मण में मन्त्र, कर्म, विनियोग की व्याख्या है। इसलिए आध्यात्मिक जीवन में शक्ति परिसंचरण से इस जाति का फिर से अभ्युत्पन्न हुआ और नये जीवन का लाभ हुआ। उदाहरण - यद्वै यज्ञस्य साम्ना यजुषा क्रियते शिथिलं तत्, यदृचा तत् दृढमिति (तै. सं. ६/५/१०/३) परमेश्वर सर्वप्रथम ऋग्वेद का अविर्भाव ऐसा पुरुषसूक्त में कहा गया है। लेकिन जीवन्मुक्त इस जगत में दिखाई देने वाली सभी वस्तुओं को मिथ्या रूप में जानता है। फिर भी वासना आदि युक्त मनोवृत्तियों के द्वारा सूक्ष्मप्रपज्च भासित होता है। उसी व्याकरण से ही भाषा ज्ञान के लाभ के लिए आठ शक्तिग्राहकों में सबसे ऊच स्थान पर होता है। क्योंकि अथर्व की महानारायण उपनिषद् में देवदर्श नाम अथर्व शाखा से सम्बद्धित स्वीकार किया गया है। 3. अहिंसा से तात्पर्य है सभी भूतों को दुख नहीं देना। चन्द्र, चतुर्मुख, शङ्कर के द्वारा क्रम से नियन्त्रित मनोबुद्ध्यहङ्कार चित्त आदि के द्वारा चारों अन्तरिन्द्रियों के द्वारा क्रम से सङ्कल्पित विकल्पों के निश्चय के द्वारा स्थूल विषयों का वैश्वानर अनुभव करता है। 11.5.7 ) तत्त्वमसि यहाँ पर जहत् लक्षणाः असङऱगतिः तत्त्वमसि यहाँ पर जहत् लक्षणा यहाँ आती है। जब पट के आकार में चित्तवृत्ति होती है तो वह पटविषयक अज्ञान का भी नाश करती है तथा पट को प्रकाशित करती है। वस्तुतः अज्ञान ही एक होता है। द्रोणकलश नामक पात्र में शुद्ध रस रखा जाता है। उस कालघट में हे वरुण, हे मित्र तुम दोनों हिरण्यरूप के रथ में बैठकर के यज्ञ स्थल पर आ रहे हो। सर्वसंसरणधर्मविलक्षण तथा सर्व क्रिया कारकफलैयाशून्य जो आत्मा उस आत्मा में प्रवेश करती है। चाप् यह प्रथमा एकवचनान्त पद है। विपरीत भावना निवृत्त नहीं होती है। चौथे, पांचवें, और छठे अध्याय में ऐतरेय उपनिषद् है। अनेक महापुरुष एक ही जन्म में विधि पूर्वक वेदाध्ययन के द्वारा नित्यादि कर्मों के अनुष्ठान के द्वारा वेदान्त में अधिकार के लाभ के लिए प्रयास करते हैं। वे जो कहते हैं वही करते हैं। . वेदों की अध्यात्म परक व्याख्या किसने की है? सोमयाग में पाँच दिनों में विहित अनुष्ठान का संक्षेप में वर्णन कीजिए। दैवत काण्ड में देवों के स्वरूप स्थान का निर्देश प्राप्त होता है। संसार को स्वप्न के समान जानने के लिए वह निराकार होता है। बहुत से दर्शन सुख के प्रतिपादन में प्रवृत्त है और कुछ विरुद्ध है। मानते थे नहीं मानते थे। सप्तमी शौण्डैः इस सूत्र का क्या अर्थ है? पूर्व के पाठों में धातुस्वर प्रातिपदिकस्वर फिट् -स्वर और प्रत्ययस्वर पढ़ते है। शिव शिव शिवधर्म का अथवा शैवधर्म का प्रसार करते हुए शुक्लयजुर्वेदसाहित्य के इतिहास में बहुत बड़े स्थान को सुशोभित किया है। और ब्राह्मण शब्द के विषय में जैसे कहा है - ब्राह्मणं नाम कर्मणस्तन्मन्त्रणां च व्याख्या ग्रन्थः। यहाँ अक का कर्तृ अर्थक के अभाव से तृजकाभ्यां कर्तरि यह सूत्र प्रवृत्त नहीं होता है। विशेषणं विशेष्येण बहुलम् " इससे समास में उपमानवाचक का पूर्वनिपात होने पर यह सूत्र व्यर्थ है, उपमानवाचक पद ही पूर्वनिपात होना चाहिए ऐसा होने पर यह सूत्र का अर्थ सिद्ध होता है। परम पुरुषार्थ चारों की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है। शकटि शकटीयोः अक्षरम् अक्षरं पर्यायेण यह सूत्र में आये पदच्छेद है। वह अग्नि किस प्रकार की है? और ङ्याप्प्रातिपदिकात् सूत्र से प्रातिपदिकात् पद की अनुवृत्ति होती है। छात्र यदि आत्मतत्व का चिन्तन करता है तो वह विद्वान् छात्र होगा। तथा आत्मा मुमुक्षु भी नहीं होती है। ईड्यः - ईड् -धातु से ण्यत्प्रत्यय करने पर प्रथमा एकवचन में ईड्यः यह रूप बनता है। उपाधि तन्त्र जीव होता है। अब कहते हैं की समाधि सकल भेद के निरास पूर्वक अद्वैत ब्रह्मवस्तु साक्षात्कार के लिए प्रवर्त्तत होती है। यहाँ वैदिक व्याकरण की भी चर्चा की है। अथर्ववेद में वर्णित विषयों के क्या भेद है? सूत्र का अर्थ - आमन्त्रितान्त सुबन्त पद के परे रहते अङ्ग के समान होता है। अतः व्याकरण से स्वर निर्णय का कौशल सभी को जानना चाहिए। अतः उसका इस सूत्र से उपसर्जन संज्ञा होती है। 39. अखण्डवस्तु के अवलम्बन से चित्तवृत्ति का सविकल्पक समाधि के आरम्भ में आनन्दस्वादन सविकल्पकानन्दस्वाद कहलाता है। गमत् - गम् -धातु से लेट् प्रथमपुरुष एकवचन में गमत् यह रूप बनता है। श्रीरामकृष्ण के समान कोई सभी मतों का, सभी पंक्तों का अतिक्रमण करके यह कह सकता है। इसलिए जन्तु मोहग्रस्त होता है। वे उस स्वर्गलोक को विशाल विस्तृत क्षीण पुण्य में मर्त्यलोक में छोड़ देते हैं। नित्य नैमित्तिक तथा प्रायश्चित कर्मों के अनुष्ठान से जो धर्म तथा अधर्मरूप सभी कल्मषों का नाश होता है। (भगवद्गीता 2.23-24) शरीर उत्पन्न होता है तथा आत्मा उत्पन्न नहीं होती है। तिस्र एव देवता इति नैरुक्त्या अग्निः पृथिवीस्थानो वार्युर्वेन्द्रो वाऽन्तरिक्षस्थानः सूर्यो द्युस्थानः ऐसा यास्त भी कहता है। ऐहिक और परलोक दो प्रकार के फल से वंचित अपूर्व साधन जो कहते है वह भगवान् वेद है। अपिहितम् - अपि पूर्व धाधातु से क्तप्रत्यय करने पर अपिहितम् बनता है। अतः सूत्र का अर्थ होता है - आमन्त्रितान्त समानाधिकरण विशेषण परे होने पर पूर्व आमन्त्रितान्त बहुवचन विकल्प से अविद्यमान के समान होता है। इससे जाना जाता है कि यह शाखा कुछ प्रचलित ही थी। क्त प्रत्यय यहाँ पर कर्म में विहित है। 36. प्रायेण उत्तरपदार्थप्रधानः तत्पुरुषः'' यह तत्पुरुष का लक्षण है। दोनों प्रजापति के पास गये। सत्ता सत्ता तीन प्रकार की होती है। अत्यधिक का नाश होता है। अभिमान अहंकार होता है तथा स्मृति आत्मा का विषय होता है। वह यह वैदिक ज्ञान भ्रान्ति से और प्रमाद से रहित है। परन्तु तत्त्वमसि यहाँ पर तत् तथा त्वम् दो पदों से उन दोनों का परोक्षत्वसर्वज्ञत्वादिविशिष्ट परोक्षत्व अल्पज्ञत्वादिविशिष्ट अर्थ श्रुत होता है। 14. बहुलग्रहण का फल क्या है? सरलार्थ - हे मित्रावरुणतुम विशेषदेह के प्रकाश को बढ़ाने वाले हो। पुत्र नीचे था। अथवा स्वृ (शब्दोपानापयोः) इससे ण्यत् करने पर स्वर्यम् यह रूप बनता है। निर्विकल्पक समाधि में तथा सुषुप्तिमूर्छादि में भेद होता है। अग्नि-आदित्य-वायु-शुक्र-ब्रह्म-ओंकार आदिरूप से उस प्रजापति की व्याख्या प्रसिद्ध रूप से की गई है। वायु जैसे आती है वैसे ही चली जाती है। विश्वः देवः यस्य इति विग्रह में विश्वदेवः रूप सिद्ध होता है। पक्षी आकाश में बहुत दूर से उडते हुए आराम से विश्राम के लिए जैसे अपने पिंजरे में प्रवेश करते हैं वैसे ही जीव भी अन्य जगह स्थित दो अवस्थाओं में अपने कर्मों से संतुष्ट होते हुए भी विश्राम के लिए सुषुप्ति को प्राप्त करते हैं। प्राचीन धर्म, समाज, व्यवहार आदि के विषयों का ज्ञान वेद में ही किया जा सकता है। इसलिए इस जगत में जीवन्मुक्त की प्राप्ति होती है। एक ही विषय में लम्बे समय तक रुका नहीं जाता है। उसी प्रकार से आनन्दमय कोश के अंदर जो आत्मा होती है। अष्टाध्यायी के तीसरे अध्याय में और छठे अध्याय में सूत्रों की आलोचना है। सुराजन् से राजाहःसखिभ्यष्टच् '' इससे टच् प्राप्त होता है। उसने वज्र को स्वीकार करके मेघों में पहले मेघ को मारा। अथवा क्षत्रियबलों को, असीमित खम्भे वाले यज्ञ भव को, जाने के लिए रथ को स्वीकार करते है। 6 चित्त के विपक्ष का वर्णन कीजिए? पहले अध्याय के आरम्भ में ओंकार उपासना दिखाई देती है। उपासना विदारूप होती है। और अन्तिम में प्रार्थना है - श्रद्धा श्रद्धापेय ह नः। तृजकाभ्यां कर्त्तरि इस सूत्र का तृचा निषेध होने पर कौन सा उदाहरण है? प्रकारपाठ में प्रत्यय स्वर की चर्चा की गई है। कर्मणि च'' ( 2.2.18 ) सूत्रार्थ-उभयप्राप्तौकर्मणि उससे विहित षष्ठी में उस सुबन्त का सुबन्त के साथ समास नहीं होता है। चकार - कृ-धातु से लिट् प्रथमपुरुष एकवचन का यह रूप है। मेरी वाणी को सुनो। इसलिए जगत का शासन करते हैं। यहाँ अहं पद से आत्मा विविक्षित होती है। एक अध्यापक अङ्कित बहुल पत्र दे सकता है। सूत्र का अर्थ- शेष नित्यादि द्वित्व पर में अर्थ है। इस सूत्र से षष्ठीतत्पुरुषसमास का निषेध होता है। इष्टियाग्य काम्यानुष्ठान की क्या विशेषता हे? वह ही अपने आधारभूत योग्य भूमिभाग का निर्माण करता है। सूत्र की व्याख्या- संज्ञा- परिभाषा- विधि- नियम अतिदेश अधिकार छः प्रकार के पाणिनीय सूत्रों में यह विधिसूत्र है। समधष्ट्य ज्ञानोपहित चैतन्य ईश्वर होता है। इस प्रकार की अग्नि के समीप यज्ञ कर्ता जाता है। यहाँ संख्या पूर्व: द्विगुः ये दो पद प्रथमा एकवचनान्त है। शुभ शुम्भ- दीप्तौ इस धातु से क्विप् -प्रत्यय करने पर शुभ् -शब्द निष्पन्न होता है। वेद धर्म निरूपण करने में स्वतन्त्र भाव से ही प्रमाण किया जाता है। जन् -धातु से लिट् लकार प्रथमपुरुष एकवचन में। इस प्रकार के प्रमेय से असम्भावनाएँ दूर हो सकती हैं। 24. कोश नाम किसलिए योजना की जाती है? 2. द्विगुश्च इस सूत्र का क्या अर्थ है? इसी प्रकार स्वधा, वषट्, पम्, तथहि इत्यादि को निपात के आदि स्वरों में उदात्त करने का विधान है। न तत्र रथा रथयोगानपन्थानो भवन्त्यथ रथयोगान् पथः सृजते - (बृह. ४. ३. १०) स्वप्नस्थ विषय जाग्रतकाल के समान परमार्थ नहीं होते हैं फिर भी वे मिथ्या होते हैं। उसके बाद आत्मप्रकाश होता है। मुख्यार्थ का विरोध होने पर मुख्यार्थ से सम्बन्धित जो अर्थ श्रुत नहीं है, उसका अश्रुत अर्थ भी लक्षणा है। सूत्र अर्थ का समन्वय- पचति गोत्रम् यहाँ पर तिङन्त से परे गोत्र शब्द विद्यमान है। होता है यह तात्पर्य है। वहाँ रुककर के ब्रह्मचर्य का पालन करके वेदाङ्गों से लेकर के वेदों के अध्ययन को ही विधिवत् करना चाहिए। इससे सुब्रह्मण्यायाख्य निगद जानना चाहिए। यह सूत्र द्विपदात्मक है। जो अपनी सम्पत्ति को अपने लिए ही प्रयोग करता है वह पाप को खाता है - मोघमन्नं विन्दते अप्राचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत् स तस्य। यद्यपि सभी वेदान्त सम्प्रदाय उपनिषदों को ही प्रमाण के रूप में स्वीकार करते हैं, फिर भी उपनिषद् व्याख्याओं में उनका सूक्ष्म रूप भेद ही रहता है। ब्राह्मण द्रष्टा दो आचार्यो के नाम लिखिए। इस अवसर पर शाकपार्थिवादीनां सिद्धये'' उत्तरपद का लोप विधायक वार्तिक भी प्रस्तुत किया गया है। शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान नियम होते हैं। अग्नि ने दैत्यों का विनाश किया इस प्रकार की कीर्ति का भी वर्णन कुछ लोग करते हैं। वस्तुतः चैतन्य ही अज्ञान का नाश करता है। 79. अनश्च'' इस सूत्र का क्या अर्थ है? महाभारत के आदि पर्व अनुसार से (६३/१८) शकुन्तला के पालक पिता कुलपति काण्व का आश्रम मालिनी नदी के तट पर था। इस विषय को इस पाठ में आलोचित किया जाएगा। सूत्र व्याख्या-यह विधिसूत्र है। कारण यह है कि गङ्गा तथा घोष में आधार आधेयभाव सम्बन्धरूप मुख्य अर्थ का विरोध है। घटादि में ब्रह्मा अध्यस्त है। उसकी बुद्धि को मैं ऋषियों के समान बना देती हूँ। संसार में सभी माया से ही युक्त संसारचक्र में बार बार आ रहा है माया का वह आवरण ज्ञान के द्वारा भस्मकरकर उसकी नित्यशुद्ध बुद्धि मुक्त स्वरूप ज्ञान को आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठापित करता है जो साधनमार्ग है वह ही ज्ञानयोग कहलाता है। आरण्यक के मुख्य प्रतिपाद्य विषयों का केवल यज्ञ ही नहीं, अपितु यज्ञ-यागों के अंदर आध्यात्मिक तथ्य की भी विवेचना है। और, अहि वृत्र पृथिवी पर हमेशा सोये हुए या काट दिये हुए वृक्ष के समान भूमि पर गिरे। तिसृभ्यः यह पञ्चमी बहुवचनान्त पद है, जसः यह षष्ठी एकवचनान्त पद है। उस प्रकार के माया के द्वारा आधार होने से सङ्ग भी ब्रह्म ही सभी की उत्पत्ति करता है। वेद में सलील शब्द के स्थान में किस शब्द का प्रयोग मिलता है? लेकिन वेदसिद्धान्तविरोधी तर्क नहीं है, अपितु इसलिए भगवान् भाष्यकार ने कहा है- श्रुत्यनुगृहीतः एव ह्यत्र तर्कानुभवाङ्गत्वेन आश्र्रियते' इति। प्रारब्ध के कालान्तर मर जाता है। यदि निश्चय किया जाए तो श्रवणादि साधनों का व्यर्थता हो सकता है तथा यदि संशय कहा जाए तो संशयात्मक ज्ञान से वैराग्य का उदय नहीं हो सकता है। कौथुमीय शाखा विषय पर टिप्पणी लिखिए। और उसको वहाँ से नीचे हटा दो। कर्मकाण्ड में नित्यनैमित्तिककाम्य भेद से तीन प्रकार के कर्मवेदों में कहे गये हैं। असम्प्रज्ञात समाधि में तो चित्तवृत्तियों का तिरोभाव होता है। ज्नित्यादिर्नित्यम् इस सूत्र से आदि इसकी अनुवृति आती है। इसी प्रकार इस पाठ में सामान्य रूप से रस के अभिव्यक्त के विषय में, अलङऱकार के निरूपण और प्रकृति वर्णन के विषय में आलोचना की है, तथा अन्त में वेद प्रमाण के विषय में विस्तार से आलोचना की है। वेदान्त सार के प्रकरण ग्रन्थ में जीवन्मुक्त के लक्षणों की विस्तार से आलोचना की है। कविन्द्रचार्य की सूची से। वहाँ विद्वानों का मत है - ओषध्यः पशुवो वृक्षास्तीर्याञ्चः पक्षिनस्तथा। वहाँ अनुदात्त स्वर बोध के लिए सङ्केत: यह शब्द स्वीकार किया जाता है। पर्जन्यसूक्त का ऋषि कौन है? इस पाठ में हम आरण्यकों के विषय में प्रारम्भिक भाग में विस्तार से जानेंगे। उसको दूर करने के लिए अनेक प्रकार के उपायों का वर्णन इन मन्त्रों में है। नामन्त्रिते समानाधिकरणे सामान्यवचनम्'इस सूत्र से समानाधिकरणे आमन्त्रिते इन दो सप्तमी एकवचनान्त पदों की अनुवृति आ रही है। अपूर्वम् इसका अर्थ पूर्व विद्यमान नहीं है। इसलिए देह आत्मा का नहीं होता है। "छान्दोग्यवत्सूत्राणि भवन्ति" इस भाष्यवचन से सुपां सुलुक् '' इस सूत्र से तृतीया एकवचन का लोप होने पर तत्कृत सूप प्राप्त होता है। 6 वस्तु तथा अवस्तु में आरोप अध्यारोप होता है। अतः शस्त्रीश्यामा यहाँ पर शस्त्री यह अन्तोदात्त ही रहता है। सूत्र का अर्थ- च, वि, ह, अह और एव इस तिङन्त में अनुदात्त नहीं होता है। १४॥ अन्वय - नाभ्याः अन्तरिक्षम् आसीत् शीर्ष्णः द्यौः समवर्ततः, प॑ब्द्यां भूमिः, श्रोत्रात् दिशः, तथा व्याख्या - जैसे प्रजापति के मन से चन्द्रमा की रचना हुई, वैसे ही अन्तरिक्ष आदि लोकों को देवों ने भी प्रजापति की नाभ्य आदि से उत्पादन किया। अथर्ववेद के उपलब्ध अनेक नामों में अथर्ववेद, ब्रह्मवेद, अङिगरवेद, अथर्वाङिगरसोवेद, इत्यादि प्रमुख नाम है। मानव जाति की समस्याओं का समाधान संघ की शक्ति में अवस्थित है, अकेला मनुष्य दुर्बल और स्वार्थी हो जाता है। वहाँ याग विषय पर अंक का विवेचन प्रस्तुत किया जाएगा। पीसे हुए घी उसका प्रिय भोजन है। पौर्वशालः यहाँ पर किस अर्थ में क्या तद्धित प्रत्यय है? इस प्रकार से तीनों वृत्तियों के द्वारा यह आनन्दमय कोश प्रसिद्ध है। पूर्वपाठ में साधनों का सामान्य रूप से निरूपण किया गया है। उन इन्द्रिय विषयों से सामीप्य लेकर के कह सकते हैं की जीव जब सुख दुःखों का अनुभव करता है तब ही जीव जागृत हो जाता है। एक मिट्टी के पात्र में पशु के अङगशामित्र के प्रवेश के बाद अग्नि कुण्ड में पकाना। गायों की स्तुति में प्रयुक्त एक सम्पूर्ण सूक्त (१०.१६९) वैदिक और आर्यों की गाय के प्रति भावना को सुन्दर रूप से प्रकट करता है। यतः यह षष्ठी एकवचनान्त शब्द है। सूत्र की व्याख्या- संज्ञा- परिभाषा- विधि- नियम अतिदेश अधिकार सूत्रों में यह विधिसूत्र है। आत्मनः पुत्रम् इच्छति इस विग्रह में सुपः आत्मनः क्यच् '' इस सूत्र से पुत्र अम् इस द्वितीयांत से क्यच् होने पर पुत्र अम् क्यच् होने पर पुत्र अम् क्यच् इस समुदाय का क्यच् प्रत्यय होने पर सनाद्यन्ता धातवः'' इससे धातु संज्ञा होती है। अपनी माया से समस्त अजायमान संमोहित होते हुए स्वयं को बहुत सारा उत्पन्न करता है। प्र वाता वान्ति पतयन्ति विद्युतः उदोषधीर्जिहते पिन्वते स्वः। श्रेष्ठता साधने के लिए वाणी और मन में झगड़ा हुआ। राजाह: सखिभ्यष्टच् '' इस सूत्र से टच् के प्रथमान्त की अनुवृत्ति होती है। किन्तु बाह्य द्रव्यों के अभाव से हवि रहित यज्ञ के असम्भववत्व से और पुरुष स्वरूप से देवों ने हवि से मानसयाग करके कहा - यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत' इति। उदात्तेन एकादेशः उदात्तः यह पद का अन्वय है। इन्द्र की महानता विशाल है। और ज्योति आदि ने तीनों यज्ञों में स्ननीय सोम को पिया। और उसका अन्त वर्ण ह्रस्व अकार है। प्रपञ्चहृदय, चरणव्यूह, सायणभाष्य आदि के उपोद्घातों में शाखाओं की संख्या। हलन्त्यम् सूत्र से पकार की इत्संज्ञा होती है। नद्यजादी यह प्रथमा द्विवचनान्त पद है। व्याख्या - हे श्रद्धा घी पुरोडाश आदि देने वाले यजमान के प्रिय अभीष्टफल को पूर्ण करो। सूत्र की व्याख्या- यह विधिसूत्र है। पुरुष के शिर से कौन उत्पन्न हुआ? श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततो मतः इस प्रकार बहुत जगह श्रद्धा की स्तुति भी प्राप्त होती है। पूर्वपद सामर्थ्य से उत्तरपद के द्वारा इस पद का अध्याहार किया गया है। 2 प्रजापति सृष्टि के लिए कामायमान होता है। विष्णुपद का अन्य अर्थ होता है क्रियाशील। अलङकृत वर्णन में किसका मानवीकरण हुआ? इस पृथिवी से ऊपर है। इसलिए अर्थवाद में होता है ऐसा जैमिनि मुनि का मत है। प्रायोगिक रूप से कुछ भी नहीं होता है। इन दोनों उदात्त अनुदात्त के स्थान में एकादेश हुआ। केवल धर्ममूल होने से ही वेदों का आदर नहीं किया जा सकता है, अपितु विश्व का सबसे प्राचीन ग्रन्थ होने से और उच्च तत्त्वों का निरूपण करने से आदर विशेष को हमे हमेशा प्राप्त करना चाहिए। उदाहरण -इस सूत्र का उदाहरण नीचे दिये गये हैं। उससे इस सूत्र का अर्थ होता है - संज्ञा में उपमान शब्द का आदि अच् उदात्त होता है। 6. यङश्चाप् सूत्र से क्या विधान है? सचस्व - सच् -धातु से आत्मनेपद में लोट मध्यमपुरुष एकवचन में सचस्व यह रूप बनता है। उदाहरण -पुरुष व्याघ्रः इत्यादि इस सूत्र का उदाहरण है। इस प्रकार से वह सृष्टि पर आक्रमणा करता है। यह प्रपाठक आरण्यक का परिशिष्ट भाग है। सरलार्थ - जो पृथिवी का स्रष्टा है, जो जगत का धारक है और जिसने इस समस्त लोक को बनाया है। अकार्य के द्वारा निःश्रेयस कर्मसाधनत्व की अनुपपत्ति होती है। सहस्रार चक्र मस्तिष्क में होता है। उन दोनों में अन्यतम सम्बन्ध होता है। उन्होंने शब्द प्रमाण से वेद का अस्तित्व बताया। धातु को जब द्वित्व होता है, तब द्वित्व हुआ धातु अभ्यस्त संज्ञक होता है। अग्निना रयी... इत्यादिमन्त्र की व्याख्या करो। विवेक मन से होता है। तृणधान्यानां च द्वयषाम् इस सूत्र की व्याख्या कोजिए। विष्णुपुराण के अनुसार से पथ्य के तीन शिष्यों के नाम क्रमश जाबालि, कुमुद, और शौनक ये तीन नाम थे। 6 ब्रह्मस्वरूप की अपेक्षा से यह जगत लघु होने से। शाकल्य के अनुसार कितने मन्त्र हैं? ऋग्वेद के एक सूक्त में ( ऋग्वेद ७/८६ ) उसने अपने आराध्य देवता वरुण को वशिष्ठ की विनम्रता प्रकट की। अन्य जगह वर्तमान अनुप्रसक्त कुछ विषयों के लिए जानना चाहिए। दीदासतः - दा-धातु से सन् और शतृप्रत्यय करने पर दीदासत् प्रातिपदिक बनता है। इसलिए इस तेज के अंदर प्रज्ञा भी होती है। सूत्र अर्थ का समन्वय- ज्येष्ठ आह चमसा यह प्रयोग वेद में प्राप्त होता है। 1 सञ्चित क्या होता है तथा प्रारब्ध क्या होता है? ब्रह्म ही प्रतिपाद्य वस्तु है ऐसा दिखाने के लिए नौ बार कहा गया है। दुःख का उपाय अनिष्ट होता है। उसका नाम शतपथ ब्राह्मण है। 37. अव्ययीभावश्च'' इस सूत्र से क्या विधान होता है? इस सूत्र से चाप् प्रत्यय का विधान होता है। और वह आकाश का वज्र है। माया उस आवरण ज्ञान से भस्म होकर स्वयं ही विवेकानन्द वेदान्त भगवान को प्राप्त करती है। समृद्धि अर्थ में अव्ययीभाव समास का उदाहरण है समुद्रम् । सुबन्त का विशेषण से द्वितीया का तदन्तविधि में द्वितीयांत सुबन्त को तत्पुरुष समास होता है। विश्व ही वैश्वानर होता है। 2. यजुर्वेद का महावाक्य क्या है? 25. स्वाध्याय प्रणव के जप तथा उपनिषदों की आवृत्ति है 26. मानस के उपचारों से ईश्वर का अर्चना ही ईश्वर प्रणिधान कहलाती है। सुख दुःखों से जिसका मन विषाद पूर्ण नहीं होता है। किसको अग्निहोत्र की आवश्यकता थी? इसके बाद शरदादिगण से शरद् शब्द पढ़ा गया है। फिर भी जिस विषय की विशेषता के द्वारा जिज्ञासा उत्पन्न होती है उसका सामान्य ज्ञान अधिकारी का ही होता है। 25.3 ) अङ्गभूतों का धारण, ध्यान तथा समाधि के भेद विषयों से निवर्तन करके अद्वितीय वस्तु में चित्त का स्थापन करना ही धारणा कहलाती है। और बाद में चिद शब्द है। दृष्टान्त में रज्जु ही वस्तु थी। क्रियाकारकफलभेदबुद्धि अविद्या के द्वारा आत्मा में दैनिक प्रवृत्ति होती है मम कर्म, अहं कर्ता, इनका फल कर्म करती हूँ। इसके बाद समास विधायक सूत्र में तृतीया इसका प्रथमा निर्दिष्ट होने से उससे बोधित शङकुला टा इसकी उपसर्जन संज्ञा होने से पूर्वनिपात में शङकुला टा खण्ड सु होता है। तैजस का स्थान स्वप्न होता है। इतना संचित प्रारब्धत्व के रूप में परिणित होता है। अधिष्ठान के रस्सी के अंश का अज्ञान ही सर्प की प्रतीति का कारण होता है। पासों से खेलने से जुआरी को क्या होता है? कृणुध्वम् - आत्मनेपद कृधातु से लोट मध्यमपुरुषबहुवचन में। सरलार्थ - इन्द्र को मारने के लिए जब शक्ति वृत्र ने प्रयुक्त की तब वह सब विफल हो गये। ग्रन्थ वाचक ब्राह्मण शब्द विशेष रूप से नपुंसकलिङ्ग में प्रयुक्त होते हैं। यह सभी अच्छी प्रकार से जानते हैं, और सभी जानते हैं की सुख सुंदर कर्मों के अनुष्ठान से ही प्राप्त होता है। नञ् तत्पुरुषः, कुतत्पुरुषः, गतितत्पुरुषः, प्रादितत्पुरुषः और उपपदतत्पुरुषः। सूत्र व्याख्या-यह विधायक सूत्र है। इस सूत्र का उदाहरण है अक्षशौण्डः। अतः इस सूत्र का अर्थ होता है - उपमेय सुबन्त को उपमान व्याघ्रादि समानाधिकरण सुबन्त के साथ विकल्प से समास होता है साधारण धर्म का अप्रयोग होने पर तत्पुरुष संज्ञक होता है। यहाँ भूतकाल में होना चाहिए इस प्रकार की विवक्षा नहीं है। देव शब्द को तल् प्रत्यय करने पर देवता रूप बना। इसलिए कहा जाता है कि - लक्षण तथा प्रमाण के द्वारा ही वस्तु सिद्ध होती है। प्रजापति के मुख से ब्राह्मण का और अग्नि का भुजाओं से क्षत्रिय का और इन्द्र का, मध्यदेश का वैश्य का और विश्वदेव का, पाद से केवल शूद्र की ही उत्पत्ति बताई और शूद्र का भी कर्तव्य निर्देश किया - तस्मात् शूद्र उत बहुपशुरज्ञियो विदेवो हि। अकल्पयन् - क्लृप् -धातु से लड लकार प्रथमपुरुषबहुवचन में यह रूप बनता है। उसका अभाव ही अस्तेय कहलाता है। हे मनुष्यों, सम्पूर्ण जगत में मुखविशिष्ट अर्थात् जिस विषय के बारे में कोई भी नहीं जान सकता है उसी प्रकार शक्ति सम्पन्न वो परमात्मा प्रत्येक पदार्थ में व्याप्त होकर के रहता है। जो कृतक होता है वह अनित्य होता है इस प्रकार का नियम किया गया है। स्वर्यम् - सुपूर्वक ऋ-धातु से ण्यत् करने पर स्वर्यम् यह रूप बनता है। तब एक को छोड़कर अन्य शब्द अनुदात्त होते हैं, उस एक अच् किस प्रकार का हो सकता है यह शङ्का उत्पन्न होता है। अहं स्वे पितरमस्य... इत्यादिमन्त्र की व्याख्या करो। 1. ऋग्वेद में। स्मृति ग्रन्थों में इस अंश का पर्याप्त रूप से वर्णन है। पूजा विषय भी यहाँ पर प्राप्त होता है, अतः प्रकृत सूत्र से तिङन्त को अनुदात्त नहीं होता है। इनके प्रधान कार्य है सभी कार्यो की अच्छी प्रकार से निरीक्षण करना तथा होने वाले दोषों को दूर करना। उसके बाद गोपाय धातु से लोट् लकार मध्यमपुरुष एकवचन में थस् प्रत्यय करने पर गोपायथस् इस स्थिति में गोपाय धातु से शप् आदेश होने पर अनुबन्ध लोप होने पर गोपाय अ थस् इस स्थिति में शप् के अकार को अनुदात्तौ सुप्पितौ इससे अनुदात्त स्वर होता है। प्रय आ रुः यहाँ पर ङये' यह यद् -शब्द का प्रथमा बहुवचन है, और वह फिषोऽन्त उदात्तः' इस सूत्र से अन्तोदात्त है। अज शब्द प्रातिपदिक है। शरीर के अवयव ही अङ्ग कहलाते है। और वह समास अव्ययीभाव संज्ञक होता है। ग्नि यहाँ पर इकार उदात्त है। 53. "द्वन्द्वे घि" "अजाद्यन्तम् " "अजाद्यन्तम् " "अल्पाच्तरम् " ये सूत्र हैं। वैसे ही आत्मा उपाधि से युक्त होने पर भी स्पष्ट रूप से प्रकाशित नहीं होती है। चित्त की मलिनता किस प्रकार से होती है। उपनिषद्, इस शब्द का अर्थ रहस्य है। इस प्रकार से इन्द्र से प्रजापति ने प्रार्थना की है। यहाँ कृ धातु से ण्वुल् तृचौ सूत्र से ण्वुल् प्रत्यय होने पर चुटू सूत्र से णकार की इत्संज्ञा होने पर लकार की हलन्त्यम् सूत्र से इत्संज्ञा होने पर तस्य लोपः सूत्र से दोनों इत्संज्ञकों का लोप होने पर कृ वु होता है। सूत्र की रचना- सुगन्धितेजन शब्द का आदि और दूसरा स्वर, और ते शब्द के स्वर विकल्प से उदात्त विधान के लिए इस सूत्र की रचना की है। वहाँ पर अभिमान ही कारण होता है। और यहाँ प्रेम विषय पर और विवाह विषय पर विविध सूक्त प्राप्त होते हैं। समाहार के अर्थ में जो द्वित्व होता है वह एकवचन में होता है यह अर्थ है। वेद की सत्ता किसके द्वारा प्रतिपादित की जाती है? प्रकरण के प्रतिपाद्य विषय जो उन स्थलों में है उन स्थलों में श्रूयमाण प्रयोजन फल कहलाता है। दोनों अश्विन कुमार को भी मैं धारण करती हूँ। दर्शन का प्रस्थान परिचय, नास्तिक दर्शन, आस्तिक सर्षण, अद्वैत वेदांत आदि इनका मुख्य विषय है। व्यपदेशिवदभाव से देवी: इस पद की भी आमन्त्रितान्त संज्ञा होती है। तीसरे प्रपाठक में चार होताओं के चित्त में उपयोगी मन्त्रों का सङ्ग्रह है। श्रवण तथा मनन के द्वारा दृढ निश् चित अर्थ में अपने से भिन्न विषयों से मन का स्थैर्य ही निदिध्यासन कहलाता है। अधिकरणवाची का जो क्त प्रत्यय है, तदन्त से षष्ठयन्त सुबन्त का समास नहीं होता है। सुब्रह्मण्यम् सुब्रह्मण्यम् सुब्रह्मण्यम् इन्द्र आगच्छ हरिव आगच्छ॑... वासुदेवस्य पुत्रः पशुपतेः पौत्रो नारायणस्य नप्ता रामभद्रस्य पिता महेन्द्रस्य पौत्रः कमलाकस्य प्रपौत्रो देवदत्तो यजते सुत्याम् - इस प्रकार से निगद में विधान होने से जाना जाता है की मन्त्र में यजमान का नाम ही प्रथमा विभक्ति हो, उस यजमान से पूर्व पुरुषों के नाम षष्ठी विभक्ति हो। उच्चौ: यह पद पाणिनीय सूत्र से प्रातिपदिक संज्ञक नहीं है, अपितु पूर्ववाचकों के द्वारा प्रातिपदिक कहा गया है। संशय किस प्रकार से होता है। तद्धित अर्थ द्विगु का उदाहरण है पौर्वशालः। तीन पद वाले इस सूत्र में विशेषणं यह प्रथमा एकवचनान्त पद है। और छन्दसि च इस सूत्र से दक्षिण शब्द का आदि और अन्त उदात्त होता है। शीतोष्णसुखदुःखरूपों के व्यत्यय होने पर भी ये समान होते हैं। ताण्ड्य ब्राह्मण के दो तीन दृष्टान्त ही पर्याप्त है। दैवम् - देवशब्द से अण्प्रत्यय करने पर प्रथमा एकवचन में दैवम् रूप बनता है। षष्ठी इससे षष्ठी इस पद को न निर्धारणे इसकी अनुवृत्ति होती है (निषेध) क्तेन च पूजायाम् इससे क्तेन पद की अनुवृत्ति होती है। यहाँ पीतशब्द से और अम्बरशब्द से ही समास होने से विग्रह दर्शन से यह अनित्य समास है। अन्यथा स्वर्गफल के उपभोग के लिए अग्निहोत्रादि के कर्म आरम्भ जन्म में नरकफल के उपभोग की अनुपपत्ति होनी चाहिए। वहाँ पर रजोगुण तथा तमोगुण के द्वारा जब चित्त शुद्ध होता है। इससे दो अचों वाले विशिष्ट तृण और धान्य शब्दों का आदि स्वर उदात्त होता है। जैसे दर्पण के क्षय होने पर दर्पण में दिखाई देने वाला मुख प्रतिबिम्ब बिम्ब के साथ अभिन्न दिखाई देता है। 6. धी इसका क्या अर्थ है? विवेकानन्द के दर्शन में वेदान्त का व्यावहारिक प्रयोग अच्छी प्रकार से प्राप्त होता है विवेकानन्द का मत यह था कि शास्त्रों को धीरे धीरे नहीं पढ़ना चाहिए अपितु उनको अपने जीवन में अपनाना चाहिए। इस प्रकार से मन शुभसङ्कल्प वाला हो। उदाहरण - अब्राह्मणः इत्यादि इस सूत्र का उदाहरण है। सरलार्थ - हे मरुत, अन्तरिक्ष से हमारे लिए जल प्रदान करो। सूत्र में "प्रत्ययः", "परश्च", "तद्धिताः" "समासान्ताः" ये अधिकृत सूत्र हैं। इनमे श्रद्धा अवश्य होनी चाहिए। उचित ज्ञान होने पर वह अविद्या नष्ट हो जाती है। 12. ब्रह्मचर्य किसे कहते हैं? कर्मज्ञान भक्ति तथा राजयोग का समन्वय उसी का इष्ट ही होता है। मित्रावरुण, इन्द्र अग्नि, सूर्यचन्द्रमास, द्यावापृथिव्यौ, अग्निशोमौ-इत्यादि कुछ देवों के नाम दन्द्व समास के द्वारा हमेशा प्रसिद्ध है। यदि एक घट का सतत ज्ञान होता है तो वह सतत घटविषय चित्तवृत्ति होती है। अखण्डाकार चित्तवृत्ति भी अज्ञान के कार्य के द्वारा विनष्ट होती है। पद्यों के पढ्ने में अभिरुचि किस प्रकार से उत्पन्न होती है? उसका द्वितीया एकवचन में उर्विम रूप बना। जैस कहा गया है- न जातु कामः कामाणामुपभोगेन शाम्यति। 3. प्रमाणगत असम्भावना से निवर्तक क्या होता है? अतः इस वार्तिक से षष्ठयन्त से विहित पद के अन्त्य का उदात्त स्वर का विधान है। इसी प्रकार माषा: इस पद में भी दोनों अच् है। इसलिए सुषुप्ति युक्त पुरुष जीवन्मुक्त नहीं कहलाता है। इस प्रकार से अज्ञानावशगत जीव चैतन्य शुद्धचैतन्यरूप से ब्रह्मचैतन्य के साथ एकात्मभाव को प्राप्त करता है। बालकों के शौल समय में, किशोर को गोदान करने के समय (प्रथम क्षौर कर्म में) तथा उपनयन संस्कार में इस मन्त्र का उपयोग होता है। तेरहवां पाठ समाप्त ॥ इस प्रकार से महाभाष्य आदि आकार ग्रन्थों के द्वारा जाना जाता है। जैसे - अधिकांश संहिता छन्दोबद्ध है। वह ही भोग काल में कुछ अनुभव किया जाता है। इसी ही कारण से अथर्ववेद का अन्य नाम भी 'क्षत्रवेद' है। इस सूत्र से उदात्त स्वर का विधान है। लेकिन वृद्धावस्था में तो शरीर सुन्दर नहीं होता है। ब्रह्म के विना अज्ञानकार्यभूत सभी अवस्तु ही होती हैं। इसके बाद यचिभम् '' इससे पूर्व प्रतिसामन् का भसंज्ञा होने पर नस्तद्धिते इससे टि का अन् लोप होने पर प्रति साम् अ होने पर सर्वसंयोग होने पर निष्पन्न प्रतिसायशब्द का परवल्लिङ्ग द्वन्द तत्पुरुषोः'' इससे परे लिङगत्व होने से नपुंसक में सु प्रत्यय होने पर प्रतिसामम् रूप बना। मत्स्य पुराण का कथन है - पुरोहित अथर्व मन्त्र में और ब्राह्मण में निपुण होना चाहिए। सूर्योदय के अभाव में आहुति निष्फल हो जाती है। हिंसा कही पर भी नहीं होती है। इस विचार का समर्थन करते हुए युक्ति भी करते हैं की यदि देवों के अलग अलग शरीर होते तो, एक ही क्षण में भिन्न-भिन्न यज्ञों में एक साथ उपस्थित नहीं हो पाने होते। 10. महिना का लौकिक रूप क्या है? यहाँ अग्नि की स्तुति की गई है। कर्म के द्वारा कर्मनाश किया जाता है। पशु इस याग का आहुति द्रव्य है। 8. बभूव यहाँ पर भू- इसमें क्या स्वर है? अनिन्द्रियशम दमादि के संस्कृत से शुद्ध मन से ब्रह्म प्रत्यक्ष होता है। अथवा यजमान के सम्मुख अग्नि स्तुत है। 20. वेदान्त उक्त प्रयोजन के लाभ का अधिकारी कौन होता है? वृत्तिस्वरूप और उसके भेदों का वर्णन कीजिए। बंहिष्ठम् - बंहिष्ठशब्द का द्वितीया एकवचन में बंहिष्ठम् रूप है। तद्धित परे होने पर नान्त भसंज्ञक की टि संज्ञा का लोप होता है। जहत् लक्षणा, अजहत् लक्षणा तथा जहत् अजहत् लक्षणा। यहाँ पर शक्यार्थ के अनन्तर्भाव्य ही अर्थान्तर प्रतीति होती है यही जहत् लक्षणा है। शेषो बहुव्रीहि यहाँ पर अधिकृत करके विहित समास तत्पुरुष संज्ञक होता है। 10. मानवों के अन्तः करण कितने दोष होते हैं तथा वे कौन-कौन से हैं? वे ऋग्वेद में प्रसिद्ध देव की स्तुति के लिए इच्छित साधन को प्राप्त करने के लिए देव से प्रार्थना करते हैं। उससे जातिवाचकात् अनुपसर्जनात् अञन्तात् यह अर्थ होता है। श्रेणिकृताः यहाँ पर कर्मधारय समास स्वीकार करते है तो पूर्वपद को प्रकृतिस्वर होता है। यहाँ समास में एक से अधिक पद होते हैं जहाँ प्राय सभी पदों का अन्त एक ही विभक्ति होती है। यहाँ अतः यह पद अव्ययीभाव से इसका विशेषण है। यहाँ दो पक्षियों के द्वारा जीवात्मा-परमात्मा की तुलना की गई है। एना यह रूप कैसे सिद्ध होता है? इस सूत्र में तीन पद है। इस वेद से सम्बद्ध जो उपनिषद्, वह किसी भी आरण्यक का अंश नहीं होकर प्रारम्भ से ही स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में विद्यमान है। इसलिए सायणाचार्य ने उस प्रकार की व्याख्या की है। ग्रन्थवाची ब्राह्मणशब्द का विशेषरूप से नपुंसकलिङगों में प्रयोग होता है। कुछ विभक्ति के अन्तर में भी समास होता है। ( 9.2 ) डाबुभाभ्यामन्यतरस्याम् ( 4.1.13 ) सूत्रार्थ-मन्नन्त प्रातिपदिक से अन्नन्त बहुव्रीहि संज्ञक से और प्रातिपदिक से स्त्रीत्व द्योतक होने पर विकल्प से डाप् प्रत्यय होता है। उसमें कहते है - पुरं शरीरं तस्मिन् शेते इति पुरुषः। इसलिए श्रुति में कहा गया है कि पूर्व में भी यह ही था तथा है भी। घटमध्यर्थ आकाश भी महाकाश का ही अंश है। प्रजापतिः प्रजाया संरराण स्त्रीणिनोतींषि सचते स षोडशी॥ ५ ॥ उन सभी के कारण ही सम्पूर्ण भुवन में व्याप्त हूँ। और इसके बाद अज् आ यह स्थिति होती है। इस पाठ में श्रद्धासुक्त के पांच मन्त्रों को लिखा गया है। तत्क्ष - तक्ष् -धातु से लिट् प्रथमपुरुष एकवचन में तत्क्ष यह रूप है। लेकिन धर्मजिज्ञासा के बिना ही ब्रह्मजिज्ञासा सम्भव होती है। सूत्र अर्थ का समन्वय- आङ पूर्वक अश् -धातु से कर्ता में क्त प्रत्यय करने पर आशितम् रूप निष्पन्न होता है। पुत्र शोक से सन्तप्त होता है। उन चारों के योग का समन्वय अत्यन्त प्रसिद्ध है। जगत में कोई भी वस्तु सम्पूर्ण रूप से जड नहीं होती है, क्योंकि चेतन शक्ति सभी जगह फैली हुई है। वहाँ स्याप्रत्यय होने पर भी सुप् सिद्ध होता है। मानस याग को निष्पादित किया ऐसा जाना जाता है। उदाहरण -इस सूत्र का उदाहरण है जैसे मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ होते है। ऋग्वेद आदि तीनो वेद थोड़ा फल देते है। 'पातृतुदिव...' इस स्थक् व्याकरण शास्त्र के प्रमाण भूत आचार्य पतञ्जलि ने व्याकरण शास्त्र के ऊपर निर्दिष्ट प्रयोजनों का वर्णन किया है - चार सींग', चार शब्द'', उतत्वः' सक्तुमिव', सुदेवो असि' - इत्यादि में मन्त्रपञ्चक उदाहरण हैं। अर्थात् इन्द्रियाँ हमेशा शब्दों के द्वारा विषयों में होती है। इस सूत्र में दो पद हैं। तत्पुरुषः इस सूत्र से प्राक् अव्ययीभावः पद आता है। पञ्चदशी कारर मत में तत्व पदार्थ का निरूपण विद्यारण्य स्वामी ने पञ्चदशी में महावाक्य विवेक प्रकरण में कहा है - एकमेवाद्वितीयं सन्नमरूपविवर्जितम् इति। विक्षेप होने पर एकाग्रता नहीं होती है। एवं ब्रह्मविद ब्रह्मೈव भवति' (मुण्डकोपनिषत् 3.2.1) तृती शोकं आत्मविद्'(छान्दोग्योपनिषत् 7.1.3)। जैसे - अधविदासीदुपरिविदात्'( ऋग्वेद १०-१२९-५) वह नीचे था और ऊपर भी था। इसलिए वह प्रमाद को धेर होकर साधन से विचलित नहीं होना चाहिए। इसके बाद उपसर्जन संज्ञा के साथ पूर्व निपात में सह हरि ङस् ऐसा होने पर समास का प्रातिपदिक होने पर उसके अवयव सुपः ङस्: लुकि सहरि पद निष्पन्न होता है। चतुर्थी तत्पुरुष का "चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः" यह विधायक सूत्र है। अधिहरि यह रूप सिद्ध करो? यह उपनिषद् की तवाल्कर शाखा के अन्तर्गत आता है। इन उपनिषदों का काल के विषय में अथवा उन दोनों के सम्बन्ध के विषय में जानने के लिए प्राचीन विद्वानों द्वारा प्रायः इनको प्रयोग किया जाता है। व्यधिकरण इसका ही व्यधिकरण यह अर्श आदि के द्वारा अच् प्रत्यय होता है। अपवाद वस्तु में भास मान अवस्थ आदि ज्ञान में प्रपञ्च का वस्तुमात्रत्व होता है। यहाँ युग के अन्त में सृष्टि का ध್ವंस करता है, और पुनः प्राणियों का विवरण प्राप्त करता है। हमेशा मेरा सहायक हो। अक्षसूक्त में कितव नाम का जुआरी अक्षक्रीडा में उदात्त हुआ। इसका विवरण नीचे दिया जाएगा। 7 अपवाद किसे कहते हैं? इसलिए यहाँ पर अजहत् लक्षणा होती है। ब्रह्मेन्द्रियों के चक्षु, कर्ण, नासािका, जिह्वा, त्वक् आदि विषयों का आकर्षण करता है। इस सूत्र में दो पद हैं। छन्दांसि छन्दानात्'(निरु० ७.१९) इस अर्थ की पुष्टि के लिए दुर्गाचार्य का प्राचीन में कहा हुआ वाक्य है। उस कारण से गवामयन याग की प्रकृति अग्निष्टोम है। 2. प्रजापति कौन है? तथा जीवन्मुक्ति भी जगत की यात्रे में बाधक हो सकती है। वृत्र के द्वारा प्रवाहित प्रवाह निरोध का निराकरण किया गया है यह अर्थ है। उदाहरण -इस सूत्र का उदाहरण है शाकप्रति। वह देवदर्श या देवदर्शी इस नाम का उपयोग होता है ऐसा प्रतीत होता है। सूत्र अर्थ का समन्वय- यूपाय दारु इस विग्रह में यूपदारु यह रूप बनता है। लेकिन दन्तोष्ठम् यहाँ उभयप्राधान्य का व्यभिचार है। इस सूत्र में एक पद है। सूत्र की व्याख्या - छः प्रकार के पाणिनीय सूत्रों में यह निषेध सूत्र है। चैतन्य तो प्रकाश स्वरूप होता है तो हमेशा प्रकाशमान रहता है। ७४॥ (विवेकचूडामणिः) अशितस्य अन्नस्य स्थूलमध्यसूक्ष्मभेदेन त्रिधा विभागो ज्ञेयः खाये हुए अन्न को स्थूल, मध्यम, सूक्ष्म तीन भेद से जानना चाहिए। खद्वा आदि पदार्थों के कौन से लक्षण दिखाई नहीं देते हैं? वहाँ प्रक्रिया कार्य में निगदः इस रूप की सिद्धि होती है, यहाँ नि-शब्द का प्रकृति अर्थ है। और वह समास अव्ययीभाव संज्ञक होता है। इस ग्रन्थ में ऋग्वेद के वर्गों और सूक्तों की संख्या निर्धारित है। 6. धारणा ध्यान तथा समाधि का एक ही स्थान में किस प्रकार का अभिधान होता है? इन्द्र के सभी सूक्त त्रिष्टुप् छन्द में निर्मित है। ऋग्वेद दो विभाग में है, एक अष्टाक क्रम और दूसरा मण्डल क्रम। अर्थात् पद के अर्थ का अनुल्लङ्घन होता है। पुरुष सद्भाव के जो कारण सांख्यकारिका में है उनका संक्षेप में परिचय दीजिए अथवा पुरुष बहुत्व के हेतु का विस्तार से विवरण दीजिए। वेदों में ही भावनाओं की स्वाभाविक और सरल अभिव्यक्ति मिलती है। इसके बाद चाप् प्रत्यय के चकार होने पर चुटू सूत्र से इत्संज्ञा होने पर पकार की हलन्त्यम् सूत्र से इत्संज्ञा होने पर तस्य लोपः सूत्र से उन दोनों का लोप होने पर आम्बष्ठय आ स्थिति होती है। और उससे बहुयज्वत् डाप् स्थिति होती है। जिस प्रकार से विद्यारण्य स्वामी ने पञ्चदशी में कहा है- स्वप्रकाशप्रोक्षत्वमयंममित्युक्तो मतम् । 11.4 ) जीवन्मुक्त का आचरण तथा उसका स्वरूप बताकर अब उसके आचरण के विषय में कहते है। इस आरण्यक में ही ऋचाओं का विधान है। लोमादित्व से पुंस्त्व का लक्षण प्रतिफलित होता है। अथवा और, हे तेरे, बाहुभ्याम् - हाथों से नमस्कार स्तुति करता हूँ। तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' (श्वे. उ. 3.8) इस प्रकार से विद्या के द्वारा मोक्ष के लिए अन्य मार्ग बताए गए हैं इस प्रकार से श्रुतियों में कहा गया है। 44. आनन्दमय कोश का उचित स्फुरण कब होता है? फिर भी समीपता से पुष्प की रक्तिमा स्फोट में ही प्रतिबिम्ब के रूप में दिखाई देती है। इन्द्र का शत्रु वृत्र अपने शरीर को जल के मध्य में दीर्घ काल तक गिराता है, दीर्घ अन्धकार के समान, दीर्घ निद्रा के मरण के समान, वह अपने शरीर को गिराता है। इस सूत्र में समर्थ: पदविधिः इस समर्थ पद का अधिकरण किया गया है। यहाँ अन्तेवासी यह भी प्रधान रूप से स्वीकार किया है, आचार्य इसका विशेषण होने से उपसर्जन भाव से कहते है। वे वेदों को धारण करके स्थित है। 18.4.4 ) मनोमयकोश का आत्मत्व निरास देहादियों में अभिमान का कारण जो मन होता है वह मन होता है। समास होने पर प्रकृत सूत्र से राजपुरुष इसका अन्त अकार उदात्त होता है। इस सूत्र में दो पद हैं। 10. वेदान्त के विषय को स्पष्ट कीजिए। उसे किस प्रकार से जाना जा सकता है। वे अध्यासवश से ही आत्मा में आरोप रूप से व्यवहार करते हैं। 19. त्रिपुटी किसे कहते हैं? बहुव्रीहौ प्रकृत्या पूर्वपदम् इस सूत्र से प्रकृत्या और पूर्वपदम् इन दो पदों की यहाँ अनुवृति आती है। यह ही बन्धन होता है जिसके द्वारा जन्म तथा मृत्यु चक्र के समान होती है। 3. श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन ही मोक्ष के उपाय होते हैं? मैं अपनी दसों अगुलियाँ जोडकर तुम्हारे सम्मुख तुम्हें प्रणाम करती हूँ। इसके बाद पूर्वपाठित पाठों में मात्र आदि पाँच समासों का कैसे परीक्षण किया जाए इस पाठ में प्रस्तुत किया गया है। सूत्र की व्याख्या- यह विधिसूत्र है। आहनसम् - आपूर्वक हन् -धातु से असुन्प्रत्यय करने पर आहनसम् यह रूप बनता है। ऋषि सूक्त, देवता सूक्त, छन्द सूक्त, अर्थ सूक्त इस प्रकार से सूक्त चार प्रकार के होते हैं। अखण्डवस्तु के अलाभ से चित्तवृत्ति का जड्यभाव में ही लय हो जाता है। वाष्कल शाखा में एक हजार २५ सूक्त हैं। 360 दिनों से अधिक दिनों में जो याग सम्पादित होते हैं उनकी प्रकृति गवामयन याग है, किन्तु 360 दिनों से कम दिनों में जो याग सम्पादित होते हैं उनकी प्रकृति १२ शाह याग होता है। और जल के बढने पर नाव में बैठे मनु को वह मछली समुद्र से हिमालय की ओर ले जाने लगी। अङ्कुशिनः - अङ्कुशशब्द से इनिप्रत्यय करने पर प्रथमाबहुवचन में। वो परमात्मा या पुरुष ही समस्त जगत् का स्वामी है अन्य कोई नहीं है। आँख के रूप से, कान के शब्द से, नाक के गन्ध से, जीभ के रस से, त्वचा के स्पर्श से आकर्षण करता है जो वृत्तिविशेष से वह दम है। वार्तिक की व्याख्या - यह वार्तिक न सुब्रह्मण्यायां स्वरितस्य तूदात्तः' इस सूत्र में पढ़ा गया है। बाह्यप्रपज्च के अनुभव के अभाव से वह अन्तःप्रज्ञ होता है। सम्भभूव - सम्पूर्वक भू-धातु से लिट् उत्तमपुरुष एकवचन में सम्भभूव यह रूप है। अनुदात्ते पदादौ उदात्तेन एकादेशः स्वरितो वा यह पद का अन्वय है। दिन के सूर्य का नाम मित्र है। सर्वान्यत् यह प्रथमा विभक्ति का एकवचनान्त पद है। मित्रावरुण का सम्बन्ध किसके साथ हे? अथर्व की अन्तिम शाखा चारणवेद्य के विषय में कौशिक सूत्र में वर्णित है। वेदान्तसार में सदानन्द योगीन्द्र ने कहा है- यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रतिहार-धारण-ध्यान-समाधि'' इस प्रकार से और महर्षि पतञ्जलि ने भी योगसूत्र में आठ अङ्ग कहे हैं- यम, नियमासण, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि ये आठ अङग हैं अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि ये आठ अङग हैं। कालक्रम से समगत तत्वविदों के मत में उस प्रकार के दार्शनिक तत्त्वों का समावेश है। पुराणों में आरण्यक के आचार्य के रूप में शौनक का नाम उल्लेखित है - शौनको नाम मेधावी विज्ञानारण्यके गुरुः' (पद्मपुरा० ५/१२/१८) पुराण का यह वाक्य यथार्थ है। लोप, आगम, विकार, प्रकृतिभाव, आख्यान चार प्रकार की सन्धियों के नाम है। प्रकाशमान चैतन्य स्वयं में अध्यस्त घट को प्रकाशित करता है। उस प्रकार का श्रम करने पर ही जीव स्वाश्रयस्थान को सुषुप्ति के लिए जाता है। सूत्र का अवतरण- यह विधिसूत्र है। कृषि से जो सम्पादित किया है उससे ही सन्तुष्ट हो। पहले ही कहा जा चुका है कि ब्राह्मण ग्रन्थों का विस्तार बहुत विशाल और व्यापक था। इस ज्ञान में घट को ही जाना जाता है। ब्राह्मण ग्रन्थों में ब्रह्म के महान गौरव का अनेक स्थानों पर वर्णन है। सभी काव्यों में वैदिक काव्य अन्यतम है ऐसा विद्वान कहते हैं। सुषुप्ति के समय में ही प्राण जगता है इसको श्रुति प्रमाण है। उसके बाद अभ्यास संज्ञा होती है, इस प्रकार हु हु झि इस स्थिति में कुहोश्चुः' इससे हकार को झकार, और अभ्यासे चर्च इससे झकार की प्राप्ति होती है, इस प्रकार से जु हु झि इस स्थिति में अदभ्यास्तात्'इससे झकार की अनुदात्तता होती है, इस प्रकार जुहु अति इस स्थिति में हुरुवोः सार्वधातुकै इससे हु के उकार के स्थान में वकारादेश होने पर जुहति यह रूप बनता है। इस सूत्र से विकल्प से तत्पुरुष समास होता है। उसके बाद ग्यारहवें अध्याय से आरम्भ करके अठारहवें अध्याय पर्यन्त अग्निचयन की आलोचना है। विस्पष्टादीनि गुणवचनेषु इस सूत्र से किसका विधान है? दयक्ष और प्राजापत्य पशु सभी पशुयागों की प्रकृति है। पर्जन्य शीघ्र वर्षा करने वाला है। वार्तिक का अर्थ - षष्ठी विभक्ति अन्त में भी अन्त्य को उदात्त होता है। उस पुरुष का क्या मुख है, बाहू कौन है, उसका ऊरु कौन है, और उसके पाद कौन है? उसके बाद वाक्य को प्रकृत सूत्र से एकश्रुति का विधान है। वहाँ विधि और विधान का मिलान होता है। अतः प्राणवायु का निरोध प्राणायाम कहलाता है। इस प्रकार से करुणामय यह पुरुष सभी प्राणियों की नाभि से दस अंगुलियाँ छोड़कर हृदय में बैठा रहता है। ऋग्वेद के समान ही इस ग्रन्थ को अष्टक और अध्याय में विभक्त किया है। सविकल्प समाधि त्रिपुटी होती है। इसलिए कर्म के द्वारा जो कुछ भी किया जाता है वह आसवबहुल्य से अनर्थसाधनत्व के द्वारा निर्विघ्न होता है। 4 सभी की विदेह मुक्ति होती है अथवा नहीं। और प्र यह शब्द प्रकार आदि से भिन्न भी है। धी पद से यहाँ बुद्धि का ग्रहण होता है। देवों का जैसा राज वैसे ही ब्राह्मणों का भी सोम ही राजा है। यह आचार्य सायण की अपनी शाखा थी। यास्क की प्रक्रिया आधुनिक भाषाविद् में प्रमुखता से अनुसरण करती है। कहा भी गया है - ब्राह्मणोऽस्य मुखामा असीतबाहु राजन्यः कृतः। किन्तु वास्तव में यह आरण्यक निरुक्त से अधिक प्राचीन है। वह चार्वाक आदि के अभिप्राय को पूर्वपक्ष रूप में प्रतिपादित करके उनके अभिप्राय का निराकरण करते हैं। एवं गोनागः इत्यादि उदाहरण है। और इसी प्रकार कारीषगन्ध्य प्रातिपदिक ष्यङन्त है यह सुस्पष्ट ही है। अध्यात्म विश्व तेज तथा प्रज्ञा के भेद से तीन रूप होता है। सरलार्थ - श्रद्धा से अग्नि को प्रज्वलित करते है, श्रद्धा से हवि दान करते है, श्रद्धा का जो धन प्रमुख है, उसकी स्तुति करते है श्रद्धा। शिवसङ्कल्पमिति शिव-सङ्कल्पम् । अस्तु॥१ ॥ श्रद्धयाग्निः समिध्यते'' इस मन्त्र को सम्पूर्ण लिखिए। स नः पितेव... इत्यादिमन्त्र की व्याख्या करो। (गौडपादियकारिका 2.32) आत्मा कभी भी बन्ध नहीं होती है। जैसे रसकिन् महाशय का मत है की वैदिक ऋषियों के द्वारा प्रकृति का सही वर्णन किया गया है। फिर इसके लिए दो प्रकार की कल्पना की जाती है की हमें इस प्रकार की आशङ्का नहीं करनी चाहिए। यह ही कर्मयोग कहलाता है। इसलिए बृहदारण्यक आदि ग्रन्थ को उपनिषद् इस शब्द से भी प्रयोग किया जाता है। कुछ शक्ति वाला व्यक्ति एक साथ ऊपर और नीचे नहीं रह सकता है। 3. वेदान्तशास्त्र का क्या तात्पर्य है? अतः मन्त्रों के अर्थ को अनभिज्ञों का दोष होता है, न की वेद का दोष होता है। उदाहरण -इस सूत्र का उदाहरण है-नहिषस्त्व नो मम इति। छठे दिन - ज्योतिष्टोम। इसके बाद 'कृत्तद्धितसमासाश्च'' इससे समास के प्रातिपदिक से सुपः ङसो लुकि उपकृष्ण यह सिद्ध होता है। पर्जन्यसूक्त किस वेद के अन्तर्गत होता है? वह ही रेचक कहलाता है। मोक्ष विषय न तो प्रत्यक्षगम्य होता है और न ही अनुगम्य होता है। भीहीभृहुमदजनधनदरिद्राजागराँ प्रत्ययात् पूर्वं पिति' इस सूत्र से प्रत्ययात् इस पञ्चम्यन्त पद की यथापूर्वम् इस प्रथमान्त पद की अनुवृति आती है। इस सूत्र में दो पद हैं। यत् प्रियते तत् प्रमेयमिति विवेकः। जिस प्रकार से अद्वैतवादी सृष्टि का प्रतिपादन करते हैं। रुद्र शब्द का तृतीया बहुवचन में वैदिक रूप क्या है? अर्थात् ऐक्यशब्द से यहाँ जल तथा दुग्ध के समान गौण का ऐक्य कहा गया है। इस सूत्र से प्रकृतिस्वर का विधान है। प्राचीन आर्य परम्परा के अनुसार गद्य छन्दोबद्ध रचना को मानते है। कल्पतरु में इस प्रकार से प्रतिपादित किया गया है- निर्विशेषेण परं ब्रह्म साक्षात्कर्तुमनीश्वरः। आठवें अध्याय के'आमन्त्रितस्य च' इस सूत्र से क्या होता है - (क) अनुदात्तस्य (ख) अन्तोदात्तस्य (ग) सर्वानुदात्तस्य (घ) आद्युदात्तस्य, छठे अध्याय के'आमन्त्रितस्य च' इस सूत्र से क्या होता है - (क) अनुदात्तस्य (ख) अन्तोदात्तस्य (ग) सर्वानुदात्तस्य (घ) आद्युदात्तस्य, उदात्तृतयोर्यणः स्वरितोऽनुदात्तस्य भाष्यम् (८३४)। उत्तरपद का अर्थ होता है पूर्वपदार्थ। आप अदिति और दिति को देखते हो। गौणप्रत्यय की मुख्यकार्य योग्यता अधिकरण के स्तुत्यर्थत्व से लुप्तोपम शब्द से। कर्मयोगादि नाना प्रकार के साधनों के द्वारा तथा मुमुक्षुओं की सम्पत्ति के लाभ के लिए शास्त्रों में उपदेश दिया गया है। अङिगरस के द्वारा मारण, मोहन, स्तम्भन, विद्वेष, वशीकरण, उच्चाटन प्रख्यात छः कर्मों का विधान विशेष रूप से देखना चाहिए, वैसे ही नारदीय पुराण में भी कहा है - तत्र चाडिगरसे कल्पे षट्कर्माणि सविस्तरम् । विज्ञानमय कोश सभी व्यवहारों में लौकिक तथा वैदिक व्यवहारों में कर्ता के रूप में ही रहता है। यहाँ पर एकमत श्रवण के द्वारा ही आत्मसाक्षात्कार को जाना जाता है। जैसे ब्राह्मणों में ग्रन्थ में सामान्य प्रतिपाद्य विषयों का प्रतिपादन किया गया है और इसका भी है। इस सूक्त में सोलह मन्त्र हैं। ग्रहजुहोत्यादि धातु का रूप है। इसके बाद प्रक्रिया कार्य में भूतपूर्व रूप निष्पन्न होता है। 7 चित्त के विक्षेप का हेतु कौन होता है? वहाँ पर ओमित्येतदक्षरमुद्गीतमुपासित' ऐसा कहा जाता है। समास में एकार्थीभावसामर्थ्य यह सिद्धान्त है। पदोद्देयक विधित्व विधि का नाम है। इसके बाद चाप् प्रत्यय विधायक यङश्चाप् सूत्र की व्याख्या और उदाहरण है। प्रतिग्य अर्थ में यहाँ द्विवचन। इसलिए अज्ञान की निवृत्ति नहीं होती है। मूर्धा सुतेजा, चक्षुर्विश्वरूपः, प्राणः पृथिव्वर्त्मा, संशेहो बहुलो, वस्तिरेवरयिः, पृथिवीव्वे पादौ, मुखम् आहवनीयाग्निः ये वैश्वानर के सात अंग है। यम उसके प्रलोभन में नहीं गए। उसका ही लाभ ग्रन्थों में अधिकारी के रूप में कहा गया है। तीनों प्रस्थानों के नाम लिखिए। यह संशय उत्पन्न होता है कि श्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नैः सुबन्तैः इनका समानाधिकरण कैसे हो सकता है। अप् शब्दान्त समास का समासान्त में उदाहरण है विमला आपो यस्य तद् विमलापं सरः। कतरकतमौ यह प्रथमान्त समस्त पद है। पुंस्त्व नाम किसका है? हे प्रजापति, अन्य किसी ने भी इस समग्र उत्पन्न पदार्थ को व्याप्त नहीं किया है। जो लोष्ठाश्मकांचों के समान होता है वह योगारूढ कहलाता है। इसके बाद कु का समासशास्त्र में प्रथमानिर्दिष्ट होने से उपसर्जनं पूर्वम् इससे पूर्वनिपात में कु पुरुष सु होता है, समुदाय के समास संज्ञक का प्रातिपदिकत्व से और सुपोधातुप्रातिपदिकयोः'' इससे प्रातिपदिक अवयव का सुपः का सु का लोप होने पर निष्पन्न कुपुरुष इसका प्रातिपदिकत्व से सु प्रक्रिया कार्य में कुपुरुषः रूप निष्पन्न होता है। उसी कारण से स्फटिक के समीप ही लोहित पुष्प रहता है। पुरुष बहुत्व का प्रतिपादन करने वाला सांख्य सूत्र क्या है? वह मेरा मन शुभसङ्कल्प हो। कलात्मक रूप से भी ये सूक्त अत्यन्त सुन्दर, सरल और प्रभावशाली है। पाँच इन्द्रियाँ कौन-कौन सी हैं? यजमान प्रार्थना करता है की - हे जलदात्त लोगो! गीता में भगवान श्री कृष्ण ने भी इसे अनेक बार कहा है। पतञ्जलि ने मत में कहा है कि अभिप्राय में चित्त को स्थिर करने के लिए विभिन्न विषयों से बार-बार चित्त को हटाकर के एक ही स्थान में स्थिर करना ध्यान कहलाता है। और उस वज्र से मेघों में पहले प्रकट हुए मेघ को मारा। प्रकृत उदाहरण में आहवनीये यह अनिर् प्रत्ययान्त पद है, उस अनिर् प्रत्यय का ऋद् यही है। इस शिवसङ्कल्प सूक्त में मन की अनेक प्रकार से व्याख्या की है। आठ सूत्रों में। यहाँ पर अगि-धातु के अकार का उदात्त स्वर धातुपाठ में ही निर्दिष्ट है, परन्तु नि प्रत्यय के इकार का उदात्त स्वर सूत्र से है, उससे सतिशिष्ठस्वरो बलीयान्'(६.१.१५८) इस परिभाषा से सतिशिष्ठ स्वर का बलवत्व होता है। रसों में प्रधान श्रृंगार का उल्लेख वेदों में प्राप्त होता है। आचार्य का वंश वर्णन है। एक ही जन्म में उपासना को समाप्त करके श्रवणादि के द्वारा कोई मोक्ष प्राप्त नहीं होता है। 13. तृतीया विभक्ति में। ( मनुसंहिता १०.१०६ ) इसका अर्थ है की जो ऋषियों का धर्मोपदेश वेदमृत्यादियों के विरोध के बिना चिन्तन का अनुसन्धान करता है वे ही उसके धर्म का यथार्थ स्वरूप बताते है। वहाँ ब्राह्मणों के तीन भाग है। पुस्त्वम्, स्त्रीत्व और नपुंसकत्व। उसी प्रकार से वे सुनते हुए भी नहीं सुनते है। यह गाँव कुरुक्षेत्र में सरस्वति नदी की पूर्व दिशा में था। इस सूत्र में चार पद है। जल के विकार से सभी को उत्पन्न करता है। 7. अमृतम् यहाँ मृ- यहाँ कौन सा स्वर है? उदाहरण के लिए एक मन्त्र है - एक एव सुद्रो न द्वितीयः अवतस्ते' (तैत्तिरीय संहिता १-१-१) अर्थात् रुद्र एक ही है, दूसरे को रुद्र नहीं होता है। इस सूत्र में दो पद हैं। 15. तत्त्वमसि इस महावाक्य में जहत् लक्षणा की सडऱगति कैसे नहीं हुई? चित्त मलिन कैसे हो सकता है। ( १.२.३७ ) सूत्र का अर्थ- सुब्रह्मण्य नामवाले निगद में यज्ञकर्मणि यह, विभाषा छन्दसि यह एकश्रुति नहीं होती है, और स्वरित का ही उदात्त स्वर होता है। केवल वेदपाठ के द्वारा वेद में कहाँ क्या स्वर होता है इस प्रकार से विद्वानों को समझ नहीं आता है। इन्द्र ने ही दो पत्थर के टुकड़े से अग्नि को उत्पन्न किया। जैसे शेर माणवक है। इसलिए विवेकानन्द के आँखों से श्री रामकृष्ण का सयुज्य देखा जाता है। उप पूर्वक मी धातु से करण में ल्युट् इस उपमान शब्द निष्पन्न होता है। वहाँ से लेकर के उन्होंने सनातन धर्म विशेष वेदान्त का प्रचार करके समग्र मानवजाति में उच्चतर विधान की स्थापना की। ताकिको की अपनी बुद्धि के द्वारा परिकल्पित कुछ भी अरमान्स के द्वारा कल्पना की जाती है। ब्राह्मण ग्रन्थों में भी यज्ञ विधि-विधान निमित्त का ही श्रेष्ठ होने से निर्देश विस्तार से प्राप्त होता है। पचति आहोस्वित् पठति यह किस सूत्र का उदाहरण है? यहाँ गङ्गा तथा यमुना के मध्यभाग पवित्र स्थान तथा मुनियों के निवास के लिए उत्कृष्ट भूमि का वर्णन है। वह आत्मा ही आत्मा का बन्धु होता है। अतएव निर अपराधी भी वर्ष भर पर्जन्य के समीप से भयभीत होकर पलायन करते हैं (निरु. १०. ११)'इसका सरलार्थ - पर्जन्यदेव वृक्षों का और राक्षसों का नाश करता है। प्रत्ययः (1/1) यह अधिकार और परश्च'' यह अधिकार आता है। तद्धित लोप नहीं होता है। ग्रन्थ को कोई भी पढ़ सकता है, शब्दों के अर्थ को भी जानना चाहता है। जैसे प्राचीन रोमन साम्राज्य में कास्ट और पोलुक्स युगलू थे, वैसे ही अश्विनी देवता भी युगलू रूप से स्वीकार किये जाते हैं। वन्ति - वा-धातु से लट् प्रथमपुरुषबहुवचन में। 'सर्वोपनिषदां मध्ये सारमष्टोत्तरं शतम्'यह मुक्तिकोपनिषद् का वाक्य है। हवि = पुरोडाशादि हवि पदार्थ, शरद् = शरद् ऋतु ही थी = थी। वे हैं लय, विक्षेप, कषाय तथा रसास्वाद। यज्ञों की अत्यधिक प्रधानता होने से यह अत्यन्त ज्येष्ठ यज्ञ के नाम में सुशोभित है (ताण्ड्य.६/३/८-९)। उदाहरण -यहाँ पर प्रदर्शित मन्त्र जब स्वाध्याय काल में प्रयोग करते समय एकश्रुति नहीं होती है। दिन का देवता कौन है? वक्ति इस विग्रह में कृत्यल्युटो बहुलम् '' इससे बहुलक से कर्ता में ल्युट् प्रत्यय होने पर नपुंसक में दैकवचन होता है। प्रौढ भक्ति में घृणित बुद्धि का सम्पूर्ण रूप से नाश हो जाता है। भार्या तो हमेशा दुःख से ही होती है। इन्द्र का असुर वध ऐतिहासिक है अथवा प्राकृतिक विघ्नचिह्न इस विषय में विद्वानों की सभा में अनेक मत है। और यहाँ पूर्वनिपात का यथाक्रम है - कण्ठकालः, युक्तियोगः, अग्न्याहितः इत्यादि उदाहरण है। इष्टलाभ के लिए और यज्ञादि की उपासना के लिए जो कार्य करते हैं, अशुद्ध उच्चारण से उनके कार्य का कोई लाभ नहीं मिलता है। तथा श्रद्धा इस प्रकार से- गुरूपदिष्टवेदान्त वाक्यों में विश्वासः श्रद्धा इस प्रकार से। अज्ञान के नष्ट हो जाने पर ज्ञान स्वयं ही प्रकाशित होता है। उसका ही इस अध्याय में आलोचन किया जाएगा। सूत्र अर्थ का समन्वय- यहाँ मेरीरे यह तिङन्त पद है। 18.2.5 ) आनन्दमय कोश कारण शरीर का भान सुषुप्ति अवस्था होती है इस प्रकार से कह सकते है। ऋतम् इसका क्या अर्थ है? तीनों कालों में आविर्भाव रूप से रहती है। अग्नि ग्रन्थ पर्यन्तम् यह लौकिक विग्रह है और अग्नि टा सह यह अलौकिक विग्रह है। इस वेद में वर्णित विषयों का विभाजन तीन प्रकार कर सकते है -१ आध्यात्मिक, २ आधिभौतिक, ३ और आधिदैविक। किसी भी वस्तु का स्वाभाविक रूप से जैसा वर्णन किया जाता है, वैसा ही वर्णन कला के उत्कृष्ट रूप को प्रकट करता है। व्याख्या - ये दो रथ सोने के बने हुए है। अर्थात् नपुंसकलिङ्गविशिष्ट अर्थ का वाचक है। उसके पदों का अन्वय होता है - सुगन्धिताजनस्य ते यहाँ पर आदिः द्वितीय पद उदात्तः इति। सूत्र अर्थ का समन्वय- गोष्ठजो ब्राह्मणः यहाँ पर गोष्ठज शब्द किसी भी ब्राह्मण का नाम होता है। वहाँ अनुदात्तस्य यह षष्ठयन्त पद है। जो हजार वर्षों तक सनातन धर्म के अन्तर्निहित तत्त्व रूप से रुकता है। जानाः, सर्वतोमुखः प्रत्यङ् तिष्ठति॥४॥ नः अस्मान् धृष्णु धृष्णुना तृतीया अर्थ में प्रथमा। ब्राह्मण ग्रन्थों का विस्तृत परिचय पहले ही हुआ है। इसके बाद समास का प्रातिपदिकत्व से सुप् का लोप होने पर सु राजन् निष्पन्न होता है। जब ऋग्वेद आदि तीनों वेदादि परलोक में फल देते हैं, तब अथर्ववेद इहलोक में फल देने वाला वेद होता है। ( ६.२.२० ) सूत्र का अर्थ- ऐश्वर्य अर्थ में तत्पुरुष समास में पति शब्द उत्तरपद रहते भुवन पूर्वपद को विकल्प से प्रकृति स्वर होता है। इसलिए चित्त की स्थिरता सम्भव नहीं होती है। ऋचः अर्धम् इस लौकिक विग्रह में ऋच् ङस् अर्ध सु इस अलौकिक विग्रह में अर्धं नपुंसकम् '' इस सूत्र से तत्पुरुष समास होता है। क्योंकि जैसे आरण्यकयज्ञ के गूढ़ रहस्य का प्रतिपादन करता है वैसे ही कर्मकाण्ड की दार्शनिक व्याख्या भी प्रस्तुत करता है। मल निवृत्ति के लिए निष्कामकर्म के लिए भूतदयादि तथा ईश्वर के नामोच्चारण साधन होते हैं। 7 अरोक्षस्वभाव ब्रह्म यहाँ पर श्रुति क्या है? एवं'पुरोहितं तथा अथर्वमन्त्र पारगम् इति। यहाँ क्या शेष है? ( ऋग्वेद ६/६४/३२ ) जिस प्रकार गोचर भूमि में अपनी गायों का प्रसार करता है उसी प्रकार उषा भी अपने प्रकाश को प्रकाशित करती है। यहाँ उव्वटभाष्य और महीधरभाष्य उपलब्ध है। उससे बहुभ॑गालः, बहुभगालः ये दो रूप बनते है। 3. अजाद्यतष्टाप् सूत्र से टाप् प्रत्यय होता है। उदात्तः यह प्रथमा एकवचनान्त पद है। जीवन्मुक्त को सभी सम्प्रदाय स्वीकार नहीं करते हैं, राम और कृष्ण भी जीवन्मुक्त ही थे, और शास्त्र प्रमाण है। आभ्यन्तर शौच तो मद मान ईर्ष्ये आदि चित्त मल को धोता है। इसका अर्थ सूक्ष्म शरीर से जीवात्मा लिङ्ग करता है इस कारण से सूक्ष्म शरीर को लिङ्ग शरीर कहा गया है। यदि ब्रह्म सत्य है तो श्रुति तथा स्मृति में बाधा उत्पन्न होती है। विक्षेप का नाश आवरण का भी नाश सुकर होता है। नित्य तथा अनित्य वस्तु विवेक इसका विवेक पद का अर्थ होता है। वह सुख आत्मा का स्वभाव होता है। असुरो के द्वारा किये जा रहे विघ्नों की रक्षा करने वाले वे शक्तिशाली योद्धा के समान होते हैं। सम्बोधन में जो प्रथमान्त पद है, वह वेद में आमन्त्रित है ऐसा कहलाता है। यदि ब्रह्म से आकाश की उत्पत्ति नहीं होती तो ब्रह्मविज्ञान के द्वारा आकाश का विज्ञान भी नहीं होता। तत्पुरुष समास में समासान्ताः इससे अधिकृत कुछ समासान्त प्रत्ययों का विधान किया गया है। वह ऋग्वेद मण्डल-अनुवाक-वर्ग भेद से और अष्टक अध्याय सूक्त भेद से दो प्रकार का है। जैसे सुवर्णकुण्डलादि का ज्ञान होने पर उनके उपादान सुवर्ण का भी ज्ञान हो जाता है। भोजसमदय में सैन्धव शब्द से अश्व शब्द का अर्थ ग्रहण नहीं करना चाहिए। ब्रह्माण्ड से बाहर भी सब जगह व्याप्त होकर के रहता है। ऋग्वेद के प्रमुख देवों में यह भी अन्यतम है। अवशिष्ट भाग में ८९८ अनुष्टुप् हैं। 24.6 ) निर्वकल्पक समाधि सर्वकल्प का लय होने पर ज्ञेयाकार चित्तवृत्ति जब होती है वह निर्वकल्पक समाधि होती है। विशेषणं विशेष्येण बहुलम् '' इससे सूत्रकार्य में सिद्ध होने पर यह सूत्र किसलिए है यह प्रश् न होता है। पक्वावस्था में निर्विकल्पक समाधि होती है। तैत्तिरीय उपनिषद् की इस विषय में श्रुति है - यतो वा इमानि भूतानि जायते। और वहाँ घृतादीनाम् यह षष्ठी बहुवचनान्त और अव्ययपद है। देवेभिः इसका लौकिक रूप क्या है? सत्र याग तीन भागों में विभक्त है-प्रथमार्ध में 180 दिन, द्वितीयार्ध में 180 दिन तथा तीसरे अर्ध में 180 दिन अपेक्षित है। राजकर्म विषय पर अथर्ववेद में जो कहा है उसे लिखिए। शुक्लयजुर्वेद में जो मन्त्र है उनका भी इसी प्रकार की व्याख्या है। उदाहरण - अब्राह्मणः इत्यादि इस सूत्र का उदाहरण है। जैसे:-राजपुरुषः में समन्वय प्रस्तुत किया जा रहा है। सरलार्थ - अग्नि की प्राचीन और नूतन ऋषियों के द्वारा स्तुति की जाती है। ये दिवि' (क. ६४) इस मुखमात्र में। स्कम्भेः 'स्तम्भुस्तम्भ' इससे विहित श्नः को छन्दसि शायजपि' इससे व्यत्यय से शायजादेश हुआ। इसलिए कर्म के साथ तत्त्व प्रतिपादक सूक्त स्थान स्थान में भी कहा गया है। यहाँ पर शक्यार्थ के परम्परा सम्बन्ध से वाच्यार्थ से भिन्न अर्थ की प्रतीति होती है। उस उत्पत्ति के समय उस गाय के शिशु के समान ही हो जाती है। कालिदास के वशिष्ठ मुनि से निर्मित ` अथर्वनिधि:' यह विशेषण दिया गया है, जिसका यह तात्पर्य है की - रघुवंश के उद्भव वाले कुल पुरोहित मुनि वशिष्ठ अथर्व मन्त्रों का तथा उनके क्रियाकलापों का भण्डार थे (रघु. १/५९)। सूत्र अर्थ का समन्वय- परमा च असौ वाक् चेति इस विग्रह करने पर कर्मधारय समास से निष्पन्न परमावाच् इस शब्द का समास होने से कृत्तद्धितसमासाश्च इस सूत्र से प्रातिपदिक संज्ञा होने पर, वहाँ सु-औ-जस-अम् -आउट-आउट-भ्याम् -भिस् -ङ-भ्याम् -भ्याम् -भ्याम् -ङ-ङस् -ओस् -आम् -ङ-ओस् -सुप् इस सूत्र से सिद्ध कपो न्याय से इक्कीस स्वादि प्रत्ययों की प्राप्ति से तृतीया एकवचन में विवक्षित होने से तत्रादि प्रत्ययों के टिप्पणियों में इकार होने से इस सूत्र से लोप होने से और लोप होने से इस सूत्र की उत्पत्ति होती है। उससे समाहार में वाच्य होने पर यह अर्थ प्राप्त होता है। वस्तुतः वे ब्रह्म स्वरूप में नहीं हैं। व्याख्या - यह त्रिपात्मपुरुष संसाररहित ब्रह्मस्वरूप है, वह द्युलोक को गया है इस अज्ञान कार्य भी संसार से युक्त गुणदोष में पूर्णरूप से रहता है। अगली आवृत्ति में देखेंगे। यह तो स्पष्ट ही है कि ग्रन्थ में प्रयोजन कहा गया है, उस प्रयोजन के लाभ के लिए ही अधिकारी ग्रन्थ का आश्रय लेता है। तुम महानता से बढ़े हुए कोश स्थानीय मेघ के उद्गम हो, वैसे ही करके हमारा सेचन करो, जिससे नदियाँ पूर्ण रूप से प्रवाहित होवें। वहाँ कुछ सूत्रों के द्वारा धातुस्वर का विधान है, और कुछ सूत्रों के द्वारा प्रत्यय स्वर का विधान है। सुख की प्राप्ति आत्मा में होती है। इसलिए वेद में स्वर का स्थान सबसे श्रेष्ठ है। अठारहवें अध्याय में वसु के प्रवाह सम्बन्धी मन्त्र उद्धृत है। इस प्रकार में तीसरा हूँ। किम् (क्या) यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है। 22. नित्यादि कर्मों को जन्म देना चाहिए अथवा नहीं चाहिए इसका प्रसङ्ग बताइए? क्तेन च पूजायाम् इस सूत्र का क्या अर्थ है? सोमिनी के लिए आतिथ्येष्टि नाम की इष्टी का विधान है, इस स्थल पर इस इष्टी में नौ मृत्तिकाओं में विष्णु को उद्दिश्य करके पुरोडाश को अर्पण किया जाता है। उस पुरुषरूप पशु से कौन देव उत्पन्न हुआ? वो ही सम्पूर्ण द्युलोक और पृथिवी को धारण करता है। इसके दो ग्रन्थ थे। अतः सूत्र का अर्थ होता है - कर्मधारय समास में पूर्वपद कुमार शब्द को प्रकृतिस्वर होता है। उस अन्य पदार्थ विष्णु के प्राधान्य से यह समास अन्यपदार्थ प्रधान बहुव्रीहि समास होता है। यद: स्थान में उसका पर्यायवाची शब्द उकार है। द्वैत वेदान्त के प्रवर्तक कौन है? यह कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद् और संहितोपनिषद् अध्याय के अगले भाग में है। अथर्ववेद के विविध नामों में प्रमुख कौन से है? मृळत - मृड्धातु से लोट मध्यमपुरुषबहुवचन में। एवं ह्रस्व अकारान्त प्रातिपदिक से स्त्रीत्व द्योत्य जात टाप् प्रत्यय होता है। (क. ६६) ये जानूमात्र में। 11.4.1 ) नित्य प्रलय इस प्रकार से प्रलय के द्वारा त्रैलोक्य का नाश होता है। यहाँ सूत्र के पदों का अन्वय होता है - वाचादीनां उभौ उदात्तौ इति। चनचिदिवगोत्रादितद्धित्याम्रेडितेष्वगतेः इस सूत्र से अगतेः इस पञ्चम्यन्त पद की अनुवृति आती है। उस यज्ञ का अन्तिम दिन उससे पूर्व दिन महाव्रत का अनुष्ठान है। सप्तमी शौण्डैः इस सूत्र का एक उदाहरण दीजिये? मृत्यु को भगाने के लिए विशिष्ट याग का वर्णन कहाँ है? विषयों को प्राप्त करना कठिन है। प्रजाओं के समीप से स्तुति को प्राप्त हुई। और यहाँ सुप् पद की अनुवृति है। उसके द्वारा ही सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। अतः गङ्गा में घोष इस वाक्य के मुख्य अर्थ का विरोध करते हुए उस मुख्य अर्थ को छोड़कर लक्षणा से उसके सम्बन्धि तीर में घोष का अवस्थान सम्भव होने पर यहाँ पर जहत् लक्षणा स्वीकार की जाती है। नञस्तत्पुरुषात् इस सूत्र का क्या उदाहरण है? इसलिए ही पाणिनीसूत्रों में कहीं पर अक्षरलाघव प्रधान होता है तो कहीं पर ज्ञानलाघव प्रधान होता है। और यह ब्राह्मणभाग भी वेद ही है। इस प्रकार पित् होने पर सार्वधातुक संज्ञक तिप् प्रत्यय परे होने पर पूर्व के हकार से उत्तर ओकार का प्रकृत सूत्र से उदात्त स्वर होता है। अन्य परमनि:श्रेयससाधनत्व का अवधारण इनमें अन्यतम है। यदि वस्तुतः बन्धन होता है तो उसे कभी भी मुक्ति नहीं होती है। ( ६.१.२०० ) सूत्र का अर्थ- तवै-प्रत्ययान्त शब्दों के अन्त और आदि में एक साथ उदात्त स्वर होता है। यज्ञसम्बन्धी हवि आदि पदार्थों के ज्ञान में उसका यही अर्थ होता है। इस प्रकार से प्रतिपादित किया गया है। समासात् इसके विशेषणत्व से तदन्तविधि में सामलोम्नः का सामलोमन्तात् यह अर्थ होता है। तद्धितार्थ यहाँ पर विषयिक अधिकरण में सप्तमी विभक्ति होती है। और टाप् के पकार की हलन्त्यम् सूत्र से इत्संज्ञा होती है। सूत्र की व्याख्या- यह विधिसूत्र है। क्या कामना की है ये कहकर कहते है। अर्थात् उसी उर्वद के रूप में सङ्कल्प किया। अनुदात्तम् इस पद की अनुवृति है। मनन के द्वारा प्रमेयगता सम्भावना दूर होती है। अथर्व शब्द की व्याख्या तथा उसका निर्वचनवन्न्यु निरुक्त में तथा और गोपथ ब्राह्मण में प्राप्त होती है। तब इन्द्र ने पर्वत शिखर के समान ही स्थित भुजाओं पर वज्र से प्रहार किया। आकाशादि के सात्विकांशों से अन्तः करण उत्पन्न होता है। वृत्ति मन का विषयप्रकाशकशक्ति, बाह्यानालम्बन तथा बाह्यानात्मवस्त्वकार के द्वारा परिणाम का अभाव ही सबसे अच्छी उपरति होती है। प्रयास के द्वारा बहुत प्रयास के द्वारा। प्रयास करने वाला, कार्य में लगे हुए। योगी योगवान पुरुष अनेक जन्मों से सिद्ध होता हुआ अनेक जन्मों में परिशुद्ध होकर प्राप्त होता है। स्वापादिगण किस गण के अन्तर्गत आता है? सूत्र अर्थ का समन्वय- यहाँ यावत् शब्द से युक्त प्रपचति इस तिङन्त को प्र इस उपसर्ग का व्यवधान है। और यह अर्थ है - गो शब्द से तत्पुरुष समासान्त से टच् प्रत्यय होता है किन्तु तद्धित लोप होने पर नहीं होता है। आज भी पद्य का अंश अत्यन्त उत्सुकता पूर्वक है। इस प्रकार इस सूत्र का अर्थ होता है - यत प्रत्ययान्त का दो अचों से युक्त शब्द का आदि अच् उदात्त होता है, नौ शब्द नहीं होते है। योग मत के अनुसार यह सम्प्रज्ञात समाधि से भिन्न साधनरूप समाधि है। जो पृथिवी को उत्पन्न करता है। और इस सूत्र के पदों का अन्वय इस प्रकार है - चादयः निपाताः अनुदात्ताः इति। जब चित्त रागादिकषायों के साथ रहता है। इस प्रकार आचार्यो के ये तीन गुण प्राप्त होते है -१ माण्डूकेय गण, (२) शाङखायन गण, और (३) आश्वलायन गण। एकाग्रता में उत्पन्न सविकल्प भी निर्विकल्प की दृष्टि से व्युत्थानरूप ही होता है। वस्तुतः वैदिकों के लिए याग बहुत पुण्यों को पुराते है। इसी ही शाखा के प्रथमकाण्ड के आठवें अध्याय में मनुमत्स्यकथा इस कथा को प्राप्त होती है। इसलिए यह सब कुछ दुरित का ही प्रसूत फल है इस प्रकार से तुम जानते हो। जगत में मोक्ष को पुरुषार्थ ही माना जाता है। उससे ही यह जगत सुनता है - अहं वात इव प्रवाम्यारम्भमाणा भुवनानि विश्वा इति। इस सूक्त में ऋषि कहते हैं की जो मन जागे हुए पुरुष से दूर जाता है, और सुप्त मनुष्य का ही मन वैसे ही समीप आता है जैसे जाता है वैसे ही दुबारा आता है। साधारण रूप से यहाँ एक सौ चौसठ खण्ड और छः सौ इक्कीस आठ मन्त्र हैं। पदं पदं प्रति यह प्रतिपद है और वीप्सा में अव्ययीभाव समास है। इस इन्द्र के लिए निर्मित विद्युत् इन्द्र को पाश में बांधने में असमर्थ हो गई। मित्र और वरुण दोनों सूर्य के रूप में ही समझना चाहिए क्योंकि सूर्य दिन रात का भी स्रष्टा है। यज्ञीय कर्मकाण्ड की व्याख्या-विवरणों का सम्पादन ब्राह्मण ग्रन्थों का मुख्य विषय है। मालतीमाधव का वर्णन किसने किया? इसका भी समुद्र के लिए उपयोग किया जाता है। रुद्र के हाथ में पिनाक, सुनहरे बने हुए धनुष और बाण है। इस सूत्र से ङीप् प्रत्यय का विधान होता है। उनमे भी इयतिथीं यावतिथीम् तावतिथीम् ऐसा प्राप्त होने पर छान्दस में य शब्द व शब्द का लोप होता है। यह जल अन्न प्रकृति आदि जीवन प्रदान करता है, और सृष्टि करते हैं। विशेषणं विशेष्येण बहुलम् '' इससे ही सिद्ध पापाणके कुत्सितैः' यह सूत्र किसलिए है? यदि शब्द प्रत्यक्ष ज्ञान का जनक है तो पर्वत में वह जहन्नमी है' इस वाक्य से अग्नि का प्रत्यक्ष ज्ञान उत्पन्न होना चाहिए। निरुक्त के आरम्भ में 'निघण्टुम्''समानाय' इन पदों से जाना जाता है। जो व्यक्ति जाग्रत अवस्था को सुषुप्ति अवस्था के समान देखता है। तब चैतन्य न तो कार्य होता है और न ही कारण होता है। उस रस का निरूपण सभी कवि करते हैं। जिसका प्रकृतिस्वर हो। उस महावाक्य के श्रवण के द्वारा ही अद्वैतात्मासाक्षात्कार सिद्ध होता है। जिस प्रकार से मणिसूत्र में सोने की बहुलता का विराजन किया जाता है उसी प्रकार उषा काल के वर्णन में भी प्रकृति का विराजन किया। चित्त की एकाग्रता का उपदेश देने वाली उपासना सुगुण ब्रह्मविषयक होती है। कृष्णं श्रितः इस लौकिकविग्रह में कृष्ण अम् श्रितः सु इस अलौकिक विग्रह में द्वितीया इस पद की प्रथमानिर्दिष्टता से उस बोध का कृष्ण अम् इसका 'प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् '' इससे उपसर्जन संज्ञा होती है। यस्तु अयुक्तः असमाहितः फलाशाविकिप्तचित्तः कामकारः कामस्य आशाः कारः करणं कामकारः, तेन फलाशयुक्तत्वेन। ऋग्वेद में लगभग २५० सूक्तों में इन्द्र की स्तुति स्वतन्त्ररूप से की गई है। वायु द्वारा मेघ्सर्व उत्पन्न होते हैं तथा फिर मायावश हो जाते हैं। व्याख्या - हे पत्नीयजमानहम तुम्हारे लिए सुख निवास योग्य वस्तुओं को चाहते है। वो ही समस्त प्रपञ्च का रचयिता है। शिवसङ्कल्पसूक्त और प्रजापतिसूक्त इस पाठ को पढ़कर आप सक्षम होंगे : सूक्त में स्थित मन्त्रों का संहिता पाठ पढ़ना; सूक्त में विद्यमान मन्त्रों का पदपाठ जान पाने में; सूक्तस्थ मन्त्रों का अन्वय कर पाने में; सूक्तस्थ मन्त्रों की व्याख्या कर पाने में; सूक्तस्थ मन्त्रों का सरलार्थ जान पाने में; सूक्त के मन्त्र में स्थित व्याकरण पद को जान पाने में; सूक्त का तात्पर्य और सूक्त के तत्व को जान पाने में; सूक्त के अर्थ को जानकर सूक्त की महिमा को जान पाने में; वैदिक शब्दों को जान पाने में; लौकिक भेद को जान पाने में; वैदिक रूपों को जान पाने में। यहाँ पर क्रिया क्या है? यहाँ बाधित अर्थ दोष होता है इस प्रकार पूर्वपक्षी मानते हैं। बीते हुए समय में यह शास्त्र संहिता गणितीय जातक आख्यान तीन भागो में अपने को प्रकट करता है। अच् के मध्य में डकार के स्थान पर। यथा - उपरामम् अव्ययीभाव समास में समास के अवयवों में उपराम दो पद होते हैं। शुभ कामनायुक्त और सुलभ उपाय सूपायन कहलाता है। यथाशक्ति शक्ति अनतिक्रम्य यह लौकिक विग्रह है और शक्ति अम् यथा यह अलौकिक विग्रह है। ये अलग से दो भागों में विभक्त है। भिन्नम् - भिद् -धातु से क्तप्रत्यय करने पर उसको न आदेश होने पर भिन्नम् यह रूप बनता है। भ्रान्ति निमित्त सब में उपपादित होता है। यह किस लिए है। पाद तथा हाथ स्थूल शरीर के अवयव होते हैं। इसी प्रकार दुःखम् अतीतः दुःखातीतः, नरकं पतितः नरकपतितः, ग्रामः गतः, ग्रामं अस्त्यस्तः, ग्रामं प्राप्तः ग्रामः प्राप्तः संशयं आपन्नः संशयापनः आदि इसके इस सूत्र से उदाहरण हैं। अग्नः पूर्वेभिः... इत्यादिमन्त्र की व्याख्या करो। प्राचीनकाल से लेकर के चार्वाक काल पर्यन्त विद्यमान वेदविरोधी सम्प्रदाय वेद के प्रमाण को खण्डन के लिए अनेक साधन प्रस्तुत करते हैं। उससे इस सूत्र का अर्थ होता है - उदात्त से उत्तर अनुदात्त को स्वरित होता है। वोपदेव ने संस्कृत के मान्य व्याकरण सम्प्रदायों में प्रथम स्थान इन्द्र को दिया है - इन्द्रश्चन्द्रः काशकृत्स्नापिशाली शाकटायनः। वैसे ही भाष्य आदि में आद्युदात्तरच इत्यादि सूत्र में प्रकृत सूत्र से ही अन्तोदात्त विधान दिखाई देता है। अग्ने:'' इस पद के स्थान में अग्निनाय'' इस पद का प्रयोग है। सूत्र अर्थ का समन्वय- इन्द्रारुणौ यहाँ देवतावाचक द्वन्द्व समास है। तत्समय के द्वारा ही जीव का बन्धन होता है, ऐसा पञ्चदशी में इस प्रकार से कहा गया है। पौर्वशालः यहाँ पर किस सूत्र से और किस प्रकार से वृद्धि होती है? यत्र यह भी अव्यय पद है। प्रज्वलित होते है। वह उत्पन्न होता है तो भी उसको उत्पन्न करना सम्भव है। यह सूत्र द्विपदात्मक है। यहाँ वाचकलुप्तोमलङ्कार है यह अर्थ है। सरलार्थ - जिसकी महिमा से हिम से युक्त पर्वत थे,नदी और समुद्र उत्पन्न हुए। ऋग्वेद का मण्डलरूप और अष्टकरूप से दो प्रकार का विभाजन होता है। श्रवण ही श्रुति कहलाती है। परन्तु प्रथम श्रेणी का छात्र बारहवीं कक्षा के लिए अयोग्य है। शेषं सर्वम् अनुदात्तम् ये सूत्र में आये पदच्छेद है। सूत्र अर्थ का समन्वय- स्वाहा इसका 'चादयोऽतवे' इस सूत्र से निपात संज्ञक होता है। अभ्यस्तानामादिः इस सूत्र की व्याख्या कोजिए। सूत्र की व्याख्या- यह विधिसूत्र है। विशेषण का तदन्त विधि में अदन्त से अव्ययीभाव से। जल धारण करने वाले वर्षा देने के रूप में वरुण चित्रित है। हि शब्दयुक्त तिङन्त को कैसे अनुदात्त नहीं हुआ? मन्त्र और ब्राह्मण भाग का एक जगह मिश्रण ही कृष्ण यजुर्वेद के कृष्णत्व का कारण है। क्रमश चिति, शिक्षा, तथा ब्रह्मविद्या है। वहाँ पर वाङ्मय मात्र ज्ञान नहीं होता है। स्वरितात्संहितायामनुदात्तात् " इस सूत्र का क्या अर्थ है? उस निगद में पाद व्यवधान नहीं होती है, और अर्धर्च व्यवधान भी नहीं होता है। इस प्रकार से सम्पूर्ण ग्रन्थ चौदह अध्यायों में विभक्त है। ऋग्वेद का प्रथम सूक्त क्या है? अपिहितम् - अपि उपसर्ग पूर्वक धा इस धातु से क्तप्रत्यय करने पर। 10. विवृक्णा इसका क्या अर्थ है? 7. ईष् -धातु से लट् प्रथमपुरुष एकवचन का यह रूप है। व्यावहारिक जीवन को अध्यात्ममय करना चाहिए। उदेरते - उत्पूर्वक ईर् -धातु से लट् प्रथमपुरुष एकवचन का रूप है। अतः यह समास द्वितीया तत्पुरुषसमास कहा जाता है। उदाहरण - गोवृन्दारक इत्यादि इस सूत्र का उदाहरण है। चार पद वाले इस सूत्र में अथ यह अव्यय पद है, आदि: यह प्रथमा एकवचनान्त पद है, प्राक् यह भी प्रथमा एकवचनान्त पद है, और मति शकटे: यह पञ्चमी एकवचनान्त पद है। इस प्रकार के कर्मों के विधान की प्राधान्य से अथर्ववेद में ही प्राप्ति होती है। यह शरीर कैरूप नौका है। उसका लक्षण यह है कि जो साधुओं में तथा पापों में समबुद्धि रखता है वह योगारू़ढों में विशिष्ट होता है। जिसका यहाँ वेत्ता नहीं है। इसमें चार अध्याय है। अन्तिम आरण्यक में किसका वर्णन है? अर्थात् शमादि अनुष्ठान से गुणों को प्राप्त करना चाहिए। नाम रूप विकारभेद उपाधिविशिष्ट और उसके विपरीत सभी से उपाधि विवर्जित है। ऋग्वेद के बारह सूक्तों में वरुण की स्तुति विहित है। नास्तिक भी इस ग्रन्थ को पढ़ते हैं। 5. प्र वाता वान्ति... इत्यादिमन्त्र की व्याख्या करो। जाकर के मनोवाचक कर्मों की सेवा करता है।